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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 414 में से

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पृष्ठ 20

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से इनके मस्तिष्क की उपज है और यह विशेषण इनके द्वारा प्रथमतः प्रतिपादित अन्य
सातों मतों में भी निविष्ट है। इस नवीन उद्भावना को इन्होंने अपने काव्यलक्षण के
परिष्कार में भी दिया है—"कारणं च तदवच्छिन्ने भावनाविशेषः पुनः पुनरनु-
सन्धानात्मा", "चमत्कारजनकभावनाविषयार्थप्रतिपादकशब्दत्वम्"। इस तरह रस-
स्वरूपनिरूपण में "भावनाविशेष" पण्डितराज की अपनी चीज है, जैसा कि इसकी
व्याख्या करते हुए महावैयाकरण दीनबन्धु झा ने लिखा है१—"भावनाविशेषमहिम्ना =
ज्ञानविशेष-सामर्थ्येन, एतेन साधारणीकरणाय व्यापारान्तरकरणमनावश्यकमिति सूचितं
भवति । इदमेव ग्रन्थकृन्मते रसस्वरूपं प्रकाशाद् विशेषश्च"—"पुनः पुनः अनुसन्धानात्मक
ज्ञानविशेष के सामर्थ्य से' इसी विशेषण से सूचित होता है कि साधारणीकरण के लिए
व्यञ्जना या भावकत्व-भोजकत्वव्यापार आदि मानना अनावश्यक हो जाता है और यही
ग्रन्थकार जगन्नाथ के मत से रस का स्वरूप है तथा काव्यप्रकाश से विलक्षण है।
अतः विद्वानों का मत है कि अपनी प्रतिभा से पण्डितराज ने ही सभी मतों की
उद्भावना की है। इनमें कतिपय तो रससूत्र के विरुद्ध होने से और शेष कल्पनामात्र
सिद्ध२ ( अव्यावहारिक ) होने से साहित्यशास्त्रीय विद्वानों को ग्राह्य नहीं हैं। केवल
दार्शनिक दृष्टि से चिन्तित 'नव्यास्तु' मत किसी साहित्यिक के लिए उपयुक्त नहीं हो
सकता। अतः समालोचक इन मतों की उपेक्षा करते आये हैं और स्वयं ग्रन्थकार ने भी
नवीन प्रकार प्रदर्शित करने के कौतूहल से ही इन्हें ग्रन्थ में निविष्ट किया है, सिद्धान्त
नहीं माना है।
रस-विषयक सिद्धान्त मत—
सहृदय के हृदय में वासणारूपेण सदा से स्थित ( नित्य ) रत्यादि स्थायीभाव
ही बाह्य विभावानुभावव्यभिचारिभावों के व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव सम्बन्ध से साधारणरूप
में अनुभूयमान होते हुए अलौकिक आस्वादपदवी को प्राप्त कर रस कहलाता है—यह
परमाचार्य अभिनवगुप्त के मत का सारांश है। पण्डितराज का प्रथम सिद्धान्त इसी की
व्याख्या है। वे व्याख्या द्वारा निम्नांकित कथ्य को व्यक्त करते हैं—
(१) जब विभावादि अनुकूल वर्णों से युक्त चमत्कृत काव्य में निविष्ट रहता है।
(२) यह काव्य सहृदय के हृदय में प्रविष्ट कर गया होता है।
(३) सहृदय बार-बार अनुसन्धान करते हुए विभावादिकों को साधारणीकृत
कर लेते हैं।
१. रसगङ्गाधरीय-रसस्वरूपनिरूपणव्याख्या—'रसिकमनोरञ्जिनी' ग्रन्थ के
परिशिष्ट में—नाग प्रकाशक, दिल्ली—१९९५ ई० ।
२. मैथिलीकाव्यविवेक, पृ० ६४।