रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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वामन, भोजराज, मम्मट, जयदेव आदि आचार्य काव्यलक्षण में दोषत्याग
और गुणग्रहण निविष्ट करते हैं। कतिपय आचार्य तो काव्यशास्त्रीय रीति, रस,
अलङ्कार तत्त्व भी जोड़ देते हैं । इनका लक्षण इनके द्वारा उक्त प्रयोजनों के साधक
होने के कारण ही इतने बड़े हो चले हैं । विश्वनाथ ने तो इन विस्तृत लक्षणों को
अतिसंक्षिप्त कर दिया और रसात्मक वाक्य को ही काव्य कहा है । परन्तु नीरस
पर्वतादि-वर्णन में उन्हें प्रबन्धगत रस का आश्रयण करना पड़ा है और ऐसे मुक्तक
वर्णन को वे काव्य हो नहीं मानते । परन्तु चमत्कार अनुभूत रहने पर काव्य न मानना
समुचित नहीं है ।
इसके बाद पण्डितराज ने सभी लक्षणों की बारीकी से छानबीन की और
अपना लक्षण दिया—
“रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम् ।”
अपने इस लक्षण का इन्होंने सूक्ष्म परिष्कार भी प्रस्तुत किया है, जो इसी ग्रन्थ
में रहने के कारण यहाँ नहीं दिया जा रहा है । इस परिष्कार में विरोधियों के सभी
आक्षेपों का समाधान हो जाता है ।
विचार कर देखने से ज्ञात होता है कि पण्डितराज ने सर्वप्राचीन लक्षण को
ही मान लिया है, शब्दान्तर से प्रस्तुत किया है, जिसे अग्निपुराणकार व्यास एवं दण्डी
ने कहा था । फर्क इतना ही है कि पदावली के स्थान में शब्द कहा गया है । इष्ट शब्द
से रमणीय ही अभिप्रेत हो सकता है । इस प्रकार हम देखते हैं कि काव्यलक्षण अपने
अनेक रूपों को धारण करते हुए सहस्राधिक वर्षों के बाद फिर जहाँ से प्रारम्भ हुआ
था वहीं पहुँच गया ।
( ३ ) काव्य-कारण—बिना कारण से कार्य नहीं हो सकता है और कारण
का समुचित रूप से रहने पर कार्य अवश्य होता है । काव्यरचना एक कार्य है ।
उसका भी कारण होना चाहिए, जिसे जान लेने पर काव्यकर्ता, प्रेरक, इच्छुक आदि
उस कारण के प्रति यत्नवान् होंगे और काव्यप्राप्ति करने में सफलता पायेंगे । अतः
काव्यशास्त्र के ग्रन्थों में काव्यकारण पर विचार किया जाता है । इस विषय में इन
शास्त्रकारों के दो दल हैं । दण्डी¹ आदि ने प्रतिभा, शास्त्रानुशीलन और अभ्यास इन
तीनों को मिलित रूप से काव्य का कारण माना है, जबकि रुद्रट आदि ने केवल
प्रतिभा को ।
१. नैसर्गिकी च प्रतिभा, श्रुतं च बहुनिर्मलम् ।
अमन्दश्चाभियोगोऽस्याः, कारणं काव्यसम्पदः ॥ ( काव्यादर्श )