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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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( ८ )
इसके अतिरिक्त चतुर्वर्ग की प्राप्ति और कलाओं में नैपुण्य—ये प्रयोजन १
विश्वनाथोक्त हैं । इनमें भी धर्म से अमङ्गलनाश, अर्थ से धनप्राप्ति, काम और मोक्ष
से परमानन्द की प्राप्ति को मान लेने पर कलानैपुण्य एक अतिरिक्त प्रयोजन होता है ।
इन प्रयोजनों के सम्पादक काव्य का ही लक्षण अभिप्रेत है । शायद इसीलिए काव्य-
लक्षण से पहले उसका प्रयोजन प्रतिपादित होता है ।
उपर्युक्त प्रयोजनों में केवल परमानन्द ( रसास्वादमूलक ) ही काव्य के प्रयोजन
हैं, शेष प्ररोचक २ उपायमात्र हैं ।
( २ ) काव्य-लक्षण—कवि की रचना काव्य कहलाती है । उसका प्रथम कार्य
चिन्तन सुललित भावों की अवधारणा अर्थरूप ही है, पर उसे व्यक्त करने हेतु उसका
द्वितीय कार्य पदावली-गुम्फन शब्दरूप ही होता है । तदनुसार सुललित भावों को व्यक्त
करने वाली पदावली काव्य है, यही वस्तुस्थिति है । इसे ही आलङ्कारिकों ने अपने-अपने
ढंग से काव्यलक्षण के रूप में व्यक्त किया है । इस विषय में आचार्य दण्डी ने
अग्निपुराण के अनुसार अपना लक्षण दिया—
"शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली" ३ ।
तदनुसार अभीष्ट = सहृदयहृदयाह्लादक अर्थ से व्यवच्छिन्न = विलक्षणीकृत
पदसमुदाय को काव्य कहते हैं ।
इनसे भी प्राचीन आचार्य भामह ( ५०० ई० ) ने कहा—"शब्दार्थौ सहितौ
काव्यम्" ४—चमत्कारजनक शब्द और अर्थ को काव्य कहते हैं । उसी समय से यह
विवाद शुरू हुआ कि शब्द ही काव्य है या शब्द और अर्थ काव्य हैं ! सम्पूर्ण उत्तर-
भारत के विद्वान् भामह के अनुयायी हो गये और शब्दार्थों का आज तक समर्थन कर
रहे हैं । इसी तरह दक्षिण भारतीय दण्डी के अनुसरण पर केवल शब्द को काव्य
कहने में अड़े हुए हैं । रुद्रट, वामन, आनन्दवर्धन, मम्मट, भोजराज, वाग्भट आदि
आचार्य शब्दार्थयुगल को काव्य मानने के पक्ष में हैं, जबकि विश्वनाथ और जगन्नाथ
शब्द को ही काव्य कहते हैं-। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि जो भी केवल शब्द
को काव्य कहते हैं, उनके भी मत में अर्थ उसका विशेषण रहता ही है । तब विवाद
रहा दोनों को प्रधान मानने या अर्थ को विशेषण मानने का ही और यह विवाद
अभी भी जारी है ।
१. सरस्वतीकण्ठाभरण से साहित्यदर्पण में उद्धृत ।
२. रसगङ्गाधर की प्रस्तावना—पं० मदनमोहन झा सम्पादित संस्करण ।
३. काव्यादर्श ।
४. काव्यालङ्कार ।