रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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( ५ ) 'चन्द्रिका'—कविशेखर बदरीनाथ झा—प्रथमानन भाग, शेष भाग पर
पं० मदनमोहन झा—रसगङ्गाधर की आज तक सर्वोत्कृष्ट व्याख्या यही है । ग्रन्थ को
स्पष्ट करते हुए उसका सारभाग पाठकों के समक्ष रख देना, छात्रों एवं विद्वानों के
उपयुक्त सन्तुलित विचार उपस्थित करना एवं साहित्यिक दृष्टि से ग्रन्थ को देखना
इत्यादि कतिपय विशेषताएँ इसे लोकप्रिय बनाती हैं । चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी
से १९५५ ई० में प्रकाशित ।
( ६ ) 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या—पं० मदनमोहन झा—यह व्याख्या उपर्युक्त
'चन्द्रिका' संस्कृत व्याख्या के साथ प्रकाशित है । यह सूक्ष्म विवेचना के क्रम में बहुत
स्थलों पर विस्तृत हो गयी है ।
( ७ ) मधुसूदनीप्रकाश संस्कृत-हिन्दी व्याख्या—आचार्य मधुसूदन मिश्र—काशी
हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ।
( ८ ) रसचन्द्रिका—पं० श्रीकेदारनाथ ओझा—यह व्याख्या सम्पूर्णानन्द
संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से १९७७ ई० में प्रकाशित हुई । इसमें ग्रन्थ का
अवतरण, शब्दार्थस्फोरण एवं दार्शनिक दृष्टि से विषय का निरूपण किया गया है ।
कुछ स्थलों में यह शास्त्रान्तर विचार में अतिविशद हो गयी है, जब कि बहुत स्थलों
पर टिप्पणी बन के रह गई है । इसकी भूमिका केवल टीकाकारों की भर्त्सना में
कृतश्रमा है, जैसा वर्णन विद्वान् के लिए अशोभनीय है । काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ की
व्याख्या में एक भी तच्छास्त्रीय त्रुटि नहीं दिखाई गई है, केवल न्यायशास्त्रीय त्रुटि और
वह त्रुटि भी कहाँ तक समीचीन है इसका निर्णय तो परवर्ती आलोचकों, व्याख्याकारों
के विचार में देखे जा सकते हैं । पर उनकी इस भूमिका से स्पष्ट हो जाता है कि
'चन्द्रिका' व्याख्या की दोषगवेषणा को ही यह श्रेय है कि 'रसचन्द्रिका' व्याख्या का
उसने ही निर्माण करा लिया । माननीय व्याख्याकार के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य
नहीं है—साहित्यशास्त्रीय विषय-विवेचन में भी बहुत स्थलों पर शास्त्रवैपरीत्य इनकी
व्याख्या में है जिनकी गणना हम यहाँ नहीं करना चाहते । पाठक इस रसतरङ्गिणी
व्याख्या में उन्हें ढूँढ़ सकते हैं । चन्द्रिका के बाद रचित होने पर भी 'रसचन्द्रिका'
उसका स्थान नहीं ले सकी, न ही लोकप्रिय हो सकी—यह भी ज्ञातव्य है ।
( ९ ) रसतरङ्गिणी—डॉ० श्रीनारायण मिश्र एवं डॉ० शशिनाथ झा—यह
प्रस्तुत संस्करण संस्कृत-हिन्दी व्याख्यात्मक है । यह छात्रोपयोगी के साथ-साथ गम्भीर
विचारों का प्रतिपादक, जटिल स्थलों का परिचायक, पूर्वव्याख्याताओं द्वारा विषय को
प्रकृत शास्त्र से शास्त्रान्तर की ओर बहकाव का नियन्त्रक और कुव्याख्यान का विखण्डक
के रूप में प्रस्तुत हो रहा है ।