रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६ )
लिपिकारों के द्वारा इस ग्रन्थ के पत्रों में हेराफेरी हुई है । गङ्गाधर ( शिव ) पञ्चानन
कहे गये हैं । तदनुसार इस रसगङ्गाधर के भी पाँच आनन होने चाहिए । यहाँ द्वितीय
आनन के बाद बहुत दूर तक विषय एवं प्रकरण बदलने पर भी आनन-विभाजन नहीं
हुआ है, जो मध्य में ग्रन्थ के कुछ अंश के अप्रास होने की सूचना देते हैं । प्रथम आनन
में काव्य, उसके भेद एवं असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनि ( अभिधामूलध्वनि के प्रथम भेद,
रसध्वनि ) का साङ्गोपाङ्ग विवेचन ( रस, गुण, भावध्वनि, रसाभासादि सहित )
हुआ है । इस आधार पर द्वितीय आनन में संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ( अभिधामूलध्वनि के
द्वितीय भेद, जिसमें वस्तुध्वनि और अलङ्कारध्वनि अन्तर्भूत है ) का, तृतीय आनन में
लक्षणामूलध्वनि का, चतुर्थ आनन में व्यञ्जना का और पञ्चम आनन में अलङ्कारों के
विवेचन की कल्पना की जा सकती है । काव्यदोष का। निरूपण यद्यपि आवश्यक है,
क्योंकि दोष-परित्याग तभी सम्भव है जब उसका परिचय हो, तथापि पण्डितराज ने
अपनी विवशतावश उसका निरूपण नहीं किया होगा । विवशता यह थी कि ग्रन्थारम्भ
में ही इनकी प्रतिज्ञा है कि हम स्वरचित उदाहरण ही देंगे, दूसरे का नहीं और दुष्ट-
काव्य का निर्माण पण्डितराज की लेखनी से हो हो नहीं सकता। इसलिए दोषनिरूपण
इस ग्रन्थ में नहीं रहा होगा । परन्तु अभी जो ग्रन्थ उपलब्ध है, जिस रूप में प्राप्त है,
उसी से सन्तोष करना होगा, उसी पर विचार करना उचित होगा ।
नव्यपरिष्कृत आलोचनात्मक शैली में विषय की सूक्ष्मता से परिचय कराना
पण्डितराज की अद्भुत प्रतिभा का परिचायक है । इस ग्रन्थ के द्वारा इन्होंने साहित्य-
शास्त्र को वह गरिमा प्रदान की जो दर्शनादि शास्त्रों को प्राप्त है । शास्त्रान्तर के
पण्डित, जो इसं विद्या को अन्यथासिद्ध मानकर मखौल उड़ाते थे, इस ग्रन्थ के सूक्ष्म
विवेचन के चक्कर में पड़कर इस शास्त्र के गहन अध्ययन करने को विवश हुए । यही है
इस शास्त्र को पण्डितराज की देन, रसगङ्गाधर का महत्त्व ।
इसमें प्राचीन आचार्यों के मतों की विशद समीक्षा की गयी है और विषय-
विवेचन अतिविस्तृतरूप में यथेच्छ हुआ है । प्राचीन ग्रन्थ पद्यबद्ध या कारिका
के साथ वृत्तियुक्त रहते थे, परन्तु यह ग्रन्थ केवल गद्य में, प्रांजल, परिष्कृत, अवच्छेद-
कतायुक्त गद्य में है । अतः यहाँ विषय को सूक्ष्मरूप में विस्तृत विवेचन का अवसर
प्राप्त हुआ । साहित्यशास्त्रीय विकास के चरम उत्कर्ष के समय इस ग्रन्थ की रचना
हुई, अतः उन सभी विषयों का सम्यक् प्रतिपादन-समीक्षण इसमें हो सका, जिनका
पूर्ववर्त्ती ग्रन्थों में होना सम्भव न था । इन्होंने उदाहरण के रूप में यहाँ स्वरचित
पद्यों का ही उपस्थापन किया है, जिससे यह ग्रन्थ सुरभित हो गया और पण्डितराज
का कवित्वरूप भी उदात्त रूप में प्रकटित हो गया है। ये केवल आलोचक ही नहीं,
वरन् उच्चकोटि के कवि भी थे । इसलिए रसगङ्गाधर का स्थान साहित्यशास्त्र में