रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १० )
आचार्य भामह¹ के मत से प्रतिभा, शब्दार्थज्ञान, काव्यज्ञों की शिक्षा और अनेक
निबन्धों के अनुशीलन से प्राप्त व्युत्पत्ति काव्य के कारण हैं। वामन के अनुसार लोक-
व्यवहार और शास्त्रों में निपुणता, नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा ( प्रतिभा ) अथवा
जन्मान्तरीय संस्कारात्मक शक्ति-विशेष और काव्यज्ञों के निदेश पर काव्यरचना में
पुनः-पुनः प्रवृत्ति ( अभ्यास ) ये सभी काव्य के कारण हैं। रुद्रट² के अनुसार शक्ति,
व्युत्पत्ति और अभ्यास कारण हैं। मम्मट का भी यही मत है³। जयदेव⁴ केवल प्रतिभा
को कारण मानते हैं और प्रतिभा के सहकारी कारण शास्त्रानुशीलन और अभ्यास को
कहते हैं।
पण्डितराज के मत में केवल प्रतिभा से ही काव्य की सृष्टि होती है और
प्रतिभा का कारण कहीं अदृष्ट ( पूर्वजन्मार्जित ) और कहीं व्युत्पत्ति और अभ्यास है।
बालकवि कर्णपूर बचपन में ही बिना व्युत्पत्ति और अभ्यास के सुन्दर काव्य लिखने
लगे। ऐसे बालकवियों में विरुदावलीकार रघुदेव मिश्र, पुरंजनचरितनाटककार कृष्णदत्त
उपाध्याय आदि प्रसिद्ध हुए। इनके काव्यनिर्माण को देखते हुए स्पष्ट है कि प्रतिभा
का एक स्वतन्त्र कारण धर्मस्वरूप अदृष्ट मानना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में बिना
व्युत्पत्ति और अभ्यास के भी अदृष्ट से एवं बिना अदृष्ट के भी व्युत्पत्ति और अभ्यास
से प्रतिभा की उत्पत्ति से 'कारण⁵ के अभाव में भी कार्य की सत्ता' रूप व्यतिरेक-
व्यभिचार प्राप्त हो जायेगा, जिसके निवारण के लिए "अदृष्ट से उत्पन्न प्रतिभा के प्रति
अदृष्टमात्र कारण" एवं "व्युत्पत्ति और अभ्यास से उत्पन्न प्रतिभा के प्रति व्युत्पत्ति और
अभ्यास कारण" इस तरह अलग-अलग कार्यकारणभाव माना गया है। अब कारण के
भेद से दो प्रतिभाएँ हो जायेगी और कहीं पर अदृष्टजन्य प्रतिभा के अभाव में भी
व्युत्पत्ति और अभ्यासजन्य प्रतिभा से काव्य होने से पूर्ववत् ⁶ व्यभिचार प्राप्त ही रहेगा,
१. काव्यं तु जायते जातु, कस्यचित् प्रतिभावतः ।
शब्दाभिधेये विज्ञाय, कृत्वा तद्विदुपासनम् ॥
विलोक्या न्यनिबन्धांश्च, कार्यः काव्यक्रियादरः ॥ ( काव्यालङ्कार )
२. त्रितयमिदं व्याप्रियते शक्तिर्व्युत्पत्तिरभ्यासः । ( रुद्रट-काव्यालङ्कार )
३. शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात् ।
काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे ॥ ( काव्यप्रकाश )
४. "प्रतिभैव श्रुताभ्याससहिता कवितां प्रति हेतुः" । ( चन्द्रालोक )
५. जब प्रतिभा के दोनों कारण हैं तो इनमें से एक के भी न रहने पर कारण-
भाव हो जायेगा ।
६. उपरिवत् ।