रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९ )
दिल्लिश्वरो वा जगदीश्वरो वा मनोरथान् पूरयितुं समर्थः ।
अन्यैर्नृपालैः परिदीयमानं शाकाय वा स्याल्लवणाय वा स्यात् ॥
रसगङ्गाधर के मंगलाचरण आदि से ज्ञात होता है कि पण्डितराज वैष्णव थे,
हालांकि अन्य देवताओं की स्तुति भी इनकी प्राप्त हैं। इनका जीवन यद्यपि उल्लासमय
रहा, पर इन पर बड़े-बड़े अनर्थपात हुए—युवावस्था में ही पाणिगृहीती¹ ( स्वजातीया
पत्नी ) और पाणिगृहीता ( यवनी प्रेयसी ) का देहान्त हो गया । युवक पुत्र स्वर्ग-
वासी हो गया² । यवनीसम्पर्क-दोष से पण्डितों द्वारा अपमानित हुए और अन्त में
विरक्त होकर गङ्गा के शरण में गङ्गालहरी की रचना करते हुए गङ्गालाभ कर लिया ।
ये ब्रह्मतेज से युक्त थे । किंवदन्ती है कि जब यवनी इनके शयनकक्ष में आयी
तो उसे हुआ कि मैं जल जाऊँगी और वह लौट गयी । बादशाह के दरबार में पण्डित-
राज के इस ब्रह्मतेज को कम करने का प्रश्न उठ गया । किसी पण्डित के कहने से
इन्हें हुक्के के पानी से नहलाया गया और तब यवनी इनके पास जा सकी ।
पण्डितराज बहुत गर्विले स्वभाव के थे और यह गर्व उनका यथार्थ था, परन्तु
विद्वत्समाज इन्हें शास्त्रोद्धत कहता है। वे न केवल "अलङ्कारान् सर्वान् अपि मलित-
गर्वान् रचयतु" जैसी उक्ति रखते हैं, अपितु अपनी कविता की स्वयं ही अत्यधिक
प्रशंसा करते हैं—
धुर्यैरपि माधुर्यैर्द्राक्षा-क्षीरेक्षु-माक्षिक-सुधानाम् ।
वन्द्यैव माधुरीयं पण्डितराजस्य कवितायाः ॥ ३१ ॥
ये न केवल अप्पयदीक्षित या भट्टोजिदीक्षित का खण्डन दर्पपूर्ण वाणी से करते
हैं, वरन् आनन्दवर्धन, मम्मट आदि की तीखी आलोचना में भी ये पीछे नहीं रहे। परन्तु
अन्तिम अवस्था में इन्हें अपने कृत्यों पर पश्चात्ताप हुआ कि क्यों हमने विद्वानों का
अनादर किया ? क्यों यवनीसम्पर्क किया ? और इस विरक्ति के साथ संसार से ऊब
कर भगवती भागीरथी गङ्गा के शरण में पहुँचे । पर उस समय में भी अपनी प्रकृति
( स्वभाव ) ने इन्हें नहीं छोड़ा और ये गर्व से गङ्गा नदी की सबसे ऊपरी सीढ़ी पर
१. द्रष्टव्य—पण्डितराज का करुणविलास—
धृत्वा पदस्खलनभीतिवशात् करं मे
या रूढवत्यसि शिलाशकलं विवाहे ।
सा मां विहाय कथमद्य विलासिनी ! द्याम्
आरोहसीति हृदयं शतधा प्रयाति ॥
२. रसगङ्गाधर—प्रत्यनीक अलङ्कार के उदाहरण में पुत्रशोक का वर्णन ।