रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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बैठ गये और बोले— 'माता गङ्गा के लिए मैं इतनी दूर से आया हूँ तो यह माता पुत्र
के लिए थोड़ी दूर भी ऊपर नहीं होंगी ?' पण्डितराज गङ्गालहरी के एक-एक पद्य
रचते सुनाते थे और गङ्गा एक-एक सीढ़ी ऊपर आ रही थी और अन्तिम पद्य समाप्त
होते ही एक ऐसा तरङ्ग आया जो पण्डितराज को समेटे हुए प्रवाह में विलीन कर
लिया, माता ने पुत्र को गोद में ले लिया ।
पण्डितराज जगन्नाथ की रचनाएँ
१. शृङ्गारविलास — १८० पद्य ।
२. आसफविलास — गद्याख्यान, शाहजहाँ की कश्मीरयात्रा एवं वहाँ के नवाब
आसफखान से मुलाकात ।
३. करुणविलास ( पत्नीवियोग में विलाप ) — १९ पद्य ।
४. प्रास्ताविक विलास — १२२ पद्य ।
५. शान्तिविलास — निर्वेद पद्य-४४ ।
६. जगदाभरण'— ५३ पद्य—बीकानेर के राजा जगत्सिंह की प्रशंसा ।
७. प्राणाभरण — ५३ पद्य—कामरूप (कूचबिहार) के राजा प्राणनारायण की प्रशंसा ।'
यह 'जगदाभरण' में ही नामपरिवर्तन करके प्रस्तुत किया गया है ।
८. यमुनावर्णन — गद्य, अनुपलब्ध, रसगङ्गाधर के मध्यम काव्य के उदाहरण में
इसकी पंक्ति उद्धृत है ।
९. लहरी-पञ्चक—
( १ ) गङ्गालहरी — ५३ पद्य, इसे ही पीयूषलहरी भी कहते हैं— “इमां पीयूष-
लहरीं जगन्नाथेन निर्मिताम्” !
( २ ) यमुनालहरी — १९ पद्य, इसे ही अमृतलहरी कहते हैं ।
( ३ ) करुणालहरी — ५५ पद्य, कृष्ण की स्तुति ।
( ४ ) लक्ष्मीलहरी — ४१ पद्य ।
( ५ ) सुधालहरी — ३० पद्य, सूर्यस्तुति ।
१०. भामिनीविलास — ५८८ पद्य ।
११. चित्रमीमांसाखण्डन — अप्पयदीक्षितकृत चित्रमीमांसा अलंकारशास्त्रीय ग्रन्थ का
खण्डन ।
१२. मनोरमाकुचमर्दन — भट्टोजिदीक्षितकृत प्रौढमनोरमा ( व्याकरणशास्त्रीय व्याख्या-
ग्रन्थ ) का खण्डन ।