रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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ये स्थायीभाव नौ हैं—रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, घृणा, विस्मय और
निर्वेद । इनके कारण को विभाव कहते हैं, जिसके दो भेद हैं—आलम्बन और
उद्दीपन । यथा—शृङ्गार रस में शकुन्तलादि आलम्बन और एकान्तस्थानादि उद्दीपन
हैं । यद्यपि विभाव स्थायिभाव के उत्पादक नहीं होते हैं, वे ( स्थायी ) तो सहृदयहृदय
में वासनारूप से सूक्ष्म आकार में पहले ही से रहते हैं । विभाव तो उनका विकास
मात्र करता है, तथापि लौकिक विभाव के उत्पादक रहने के कारण अलौकिक
( शास्त्रनिष्ठ ) विभाव को भी वैसा कहना अनुचित न होगा, क्योंकि अविकसित
वस्तु प्रतितियोग्य न रहने के कारण अनुत्पन्न कोटि में ही रहती है ।
सच तो यह है कि लौकिक रत्यादि स्थायीभावों का शकुन्तलादि विभाव
उत्पादक होते हैं, पर काव्यारूढ़ होने पर वे ही अलौकिक विभाव बनकर रसास्वाद के
अवसर पर रस से एकीभाव को प्राप्त करते हैं । यह भी ज्ञातव्य है कि स्थायीभाव
और रस में तादात्म्य रहने के कारण स्थायीभाव के आलम्बन और उद्दीपन ही रम के
भी आलम्बन एवं उद्दीपन होते हैं ।
स्थायीभाव के कार्य को अनुभाव कहते हैं, जो आलम्बन पर आश्रित बाह्य रूप
से प्रकटित होता रहे । जैसे अग्नि धूम को प्रकाशित करता है । यह काव्य में निबद्ध
रहने के कारण अलौकिक होता है । सात्त्विक भाव भी अनुभाव के ही अन्तर्गत आते
हैं । जो विभाव से भी विलक्षणरूप से जल में बुद्बुद के समान प्रकाशित हो तथा कभी
स्थायीभाव में ही विलीन हो जाय—ऐसे रसोपकारक क्षणिक भाव को व्यभिचारीभाव
कहते हैं । निर्वेदादि ३३ व्यभिचारीभाव कहे गये हैं । स्थायीभाव भी अपरिपुष्ट रहने
पर रसान्तर के उपकारक होकर व्यभिचारीभाव कहलाते हैं । सभी भावों में स्थायी-
भाव प्रधान होता है । उक्त नौ स्थायीभाव शृङ्गारादि नौ रसों में परिणत होते हैं ।
रसानुभूति के विषय में सर्वप्राचीन उल्लेख भरतनाट्यशास्त्र का रससूत्र है—
“विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः”—उपर्युक्त दोनों विभाव, अनुभाव
और व्यभिचारिभाव के संयोग से रस की प्रतीति होती है । इस सूत्र की व्याख्या चार
प्रकार की उपलब्ध होती हैं, जो रसस्वरूप के चार सिद्धान्त बने हुए हैं—लोल्लट का
उत्पत्तिवाद, शङ्कुक का अनुमितिवाद, भट्टनायक का भुक्तिवाद और अभिनवगुप्त का
अभिव्यक्तिवाद । इसके अतिरिक्त रस के विषय में पण्डितराज जगन्नाथ ने सात मतों
को प्रस्तुत किया है—( १ ) नव्यमत ( अनिर्वचनीयतावाद ), ( २ ) भावना के
माहात्म्य से मानस बोध ( भ्रमवाद ), ( ३ ) भाव्यमान विभाव ही रस है, ( ४ ) वैसा
अनुभाव, ( ५ ) वैसा व्यभिचारीभाव, ( ६ ) वैसे विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी-
भाव मिलितरूप में और ( ७ ) इनमें से जिस पर चमत्कार रहे वही ।