रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
प्रथमाननम् २६५
यथाऽमरुककविपद्ये—
शून्यं वासगृहं विलोक्य शयनादुत्थाय किंचिच्छनै-
र्निद्राव्याजमुपागतस्य सुचिरं निर्वर्ण्य पत्युर्मुखम् ।
विस्रब्धं परिचुम्ब्य जातपुलकामालोक्य गण्डस्थलीं
लज्जानम्रमुखी प्रियेण हसता बाला चिरं चुम्बिता ॥
अत्रोत्थाय किंचिच्छनैरित्यत्र सवर्णझयद्वयसंयोगस्तत्रापि नैकट्येनेति
अधुना मुक्तकरचनापटीयसोऽमरुकस्य शल्यकर्म कर्त्तुमारभते – यथेत्यादिना ।
शून्येत्यादि । प्रथमावतीर्णमदनाविकारक्रियावर्णनमिदम् । नवोढा मुग्धा स्ववास-
गृहं कौतुकागारं शून्यं स्वपतिभिन्नजनरहितं विलोक्य, शयनात् शय्यायाः वलयादि-
क्वणनेन पतिनिद्राभङ्गभयात् शनैः किञ्चिदपरकायेन उत्थाय निद्राया व्याजं
छलमुपागतस्य प्रियत्वेनाऽनुभवाभावात् पत्युः मुखं सुचिरं निर्वर्ण्यीयवलोक्य विस्रब्धं
विश्वासयुक्तं यथा स्यात्तथा परिचुम्ब्य तस्य गण्डस्थलीं तच्चुम्बनप्रभावेण जात-
पुलकां दृष्ट्वा पतिजागरणनिश्चयात् लज्जया नम्रमुखी जाता, अथ च व्याज-
साफल्येन हसता तेन प्रियेण चिरं चुम्बिताऽभूदित्यर्थः ।
अत्र विलोक्येत्यादौ पदपञ्चके विहिते क्त्वाप्रत्यये समानकर्तृकत्वमुपपादयितु
लज्जेति पृथगसमस्तं पदं लज्जत इति लज्जेति पचाद्यजन्तं वा अर्शाद्यजन्तं वा
मन्यन्ते मर्मप्रकाशकृतः । यद्वा लज्जाहेतुकनम्रमुखीभवनक्रियापेक्षमेव विलोकनादि-
क्रियायाः समानकर्तृकत्वं पूर्वकालिकत्वं चोपपाद्यम् । तथा च लज्जाशब्दस्य समस्त-
त्वेऽपि न क्षतिः । अधिकं व्यक्तिविवेकादिभ्योऽवसेयम् । अत्र व्यभिचारिणोर्लज्जा-
हासयोः शब्दत उपादाने दोषोऽपि विवेचनीयः ।
अत्रोत्थायेत्यादि । 'त्थ'-शब्दे 'च्छ' शब्दे च सवर्णझयद्वयसंयोगो । यदा
उदाहरणार्थ, अमरुक कवि का 'शून्यं वासगृहं ......' आदि पद्य द्रष्टव्य है
जिसकी रचना में कवि की असावधानी से इतनी कमियां आ गई हैं जिनके कारण
रस-परिपाक हो नहीं पाता । पद्यार्थ इस प्रकार है—
“पतिदेव सोने का बहाना करके आंखें मून्द कर लेटा हुआ था। घर में कोई और
न था । ऐसी स्थिति में एकाएक धीरे से अपने बिस्तर से नायिका उठी और पति
के मुँह को कुछ देर तक देखती रही । फिर जब उसे अपने पतिदेव के सो जाने
का विश्वास हो गया तो उसने उस ( प्रियतम ) का गाल चूम लिया जिससे सोने
का बहाना कर लेटे हुए उसके प्रियतम के गाल पर रोमाञ्च हो उठा । यह देखकर
उस नायिका ने लाज से सर झुका लिया और उसका प्रियतम उसे देर तक
चूमता रहा ।”
