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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 414 में से

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पृष्ठ 9

( ३ )
शास्त्र के अनुशासन में कवि रहता है, आलोचक से सावधान रहता है और यही वह
सावधानी है, जो भवभूति जैसे महाकवि को निखारा और उच्च स्थान पर बैठाया ।
सुना जाता है कि आलोचकों ने भवभूति के महावीरचरित नाटक के विषय में बहुत
आक्षेप किया था । कवि सम्हल गये और उनका उत्तर दिया—
ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञां
जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः ।
उत्पत्स्यते हि मम कोऽपि समानधर्मा
कालो महान् निरवधिर्विपुला च पृथ्वी १ ॥
फिर उनके उत्तररामचरित नाटक को देखकर तो आलोचकों को कहना ही
पड़ा—"उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते" । इसी प्रकार महाकवि दण्डी के विषय
में भी किंवदन्ती है कि उन्होंने दशकुमारचरित की पूर्वपीठिका जब लिखी तो आलोचकों
का तीखा प्रहार उन पर पड़ा । वे रुक गये, अपने को सम्हाला, परिश्रम करके आक्षेपों
का समाधान ढूँढ़ा और इसी छानबीन के क्रम में स्वयं एक अलङ्कारशास्त्रीय ग्रन्थ ही
रच डाले—काव्यादर्श, जो इस शास्त्र का एक मूर्धन्य ग्रन्थ हुआ । इसके बाद इन्होंने
दशकुमारचरित की उत्तरपीठिका लिखी, जिसकी सब ओर से प्रशंसा हुई । इसीलिए
उनकी पूर्वपीठिका और उत्तरपीठिका में इतना अन्तर है ।
ऐसे ऐसे महाकवि भी जिनकी कद्र करते हैं, ऊँचा स्थान देते हैं, उन
आलोचकों का महत्त्व इसी से आँका जा सकता है । इन आलोचकों को न केवल
पूर्ववर्ती सभी काव्यों की जानकारी रहती है, अपितु सभी आलोचकों के सिद्धान्तों की
भी जानकारी आवश्यक है। कवि से सूक्ष्म दृष्टि उनकी होती है। जिन भावों को
कवि ने सोचा तक न होगा, उनके ही शब्दों से उन भावों को निकाल कर गुण या
दोष दिखाने में वे पटु होते हैं। सूक्ष्मदर्शिता, निष्पक्षता, निर्भीकता, सारगर्भिता,
सामयिकता, सार्वदेशिकता आदि कतिपय गुण इनमें आवश्यक माने गये हैं। कवि की
आलोचना करने से पहले उन्हें स्वयं कवि बनना आवश्यक है। पक्षपातिता, भीरुता,
लोभ आदि कतिपय दुर्गुण जिस आलोचक में रहे, वह निन्दनीय माना जाता है ।
अतएव आलोचक को संयत रखने के लिए काव्यशास्त्र ( साहित्यविद्या ) परम
आवश्यक है, क्योंकि अनियन्त्रित प्रवाह से परम हानि निश्चित है ।
अनुबन्ध-निबन्धन—
प्रत्येक शास्त्र के आदि में ही उसके विषय, प्रयोजन, सम्बन्ध और अधिकारी
—इन चार अनुबन्धों का निरूपण आवश्यक होता है, क्योंकि इनके ज्ञान के बिना जिज्ञासु
१. मालतीमाधव-प्रस्तावना ।