रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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(४) साधारणीकृत विभावादि मिलकर अलौकिक व्यापार ( भावना ) से
आनन्द, जो सहृदय के हृदय में आवरण से ढँका रहता है, उसके उस
आवरण ( पर्दा ) को हटा देते हैं ।
(५) इस अज्ञाननाश से रसानुभूति करने वाला ( प्रमाता ) अपने अन्तःकरण
के परिमितत्व प्रभाव एवं अपने प्रमातृत्व धर्म को त्याग कर साक्षीरूप से
व्यापक हो जाता है, स्वयंप्रकाश हो जाता है और अपने वास्तविक
आनन्दस्वरूप का साक्षात्कार करता है और यही तो रससाक्षात्कार है ।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि पण्डितराज की व्याख्या अभिनवगुप्त का
समर्थन साहित्यिक दृष्टि से करती है। अन्तर केवल दार्शनिक विचार में है। दोनों
आचार्य रस को स्वयंप्रकाश एवं नित्य मानते हैं। फर्क तो इतना ही है कि अभिनव-
गुप्त के मत में चैतन्य विशेषण और स्थायिभाव विशेष्य है, पर पण्डितराज के मत में
स्थायिभाव ही विशेषण और चैतन्य विशेष्य है । अभिनव ने शैवागम दर्शन के अनुसार
प्रकृति के अंश रत्यादि स्थायीभाव में भी चैतन्यप्रतिभास के कारण आनन्द की
स्थिति मानी है। पर पण्डितराज शाङ्करवेदान्त के अनुसार केवल चैतन्य को ही
आनन्दमय मानकर रससिद्धान्त व्यवस्थापित करते हैं और अभिनव के मत में वेदान्ता-
नुसार संशोधन कर देते हैं ।
आगे इसकी विवेचना करते हुए पण्डितराज इसे स्पष्ट ही कर देते हैं। अभि-
नव के मत में व्यंजनाजन्य ज्ञानविषय रत्यादि ही रस है, पर पण्डितराज के मत में—
“रसो वै सः” इत्यादि श्रुति से आत्मा और रस में तादात्म्य ( अभेद ) सिद्ध रहने
के कारण तथा वेदान्तसिद्धान्तानुसार आत्मा के नित्यज्ञानरूप और अन्य के संस्कार
रूप रहने के कारण आत्मा और रस में अभेद उपपन्न नहीं हो सकता है। अतः ज्ञान-
विषयीभूत रत्यादि को रस न मानकर¹ रत्यादिविषयक ज्ञान को ही रस मानना
समुचित है ।
यहाँ ज्ञातव्य है कि रसस्वरूप का सर्वप्रथम विवेचन अग्निपुराण² में हुआ है
१. “भग्नावरणचिद्विशिष्टो रत्यादिः स्थायीभावो रस इति स्थितम्, वस्तुतस्तु
वक्ष्यमाणश्रुतिस्वारस्येन रत्याद्यवच्छिन्ना चिदेव रसः” । ( रसगङ्गाधरः—
रसस्वरूपनिरूपणे )
२. आग्नेयपुराणे—
अक्षरं ब्रह्म परमं सनातनमजं विभुम् ।
वेदान्तेषु वदन्त्येकं चैतन्यं ज्योतिरीश्वरम् ॥
आनन्दः सहजस्तस्य व्यज्यते स कदाचन ।
व्यक्तिः सा तस्य चैतन्यचमत्काररसाश्रया ॥