इस पद्य के 'उत्थाय किञ्चिच्छनैः' इस अंश में त्-थ् और च्-छ् के संयोग
२६६ रसगङ्गाधरः
सुतरामश्रव्यः । एवं झय्घटितसयोगपरह्रस्वस्यापि । तथा शनैर्निद्रेत्यत्र,
निर्वर्ण्य पत्युर्मुखमित्यत्र च रेफघटितसंयोगस्य, झय्घटितसंयोगपरह्रस्वस्य च
प्राचुर्यम् । विस्रब्धमित्यत्र महाप्राणघटितस्य, लज्जेत्यत्र स्वात्मसवर्णझयद्वय-
घटितस्य मुखी प्रियेणेत्यत्र भिन्नपदगतदीर्घानन्तरस्य संयोगस्य, तथा क्त्वा-
प्रत्ययस्य पञ्चकृत्वः, लोकतेश्च धातोर्द्विः प्रयोगः कवेर्निर्माणसामग्रीदारिद्र्यं
प्रकाशयति । इत्यलं परकीयकाव्यविमर्शनेन । इति संक्षेपेण निरूपिता
रसाः ॥
अथ भावध्वनिर्निरूप्यते—
सकृदेवायं संयोगोऽश्रव्यतापादकस्तदा द्वौ तु सुतरामेव तथा । नैकट्येन प्रयोगे त्वति-
तमाश्रव्यतेति भावः । एवं झय्घटितेत्यादि । 'दु'-शब्दे, 'चि'-शब्दे, 'नि'-शब्दे,
'प'-शब्दादौ च झय्घटितसंयोगपूर्वस्य ह्रस्वस्य बहुलमुपलब्धिः । अन्यत् स्पष्टम् ।
तदेवं साङ्गोपाङ्गं रसनिरूपणमुपसंहरति — इति संक्षेपेणेत्यादि ।।
भावध्वनिरित्यत्र भावशब्दो हर्षादिचतुस्त्रिंशत्पदार्थपरः, तस्य ध्वनिरित्यर्थः ।
सवर्ण-झय् द्वय-संयोग हैं । ये भी आस-पास हैं । अतः अत्यधिक अश्रव्य हैं ।
इन दोनों संयोगों से पूर्व क्रमशः 'उ' और 'इ' ( श्चि-शब्द में ) ह्रस्व स्वरों में भी
अश्रव्यता है । इसी प्रकार 'शनैर्निद्रा......निर्वर्ण्य पत्युर्मुखम्' इस अंश में रेफघटित
संयोगों का अनेक बार प्रयोग किया गया है । 'द्रा' और 'त्यु' इन झय्-घटित
संयोगों से पूर्व 'इ' और 'अ' इन दो ह्रस्व स्वरों का भी प्रयोग हुआ है। 'विस्रब्धम्'
इस पद में 'ब्ध' यह संयोग महाप्राण घकार से घटित है । 'लज्जा' शब्द में पुनः
सवर्णझय्-द्वय-संयोग तथा उससे पूर्व ह्रस्व स्वर का प्रयोग है । 'मुखी
प्रियेण' इस अंश में दीर्घ स्वर (खी-के) ईकार के बाद अन्य पद 'प्रियेण' में 'प्र'
इस संयोग का भी प्रयोग है । एक हीं पद्य में 'विलोक्य', 'उत्थाय', 'निर्वर्ण्य',
'परिचुम्ब्य' और 'आलोक्य' ये पाँच क्त्वा-प्रत्ययान्त पद भी प्रयुक्त हैं । साथ हीं
'लोक्' धातु का भी दो बार प्रयोग किया गया है । इन सबसे यह स्पष्ट है कि
कवि के पास पद्य-रचना के लिए अपेक्षित सामग्री नहीं थी ।
इसी प्रकार अन्यान्य कवियों की रचनाओं में भी दोषों का अनुसन्धान पाठकों
को स्वयं करना चाहिए । दूसरे के काव्य के दोषों का इस ग्रन्थ में अधिक विवेचन
करना सम्भव नहीं ।
उपर्युक्त रीति से रसों तथा इनसे सम्बद्ध विषयों का निरूपण किया गया ॥
