रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७ )
वहाँ कुछ दिन शाहजहाँ तथा उसके पुत्र दाराशिकोह के आश्रय में अपना
नवीनवयः' ( युवावस्था का पूर्वार्ध, ३० वर्ष तक ) सुखपूर्वक बिताया था—
“दिल्लीवल्लभ-पाणिपल्लवतले नीतं नवीनं वयः” ( भामिनीविलास ) । जगदाभरण
में जगन्नाथ ने दाराशिकोह का वर्णन किया है। इस हिसाब से जान पड़ता है कि
१६४० ई० के बाद ये दिल्ली से निकल पड़े, उस समय यदि इनकी आयु ३० वर्ष
मानें तो इनका जन्मसमय १६१० ई० अनुमानित होता है।
ये अप्पयदीक्षित और भट्टोजिदीक्षित के उत्तरसम-सामयिक विरोधी थे तथा
इनके ग्रन्थों पर स्वतन्त्र रूप से खण्डन-ग्रन्थ लिखे थे। अप्पयदीक्षित के भ्रातृपौत्र
एवं शिष्य नीलकण्ठ दीक्षित ने 'कलिगताब्द ४७३८= ( १६३८ ई० ) में नीलकण्ठ-
विजय काव्य की रचना की थी, जिस समय दीक्षितजी परम वृद्ध रहे होंगे। सिद्धान्त-
कौमुदीकार भट्टोजिदीक्षित के गुरु शेषकृष्ण के पुत्र शेषवीरेश्वर पण्डितराज के एवं
उनके पिता पेरुभट्ट के गुरु थे।
बादशाह शाहजहाँ के साथ पण्डितराज ने काश्मीर की यात्रा की थी और वहाँ
के नवाब आसफखान द्वारा बादशाह के सत्कारादि का वर्णन इन्होंने 'आसफविलास' में
किया है।
विद्वान् होते ही जगन्नाथ राजाश्रय को प्राप्त करने बीकानेर गये । वहाँ के
राजा जगत्सिंह की प्रशंसा में इन्होंने जगदाभरण काव्य ( ५३ पद्यमात्र ) की रचना
की। इन्हीं जगत्सिंह के पिता कर्णसिंह के आदेश से मैथिल गङ्गानन्द कवीन्द्र ने
कर्णभूषण ( रसनिरूपण ) ग्रन्थ की रचना की थी।
किंवदन्ती है कि वहाँ से ये जयपुरनरेश जयसिंह की सभा में पधारे। वहाँ
मुल्लाओं के दो आक्षेपों के निराकरण हेतु पण्डितसभा हुई थी, पर समाधान नहीं
हो रहा था। पण्डितराज ने समाधान का वचन दिया और कहा कि 'एक आक्षेप का
उत्तर मैं तुरंत दे सकता हूँ और दूसरे का उत्तर अरबी-फारसी पढ़कर दूंगा' ।
वहाँ इन्हें फारसी पढ़ाने की व्यवस्था की गयी और कुछ ही दिनों में ये उस भाषा के
पारङ्गत हो गये। उक्त आक्षेपों का उत्तर देने हेतु इन्हें दिल्ली बादशाह के दरबार
में भेजा गया। इनके समाधान से सभी प्रसन्न हो गये—
आक्षेप—( १ ) राजा जयसिंह आदि वास्तविक क्षत्रिय नहीं हैं, क्योंकि
परशुराम ने जब २१ बार पृथिवी को निःक्षत्रिय कर दिया तो क्षत्रिय आये कहाँ से ?
१. अष्टात्रिंशदुपस्कृतसप्तशताधिकचतुःसहस्रेषु ।
कलिवर्षेषु गतेषु प्रथितः किल नीलकण्ठविजयोऽयम् ॥