रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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१३. रसगङ्गाधर—अलङ्कारशास्त्रीय महान् ग्रन्थ ।
१. पण्डितराज-ग्रन्थावली में इनके सभी ग्रन्थों का आकर्षक प्रकाशन संस्कृत
परिषत्, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद से हुआ है ।
अन्य जगन्नाथ
संस्कृत वाङ्मय में जगन्नाथ नाम के अनेक ग्रन्थकार हो चुके हैं । उनके ग्रन्थ
हैं—सिद्धान्तसम्राट् ( ज्योतिष )—सम्राट् जगन्नाथकृत, सिद्धान्तकौस्तुभ, रेखागणित,
विवादार्णवभङ्ग, रतिमन्मथनाटक, अतन्द्रचन्द्रिकनाटक—मैथिल जगन्नाथकृत, अनङ्ग-
विजयभाण, सभातरङ्ग, अद्वैतामृत, शरभगजविलास, ज्ञानविलास, समुदायप्रकरण
आदि । परन्तु इनमें कोई भी पण्डितराज उपाधि वाले नहीं थे । मिथिला में रघुनन्दन
उपाध्याय पण्डितराज थे, जिन्होंने वादशाह अकबर से तिरहुत राज्य प्राप्त कर अपने
गुरु म० म० महेश ठक्कुर को दे दिया था तथा काव्यप्रकाश की टीका लिखी थी, जो
दरभङ्गा में हस्तलिखित रूप में है ।
रसगङ्गाधर की व्याख्या-सम्पत्ति
रसगङ्गाधर पर निम्नांकित व्याख्याएँ उपलब्ध हैं—
( १ ) गुरुमर्मप्रकाश—म० म० नागेशभट्ट (१७५० ई०) कृत । यह रसगङ्गाधर
पर सर्वप्राचीन टिप्पणी उपलब्ध है, जो इसके खण्डन के उद्देश्य से ही लिखी गयी थी ।
नागेशभट्ट प्रख्यात वैयाकरण थे । ये भट्टोजिदीक्षित के पौत्र हरिदीक्षित के शिष्य होने
के कारण पण्डितराज के विरोधी हुए, क्योंकि भट्टोजि से पण्डितराज का वैरभाव
प्रसिद्ध ही है । नागेश ने अपनी गुरुपरम्परा के समर्थन में ही पण्डितराज का खण्डन
किया है । बहुत स्थलों पर ग्रन्थ के आशय को भी स्फुटित किया है । इसका प्रकाशन
१९३९ ई० में भट्ट मथुरानाथ शास्त्री की सरला टीका के साथ जयपुर से हुआ उत्तरा-
लंकार पर्यन्त और आज तक इतना ही मूल ग्रन्थ भी मिलता है । नागेश की टीका भी
यहीं तक है ।
( २ ) म० म० गङ्गाधर शास्त्री की क्वचित्-क्वचित् टिप्पणी सहित रसगंगाधर
काशी से प्रकाशित हुआ था । इससे पहले यह ग्रन्थ काव्यमाला में मुद्रित हो चुका
था । तृतीय बार रसगङ्गाधर का प्रकाशन भट्ट मथुरानाथ शास्त्री द्वारा जयपुर से हुआ ।
( ३ ) सरला—भट्ट मथुरानाथ शास्त्री की ग्रन्थलापिनी एवं गूढार्थबोधिनी
संक्षिप्त व्याख्या है। यह गुरुमर्मप्रकाश के साथ १९३९ ई० में प्रकाशित हुई और १९४५
तक इसके छः संस्करण निकल गये, इसी से इसकी उपादेयता सिद्ध है ।
( ४ ) हिन्दी अनुवाद—पं० श्रीपुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी, नागरी प्रचारिणी
सभा, काशी ।