रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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और वेदान्त दर्शन के अनुसार ही हुआ है, भले ही उसके प्रतिपादन का ढंग भिन्न हो,
पर यह रसस्वरूप वहाँ से चलकर नानारूप में वर्णित-विवेचित होता हुआ अन्त में
पण्डितराज के द्वारा पुनः अपने यथोचित पूर्वस्थान पर आ गया ।
(५) गुणादिनिरूपण—पूर्वविवेचित विषयों के अतिरिक्त रसगङ्गाधर के इस
प्रथम आनन में गुणनिरूपण, भावध्वनिनिरूपण, रसाभासादि और अलक्ष्यक्रमध्वनि के
सम्बन्ध में विशेष विचार—ये विषय सूक्ष्म विवेचन के साथ निरूपित हुए हैं और इस
प्रकार प्रथम आनन असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य काव्य के तथा तत्सम्बद्ध विषयों के निरूपण में
समाप्त हो जाता है । इनका विवेचन पाठक ग्रन्थ में ही देखेंगे । यहाँ इन्हीं शब्दों के
साथ विरत होता हूं ।
पण्डितराज जगन्नाथ
आचार्य जगन्नाथ नैसर्गिक कवित्वसम्पन्न काव्यशास्त्रीय आचार्य थे । आन्ध्रप्रदेश
इनकी जन्मभूमि थी । ये तैलङ्ग ब्राह्मण थे१ । इनके पिता पेरुभट्ट२ महान् विद्वान् थे,
जिन्होंने ज्ञानेन्द्रभिक्षु से वेदान्त, माहेन्द्र पण्डित से न्याय-वैशेषिक, खण्डदेव उपाध्याय से
मीमांसा और शेष वीरेश्वर से व्याकरण का अध्ययन किया था और सर्वविद्याधर थे३ ।
जगन्नाथ ने अपने पिता से अध्ययन किया था और उनके गुरुशेष वीरेश्वर से भी
पढ़ा था४ । ये व्याकरण, दर्शन और साहित्यशास्त्र के उच्च कोटि के विद्वान् थे । ये
प्रतिभाशाली, प्रत्युत्पन्नमति, समयपरीक्षक ( युगद्रष्टा ) और प्रभावशाली पण्डित थे ।
तरुण होते५ ही ये विद्वान् हो गये और विद्वान् होते ही दिल्लीश्वर शाहजहाँ
( १६२८-१६६६ ई० ) के कृपापात्र होकर पण्डितराज की पदवी प्राप्त कर ली—
"मूर्त्तिमतेव नवाबासफखानमनःप्रसादेन द्विजकुलसेवा-हेवाकि-वाङ्मनःकायेन
माथुरकुलसमुद्रेन्दुना६ रायमुकुन्देनादिष्टेन श्रीसार्वभौमसाहिजहान-प्रसादाधिगत-
'पण्डितराय'-पदवीविराजितेन तैलङ्गकुलावतंसेन पण्डितजगन्नाथेन आसफ-
विलासाख्येयमाख्यायिका निरमीयत" । ( 'आसफविलास' के आरम्भ में )
१. आसफविलास—जगन्नाथकृत के आरम्भ में—"तैलङ्गकुलावतंसेन पण्डित-
जगन्नाथेन" ।
२. इनका नाम पेरम भट्ट भी था; द्रष्टव्य—प्राणाभरण एवं रसगङ्गाधर के
आदि में—"श्रीमत्पेरमभट्टसूरितनयः" । ( प्राणाभरण )
३. रसगङ्गाधर का आदि भाग ।
४. अस्मद्गुरु-पण्डितवीरेश्वराणाम्—ममोरमाकुचमर्दन के प्रारम्भ में ।
५. भामिनीविलास में—"दिल्लीवल्लभपाणिपल्लवतले नीतं नवीनं वयः" ।
६. मुकुन्दराय माथुर नामक कायस्थ के द्वारा दरबार में इनका प्रवेश हुआ
था, जो वहाँ के दीवान थे ।