अब भाव-ध्वनियों का निरूपण किया जा रहा है—
प्रथमाननम् २६७
अथ किं भावत्वम् ? विभावानुभावभिन्नत्वे सति रसव्यञ्जकत्वमिति
चेत् ? रसकाव्यवाक्येऽतिव्याप्त्यापत्तेः, अर्थद्वारा शब्दस्यापि व्यञ्जकत्वात् ।
द्वारान्तरनिरपेक्षत्वेन व्यञ्जकत्वे विशेषिते त्वसंभवः प्रसज्येत । भावस्यापि
भावनाद्वारैव व्यञ्जकत्वात्, भावनायामतिव्याप्त्यापत्तेश्च । अत एव च
विभावानुभावभिन्नत्वस्येव शब्दभिन्नत्वस्यापि तद्विशेषणत्वे न निस्तारः;
रसकाव्येति । रसाभिव्यंजककाव्येत्यर्थः । काव्ये रसाभिव्यञ्जकत्वं च तद-
भिव्यंजकार्थोपस्थापनद्वारेणेति सम्प्रदायः 'अर्थस्य व्यंजकत्वे तत् शब्दस्य सहका-
रिता' इत्यादिना वर्णितः । तदाह—अर्थद्वारेत्यादिना । लक्षणवाक्ये साक्षाद्व्यजक-
त्वानुक्तेः परम्परया रसव्यञ्जके काव्यवाक्येऽतिव्याप्तिरुक्ता । भावनायामित्यादि ।
भावनाया द्वारान्तरनिरपेक्षाया एव रसव्यञ्जकत्वादिति भावः । न निस्तार इति ।
भावनायां शब्दभिन्नत्वस्यापि सत्त्वेन तत्रातिव्याप्तेर्यथापूर्वमवस्थानादित्यर्थः ।
इस प्रसङ्ग में सर्वप्रथम यह विवेचनीय है कि 'भाव'' कहते किसे ? इसका
क्या लक्षण है ? 'विभाव और अनुभाव से भिन्न जो रस-व्यञ्जक तत्त्व है वह
भाव है' यह कहना तो उचित नहीं है, क्योंकि रस-व्यञ्जक काव्यात्मक वाक्य में
इस लक्षण की अतिव्याप्ति स्पष्ट है । उक्त काव्य-में विभावानुभाव-भिन्नत्व भी है,
और रस-व्यञ्जकत्व भी, क्योंकि रस-व्यञ्जक अर्थ का प्रतिपादक होने से काव्य को
रस-व्यञ्जक कहना कविसम्प्रदाय में प्रसिद्ध है । यदि 'विभाव-अनुभाव से भिन्न
और रस के साक्षाद् व्यञ्जक को भाव' कहा जाय तो उक्त अतिव्याप्ति तो नहीं
होगी, क्योंकि काव्य-वाक्य में अर्थ-द्वारा रस-व्यञ्जकता होती, साक्षात् नहीं ।
परन्तु असम्भव तो होगा हीं, कारण एक भी 'भाव' बिना भावना के रस-व्यञ्जक
नहीं होता । ऐसी स्थिति में सब भावों में भावना-द्वारा हीं रस-व्यञ्जकता के
प्रसिद्ध होने से ( किसी भी भाव के साक्षाद् रस-व्यञ्जक न होने से ) किसी
भी भाव में उक्त लक्षण समन्वित न हो सकेगा । इसके साथ हीं, भावों की
'भावना' में उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति भी होगी हीं, क्योंकि भावों की भावना
साक्षाद् रस-व्यञ्जक भी है और विभावानुभाव से भिन्न भी । 'भाव' की भावना
में इस अतिव्याप्ति के कारण हीं 'विभाव-अनुभाव से भिन्न, शब्द से भिन्न और
साक्षाद् रस-व्यंजक तत्त्व को भाव' कहना भी सम्भव नहीं, क्योंकि भाव की
