रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ )
समाधान — परशुराम ने जब पहली बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय कर दिया,
तो दूसरी बार के लिए क्षत्रिय कहाँ से आये ? यह २१ बार कहना ही प्रमाणित
करता है कि संहार के बाद भी बहुत क्षत्रिय बचे रहे, जो इन राजाओं के पूर्वज थे ।
आक्षेप ( २ ) अरबी भाषा संस्कृत से प्राचीन है ।
समाधान — मुसलमानों के 'हदास' (धर्मग्रन्थ) में लिखा है कि—'मुसलमान
हिन्दुओं से विपरीत आचरण करें, यही उनका धर्म है' । इस वाक्य से सिद्ध है कि
हिन्दू धर्म मुसलमानों के धर्म से प्राचीन है और यह भी स्वतः सिद्ध है कि उन हिन्दुओं
की भाषा भी अरबी से प्राचीन है ।
दिल्ली दरबार में रहकर पण्डितराज ने एक परम रमणीय यवनी से प्रेम
किया और बादशाह की कृपा १ से वह इन्हें प्राप्त हो गयी । यह समाचार देशभर में
फैल गया और इन्हें पण्डितों ने जातिच्युत घोषित कर दिया । इन पण्डितों में अप्पय-
दीक्षित और भट्टोजिदीक्षित प्रमुख थे । अतः इनसे पण्डितराज का वैरभाव हो गया ।
कुछ दिन बाद वह यवनी, जिसका नाम 'लवङ्गी' था, असमय में ही दिवङ्गता हो
हो गयी और पण्डितराज ने विरक्तभाव से दिल्ली को छोड़ दिया । ये यवनीसम्पर्क से
अपने को स्वयं पापी समझने लगे—
सुरधुनिमुनिकन्ये ! तारयेः पुण्यवन्तं
स तरति निजपुण्यैस्तत्र किं ते महत्त्वम् ।
यदि हि यवनकन्या-पापिनं मां पुनीहि
तदिह तव महत्त्वं, तन्महत्त्वं महत्त्वम् ॥ ( गङ्गालहरी )
कुछ समय पण्डितराज ने नेपाल के समीप कूचविहार ( कामरूप ) के राजा
प्राणनारायण ( १६३३-६६ ई० ) के आश्रय में भी रहे, जहाँ 'प्राणाभरण' की रचना
की । यह ग्रन्थ वही है जिसे पूर्व में 'जगदाभरण' कहा गया है, फर्क इतना ही है कि
यहाँ जगत्सिंह के स्थान में 'प्राणनारायण' रख दिया गया है। इस राजा का वंश इस
प्रकार है—विश्वसिंह—मल्लदेव ( नरनारायण )—लक्ष्मीनारायण—वीरनारायण—
प्राणनारायण । इनमें मल्लदेव के आश्रित काव्यकौमुदीकार देवनाथ ठक्कुर ( काव्य-
प्रदीपकार गोविन्द ठक्कुर के पुत्र ) थे ।
वहाँ से लौटकर ये काशी में रहने लगे । अन्य राजाओं का आश्रय इन्हें तुच्छ
दीखने लगा । ये लिखते हैं—
१. न याचे गजालिं न वा वाजिराजं न वित्तेषु चित्तं मदीयं कदापि ।
इयं सुस्तनी मस्तकन्यस्तहस्ता, 'लवङ्गी'कुरङ्गीदृगङ्गीकरोतु ॥