रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
DevanagariHindipublished414 पृष्ठ
पृष्ठ 11, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 11( ५ )
( ५ )
'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति'—प्रधान के अनुसार ही व्यवस्था होती है, इस न्याय के
अनुसार साहित्यशास्त्र का नाम रसशास्त्र १ होता है और इसे ही पण्डितराज जगन्नाथ
ने इस ग्रन्थ का रसगङ्गाधर नाम रखकर सूचित किया है। परन्तु वे परम्परानुसार
प्रचलित नाम "अलङ्कारशास्त्र" कहना२ ही उचित समझते हैं और यह नाम भी
प्राधान्य न्याय३ से ही सङ्गत होता है, क्योंकि इस शास्त्र का आधा से अधिक भाग
अलंकार-विवेचन में ही रहता है। परन्तु आधुनिक युग में 'साहित्य' शब्द अधिक
प्रचलित है, जो ४राजशेखर, श्रीहर्ष, कविकर्णपूर आदि के द्वारा समर्थित है। साहित्य
के प्रसंग में म० म० गङ्गाधर शास्त्री का एक पद्य यहाँ उद्धरणीय है—
नाचान्तं यच्चिरत्नैरपरिचितचरं यच्च वाचालचेलै-
रौचित्यं यन्न मुञ्चेदपि च विरचयेद् यच्चमत्कारिचेतः।
तादृक्प्रौढिप्रकर्षप्रणयभणिति या सूयते काव्यरत्नं
पुण्यैः कस्याप्यगण्यैः परिणमति मुखे सा हि साहित्यरीतिः'५ ॥
इस विवेचन से स्पष्ट हुआ कि साहित्य के सभी तत्त्व रसगङ्गाधर के विवेचनीय
विषय हुए और वे सभी विषय यहाँ सूक्ष्मरूप से विस्तृत विवेचित हुए हैं। पर खेद का
विषय है कि यह ग्रन्थरत्न पूर्णरूप में उपलब्ध नहीं है। अन्तभाग में कुछ खण्डित है,
जिसमें कुछ अलंकारों का विवेचन था । मध्य में भी कुछ प्रकरण त्रुटित जान पड़ते
हैं; यथा—अभिधा और लक्षणा के बाद व्यञ्जनानिरूपण नहीं है, रीतिविवेचन और
दोषनिरूपण नहीं है। यह बात भी ध्यातव्य है कि ग्रन्थ के अध्याय, जिसे आनन कहा
गया है, उसका विभाजन भी उपयुक्त नहीं जान पड़ता है। अतः स्पष्ट है कि प्रति-
१. "रसविद्याविदः केचिद् ग्राम्यामाहुस्तु कोमलाम्" । (अलङ्कारसमुद्गः—
इन्द्रपतिः पृ० ६ )
२. "अलङ्कारान् सर्वानपि गलितगर्वान् रचयतु" । (रसगङ्गाधर-आरम्भिक पद्य)
३. ग्राम में सभी जातियों के रहने पर भी मल्लग्राम, ब्राह्मणग्राम आदि नाम
उनकी प्रधानता से ही है ।
४. काव्यमीमांसा—"शब्दार्थयोर्यथावत् सहभावेन विद्या साहित्यविद्या ।
नैषधीयचरित के अन्त में—"साहित्ये सुकुमारवस्तुनि" ।
साहित्यपाथोनिधिमन्थनोत्थं कर्णामृतं रक्षत हे कवीन्द्राः ।
यत्तस्य दैत्या इव लुण्ठनाय काव्यार्थचौराः प्रगुणीभवन्ति ॥ (कर्णपूरः) ।
विश्वनाथ के ग्रन्थ का नाम साहित्यदर्पण भी साहित्यशास्त्र कहने के पक्ष
में है।
५. विभ्रममनीषा—२-२, दरभंगा में प्रकाशित ।