१. यहाँ परिष्कार भावत्व का अभीष्ट है जिसके आश्रय को 'भाव' कहा जाना
सम्भव है । परन्तु सरलता की दृष्टि से इन सब लक्षणों को भाव के लक्षण
कहा गया है । इससे इन लक्षणों के अनुसार भावत्व का स्वरूप क्या होगा —
यह समझना सरल हो जायेगा ।
२६८ रसगङ्गाधरः
प्रधानध्वन्यमानभावे रसव्यञ्जकताभावादव्याप्त्यापत्तेश्च । न च तत्रापि
प्रान्ते रसोऽभिव्यज्यत एवेति वाच्यम्, भावध्वनिविलोपप्रसङ्गात् । भावचम-
त्कारप्रकर्षाद्भावध्वनित्वम्, रसस्तु तत्र व्यज्यमानोऽप्यचमत्कारित्वान्न
ध्वनिव्यपदेशहेतुरित्यपि न शक्यं वदितुम् । चमत्काररहितरसव्र्यक्तौ
मानाभावात् । रसे, हि धर्मिग्राहकमानेनानन्दांशाऽविनाभावस्य प्रागेवावे-
दनात् ।
प्रधानेत्यादि । यत्र भावस्यैव प्राधान्येन ध्वननम्, न तु रसस्य तेन, तथा सति
गुणस्य भावस्य ध्वनिव्यपदेशानुपपत्तेरित्यतः तस्मिन् भावे यथाकथञ्चिदपि
रसव्यंजकत्वाभावाद् भावक्षणाऽव्याप्तिः । दर्प णोयुक्तदिशो निराकरणार्थ-
माह—नचेत्यादि । प्रान्ते = भावध्वननानन्तरम् । विलोप इति । रसस्य
प्रान्तेऽभिव्यज्यमानस्यैव प्रधानतया ध्वनिव्यपदेशहेतुत्वेन तदङ्गभूतभावस्या-
प्रधानस्य कुत्रापि ध्वनिव्यपदेशहेतुत्वानुपपत्तेरित्यर्थः । भावचमत्कारेत्यादिः
पूर्वपक्षः । चमत्कारातिशयनिमित्तकस्तु रसाङ्गीभूतेऽपि भावे ध्वनित्व-
व्यवहार उपपन्न इत्याशयः पूर्वपक्षस्य । चमत्काररहितेत्यादिरुत्तरपक्षः ।
निरतिशयचमत्काररहितेत्यर्थः । यो हि रसः स निरतिशयचमत्कारवानेव, यश्च न
निरतिशयचमत्कारवान् स न रस इत्याशय उत्तरपक्षस्य । एतमेवोपपादयति—रसे
हीत्यादिना । आनन्दांश एव निरतिशयचमत्कारविशिष्टो, न कश्चिदन्यः । तथा
भावना के भी शब्दभिन्न होने से उक्त अतिव्याप्ति दोष इस तृतीय-पक्ष में भी
यथापूर्व बना हीं रहता है । इसके अतिरिक्त, इस तृतीय लक्षण की भाव-ध्वनि
में अव्याप्ति भी होगी हीं, क्योंकि ध्वन्यमान भाव रस व्यंजक नहीं होते । यदि
कोई भी भाव पहले व्यञ्जित होकर भी पश्चात् रस का व्यंजक हो जाय तो उसे
ध्वनि—भाव-ध्वनि कहा नहीं जा सकता । कोई भी तत्त्व 'ध्वनि' तभी कहा
जाता जब वह प्रधान रूप में अभिव्यक्त होता हो । स्वयम् अभिव्यक्त होकर
दूसरे की अभिव्यक्ति करने वाला तो उस अभिव्यज्यमान अन्य तत्त्व का
अङ्ग बन जाता । ऐसी स्थिति में तृतीय लक्षण करने पर तो भाव ध्वनि का
अस्तित्व हीं मिट जाएगा । अतः तृतीय लक्षण असंगत है । भाव द्वारा अन्ततः रस
का अभिव्यंजन होने पर भी जहाँ अभिव्यज्यमान रस की अपेक्षा उसका
