रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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इसके अध्ययन में प्रवृत्त ही नहीं हो सकते हैं, जबकि उन्हीं के उपयोग के लिए शास्त्र
का प्रणयन होता है । ग्रन्थ के अध्ययन में जिज्ञासु को प्रवृत्ति कराने वाले तत्त्व को ही
अनुबन्ध कहते हैं । किसी भी कार्य में लोग तभी प्रवृत्त होते हैं जब उन्हें उसमें 'इदं
मदिष्टसाधनम्'—'यह मेरा अभीष्ट साधन करने वाला है' इस प्रकार का ज्ञान हो जाय ।
इसे ही इष्टसाध्यताज्ञान कहते हैं । सुमेरु पर्वत लाने में उक्त ज्ञान के रहने पर भी
लोग प्रवृत्त नहीं होते हैं, क्योंकि उसमें कृतिसाध्यताज्ञान नहीं है, अर्थात् जब तक 'इदं
मत्कृतिसाध्यम्'—'यह मुझसे किया जाने योग्य कार्य है' इस प्रकार का ज्ञान भी प्रवृत्ति
के प्रति कारण है और विषमिश्रित स्वादिष्ट भोजन में उक्त दोनों ज्ञान के रहने पर भी
बलवत् अनिष्ट ऐसा ज्ञान होने पर वह इष्ट ही नहीं है । अतः प्रवृत्ति के प्रति मुख्य
दो ज्ञान ही कारण हैं—इष्टसाध्यता ज्ञान और कृतिसाध्यता ज्ञान । अब प्रस्तुत में
प्रयोजन से इष्टसाध्यता ज्ञान होता है और विषय, सम्बन्ध और अधिकारी से कृति-
साध्यता ज्ञान होता है । विषय हुआ प्रतिपादनीय वस्तु, प्रयोजन हुआ फल, अधिकारी
हुआ प्रवृत्त होने योग्य व्यक्ति और सम्बन्ध हुआ प्रतिपाद्य विषय के साथ प्रतिपादक
शास्त्र का संसर्ग ( विषय और ग्रन्थ में प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव सम्बन्ध ) ।
प्रस्तुत साहित्यशास्त्र का विषय है काव्य एवं उसके उपयोगी (गुण, अलंकार,
रीति, रस, भाव, ध्वनि आदि ) पदार्थ । इनका ज्ञान प्राप्त करना ही प्रयोजन है ।
इन विषयों के जिज्ञासु व्यक्ति अधिकारी हैं और इस विषय और शास्त्र में बोध्य-बोधक-
भाव सम्बन्ध है ।
उपर्युक्त आलोचकों, काव्यशास्त्रकारों की संस्कृतवाङ्मय में सुदीर्घ परम्परा
रही है । आचार्य भरतमुनि ( ई० पू० द्वितीय शताब्दी ) से लेकर आज तक इसकी
श्रृंखला बनी हुई है । बीच-बीच में अनेक वाद आये, सम्प्रदाय चले और अपना प्रभाव
छोड़ते गये, यह शास्त्र आगे बढ़ता गया, विषय की सूक्ष्मता आती गयी । सोलहवीं
शताब्दी से प्रत्येक शास्त्र में प्राचीन-नव्य का भेद होने लगा, भाषा परिष्कृत शैली को
पकड़ने लगी । इस शास्त्र में यह बात कुछ बाद में आयी, जिसे लिये हुए सत्रहवीं
शताब्दी में अवतीर्ण हुए पण्डितराज जगन्नाथ अपने प्रौढ़-परिष्कृत ग्रन्थ रसगङ्गाधर
के साथ ।
रसगङ्गाधर
यह साहित्यशास्त्र का मूर्धन्य ग्रन्थ है । रसस्वरूप गङ्गा को धारण करने
वाला—'रसञ्चासौ गङ्गा रसगङ्गा, तस्याः धरः (धारकः), धरतीति धर इति' इस
व्युत्पत्ति के अनुसार यह रसप्रतिपादक के रूप में साक्षात् शिव ( गङ्गाधर ) ही है ।
तदनुसार इसका विषय रस है, जो साहित्यशास्त्र में सर्वप्रधान होने से अपने शास्त्रमात्र
का संग्राहक हो जाता है, इस शास्त्र के सभी तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करता है—