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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 414 में से

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पृष्ठ 17

( ११ )
जिसके निवारण के लिए 'अदृष्टजन्य प्रतिभा से उत्पन्न काव्य के प्रति अदृष्टजन्य
प्रतिभा कारण' और व्युत्पत्त्यभ्यासजन्य प्रतिभा से उत्पन्न काव्य के प्रति व्युत्पत्त्यभ्यास-
जन्य प्रतिभा कारण' ऐसा पृथक् कार्यकारणभाव मानना चाहिए ।
राजशेखर का मत है¹ कि समाधि ( मानसिक एकाग्रता ) और अभ्यास (बाह्य
प्रयास ) ये दोनों ही मिलकर शक्ति को प्रकट करते हैं और यही शक्ति काव्य का
कारण है, जो दो प्रकार की होती है—कारयित्री और भावयित्री ।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि साहित्यशास्त्र में शक्ति और प्रतिभा
एक ही वस्तु है, जब कि न्यायदर्शन में शक्ति ज्ञानजन्य संस्कार² को और प्रतिभा नव-
नवोन्मेषशालिनी बुद्धि-विशेष को ( जो संस्कार का जनक है ) कहते हैं। वेदान्त में
भी ज्ञान को आत्मा, बुद्धि को अन्तःकरण एवं संस्कार को ज्ञानजन्य माना जाता है।
यहाँ तो "या शब्दग्राममर्थसार्थमलङ्कारतन्त्र-मुक्तिमार्गमन्यदपि तथाविधहृदयं प्रतिभा-
सयति सा प्रतिभा" ऐसा कहते हुए राजशेखर ने प्रतिभा को व्यक्त किया है और
इसे ही भामह, दण्डी, वामन, अभिनवगुप्त, जयदेव और जगन्नाथ प्रतिभा कहते हैं,
जब कि इसी प्रतिभा को रुद्रट, आनन्दवर्धन और मम्मट शक्ति कहते हैं । अतएव
दोनों एक ही तत्त्व हैं, क्योंकि अभिनवगुप्त ने "अव्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्त्या संव्रियते
कवेः" इस ध्वनिकार की पंक्ति की व्याख्या में शक्ति को प्रतिभा कहा है ।
इस सम्बन्ध में किसी समन्वयवादी आचार्य का मत उपयुक्त जान पड़ता है
कि काव्य की उत्पत्ति में प्रतिभा, वृद्धि में अभ्यास और सौन्दर्य में व्युत्पत्ति कारण है—
'काव्यं तु जायते शक्तेर्वर्धतेऽभ्यासयोगतः ।
तस्य चारुत्वनिष्पत्तौ व्युत्पत्तिस्तु गरीयसी' ॥
यह मत पण्डितराज के अनुकूल है और उन बालकवियों की काव्योत्पादिका
शक्ति का भी समाधान इससे हो जाता है ।
( ४ ) रसस्वरूप—'रस्यते = आस्वाद्यते इति रसः' इस व्युत्पत्ति के
अनुसार सहृदय सामाजिक जिसे काव्य या नाट्य के द्वारा आस्वादित करे, जिससे
अनिर्वचनीय आनन्द को प्राप्त करे, उसे रस कहते हैं । इस आस्वादन के साधन को
अलङ्कारशास्त्र में विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव ( सञ्चारीभाव ) कहते हैं ।
इन तीनों के मेल से प्रकटित स्थायीभाव रस कहलाते हैं । रसरूपताप्राप्ति से पूर्व तक
ये सभी भाव ही कहलाते हैं, तो चित्तवृत्ति ( चित्त में रहने वाले धर्म ) ही होते हैं ।
१. काव्यमीमांसा ।
२. साहित्यिक के अनुसार ही शक्ति को संस्कारस्वरूप मानकर । "शक्तिः,
कवित्वबीजभूतः संस्कारविशेषः" ।