अभिव्यंजक भाव अधिक आकर्षक—चमत्कारजनक (और वाच्यार्थ की अपेक्षा प्रधान)
हो वही भाव-ध्वनि कहलाता, अन्य नहीं; अतः तृतीय लक्षण करने पर भी भाव-
ध्वनि के अस्तित्व का मिटना और उस कारण भाव-ध्वनि में अव्याप्ति दिखलाकर
तृतीय लक्षण का खण्डन करना अनुचित है—यह तर्क भी असंगत है, क्योंकि एक
अस्तु वा प्राधान्येन ध्वन्यमानस्यापि भावस्य प्रान्ते रसाभिव्यञ्ज-
कत्वम् । तथापि देशकालवयोवस्थादिनानापदार्थघटिते पद्यवाक्यार्थे तथा-
प्यतिव्याप्तिः, तस्य विभावानुभावभिन्नत्वे सति रसाभिव्यञ्जकत्वात् ।
च रसस्याविर्भूतानन्दांशस्य चमत्कारातिशयवत्त्वस्य नियतत्वेन रसव्यञ्जकत्वे
भावस्य चमत्कारातिशयवत्त्वानुपपत्तिरिति न ध्वनिव्यपदेश्यत्वं सम्भवतीति भावः ।
धर्मिग्राहकमानमत्र सहृदयहृदयं तत्करणकः साक्षात्कारो वा, तदिदं मानं यदा रस-
मास्वादयति तदाविर्भूतानन्दांशमेव तम्, न तद्रहितमित्यर्थः ।
शिष्यबुद्धिवैशद्यायाभ्युपगमवादेनाह — अस्तु वेति । अस्मिंश्च पक्षे आनन्दाऽ-
विनाभूतरसापेक्षया भावस्य चमत्कारातिशयवत्त्वाभावेऽपि प्राधान्यस्य सापेक्षतया
व्यज्यमानस्य तस्य वाच्यातिशायित्वाद् भवति ध्वनिव्यवहारोपपत्तिरिति तात्पर्य-
मवसेयम् । सर्वस्यैव पदार्थस्य विभावाद्यन्यतमत्वेन तद्भिन्नत्वं न घटते ।
अतो वाक्यार्थेऽतिव्याप्तिरुच्यते, तस्य विभावाद्यन्यतमत्वाभावात् — तथापीति ।
प्राधान्येन ध्वन्यमानस्य भावस्य प्रान्ते रसाभिव्यञ्जकत्वस्वीकारेऽपि-
इत्यर्थः । तथाप्यतिव्याप्तिः इत्यत्र 'तस्यातिव्याप्तिः' इति पाठः श्रेयान् ।
तस्य = विभावानुभावभिन्नत्वे सति शब्दभिन्नत्वे सति रसाभिव्यञ्जकत्वमिति
लक्षणस्य । तथापीति पाठेऽपि अयमेवार्थस्तस्य । दर्पणादौ त्वत्रापि रसापे-
क्षयाप्यस्य भावस्य प्राधान्यमुक्तम् राजानुगम्यमानविवाहप्रवृत्तभृत्यवत् ।
ओर कोई रस अभिव्यक्त भी हो और दूसरी ओर वह रस सर्वाधिक चमत्कारी
न हो यह असम्भव है । यदि रस की अभिव्यक्ति होती तो उसे सर्वाधिक
चमत्कारी होना हीं है, क्योंकि जिस प्रमाण से रस का आस्वादन या अस्तित्व सिद्ध
होता वह प्रमाण उसे आनन्दातिशययुक्त तत्त्व के रूप में हीं सिद्ध करता, आनन्द-
रहित तत्त्व के रूप में नहीं । अतः जब रस आनन्दातिशययुक्त होकर हीं अभिव्यक्त
होता तो उसे अन्य भावादि की अपेक्षा कम चमत्कारी कैसे कहा जा सकता ? अतः
भावध्वनि-स्थल में अन्त में रस की अभिव्यक्ति मानने का प्रश्न हीं नहीं उठता ।
ऐसी स्थिति में भाव ध्वनि में पूर्वप्रदर्शित अतिव्याप्ति का कथमपि निराकरण नहीं
किया जा सकता । अतः उपर्युक्त तृतीय लक्षण असंगत है ।
यदि भावध्वनि-स्थल में भी कथञ्चित् रसाभिव्यक्ति मान ली जाय तो भी
उक्त तृतीय लक्षण को निर्दुष्ट नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भाव-ध्वनि में अति-
व्याप्ति न होने पर भी देश-काल-वय अवस्था आदि से घटित काव्यार्थ में विभावानु-
भावभिन्नत्व, शब्दभिन्नत्व और रसाभिव्यंजकत्व इन तीनों अंशों के वर्तमान होने
से उस (काव्यार्थ) में अतिव्याप्ति तो अपरिहार्य है ।
२७० रसगङ्गाधरः
नापि रसाभिव्यञ्जकचर्वणाविषयचित्तवृत्तित्वं तत्त्वम्; भावादिचर्व-
णायामतिप्रसङ्गवारणाय चर्वणाविषयेति चित्तवृत्तिविशेषणमिति वाच्यम् ।
कालागुरुद्रवं सा हालाहलवद्विजानती नितराम् ।
अपि नीलोत्पलमालां बाला व्यालावलिं किलामनुते ॥
तत्त्वम् = भावत्वम् । ‘नाऽपि’ इत्यस्याग्रिमेण वाच्यमित्येनेनान्वयः । रसाभि-
व्यञ्जकचित्तवृत्तित्वमात्रस्य लक्षणत्वेनाङ्गीकारे दोषं प्रदर्शयन् चर्वणाविषयेति
विशेषणकृत्यमाह—भावादीत्यादिना । उक्तविशेषणाभावे भावादिचर्वणाया अपि
रसाभिव्यञ्जकत्वेन चित्तवृत्तित्वेन च तस्यामतिव्याप्तिः, चर्वणाविषयेति चित्तवृत्ति-
विशेषणोपादाने तु नातिव्याप्तिः, भावादिचर्वणायाश्चित्तवृत्तित्वेपि चर्वणाविषय-
त्वाभावात् । न हि चर्वणा चर्वणाविषयः, तथा सत्यनवस्थाप्रसङ्गात् । एकस्याश्चित्त-
वृत्तेश्चर्वणाख्यचित्तवृत्तिविषयत्वे तु न तथेति चित्तवृत्तिविशेषरूपस्य भावस्य चर्वणा-
स्वरूपविजातीयचित्तवृत्तिविषयत्वे सत्यपि न दोषः । पद्यवाक्यार्थेऽतिव्याप्तिस्तु न,
वाक्यार्थैकदेशस्य क्वचित् चित्तवृत्तिरूपत्वेऽपि वाक्यार्थस्य तथात्वाभावाद् इत्याशयः
पूर्वपक्षस्य । स च निरस्यते—‘नापि...वाच्यम्’ इत्यनेन । हेतुरत्रोच्यते—कालागुरु-
द्रवेत्यादिना ।
अब ‘भाव’ के निम्ननिर्दिष्ट चतुर्थ लक्षण का भी विवेचन कर लेना चाहिए ।
यह लक्षण इस प्रकार है—‘रस का अभिव्यंजन करने वाली चर्वणा का विषय जो
चित्तवृत्ति हो वही भाव है ।’ यद्यपि भावों की चर्वणा भी एक प्रकार की चित्त-
वृत्ति हीं है तथापि यह चर्वणा तो भाव है नहीं । अतः रसाभिव्यंजक चित्तवृत्ति
मात्र को यदि भाव कहा गया होता तो भावचर्वणा-स्वरूप चित्तवृत्ति में, जो
स्वयं भाव नहीं है, इस भाव-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जाती । इसी के निरा-
करणार्थ इस लक्षण में ‘चर्वणा का विषय’ यह चित्तवृत्ति का विशेषण जोड़ दिया
गया है । अब भावचर्वणा-स्वरूप चित्तवृत्ति में अतिव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि
यह चर्वणारूप चित्तवृत्ति स्वयं ‘चर्वणा का विषय’ नहीं होती। एक चर्वणा को दूसरी
चर्वणा का विषय मानने में अनवस्था होगी, क्योंकि तब तो दूसरी चर्वणा को
तीसरी चर्वणा का, तीसरी को चौथी का विषय मानना अपरिहार्य हो जाने से
प्रत्येक प्रथम चर्वणा को उत्तरकालिक दूसरी चर्वणा का विषय मानना हीं होगा ।
इस प्रकार ‘चर्वणा का विषय’ इस विशेषण से चर्वणा में अतिव्याप्ति न होने से
यह चतुर्थ लक्षण आपाततः निर्दोष अवश्य प्रतीत होता । परन्तु विवेचन करने पर
इसकी भी अतिव्याप्ति हो हीं जाती है । इसे स्पष्ट करने के लिए पहले ‘काला-
गुरुद्रवं सा...’ आदि पद्य का अर्थ जान लेना चाहिए—
इत्यत्र हालाहलसदृशत्वप्रकारज्ञाने अतिव्याप्तेः। तस्य विप्रलम्भानु-
भावत्वेन रसाभिव्यञ्जकचर्वणाविषयत्वात्, चित्तवृत्तित्वाच्च। नाप्यखण्डम्;
तत्त्वे मानाभावात्। अत्रोच्यते--
कालागुरुद्रवेत्यादि। सा विरहकातरा बाला मुग्धा नायिका कालागुरुद्रवं
विरहोद्दीपकत्वाद् हालाहलवन्नितरां विजानती नीलोत्पलमालामपि व्यालावलिं
सर्पपंक्तिम् आ समन्तान्मनुते। किलेत्युत्प्रेक्षायाम्, वाक्यालङ्कारे वा। अत्र
वाचकलुप्तोपमोत्तरार्द्धे, रूपकमेव वा।
अनुभावत्वेनेति। विप्रलम्भकार्यत्वादित्याशयः। चित्तेत्यादि। ज्ञानमात्रस्य
चित्तवृत्तित्वेन हालाहलसदृशत्वप्रकारज्ञानस्यापि चित्तवृत्तित्वं स्पष्टम्। मानाभावा-
दिति। कारणतावच्छेदकतया, कार्यतावच्छेदकतया, शक्यतावच्छेदकतादितया वा
अनुगतप्रतीतिजनकस्याखण्डधर्मस्य सिद्धौ तस्य नित्यत्वे सत्यनेकसमवेतत्वाभा-
वाज्जातिबाधकत्त्वाक्रान्तत्वाद्वा जातित्वाऽसिद्धावखण्डोपाधित्वं सिद्ध्यति। प्रकृते
च विविधभावानां विविधकारणजन्यानां तद्व्यक्तित्वेनैव कार्यत्वं न तु भावत्वेन,
अतिप्रसक्तत्वादभावत्वस्य; विविधभावानां विविधास्वादजनकत्वेन च न भावत्वं
कारणतावच्छेदकमपि; विलक्षणहर्षादिषु सर्वेषु भावव्यपदेशस्य कविसम्प्रदायमात्र-
प्रसिद्धतया सर्वेषु भावेषु भावो भाव इत्यनुगतप्रतीत्यभावाच्च न भावत्वस्य तज्जन-
कत्वमपि; भावत्वेन रूपेण हर्षादीनां हर्षादिशब्दशक्यत्वाभावाच्च न तस्य शक्यता-
वच्छेदकत्वमपीति तस्याखण्डोपाधित्वे न किमपि मानमित्याशयः। यद्यपि
भावशब्देन सकलभावानामभिधाने भावत्वस्यैव शक्यतावच्छेदकत्वं तथापि भावशब्द-
स्यात्र पारिभाषिकतयाऽनुगतप्रतीत्यजनकत्वादेवाखण्डोपाधित्वाभाव इति हृदयम्।
"वियोगाकुल होने से काले अगर (=सुगन्धित-लकड़ी) के रस (घोल) को भी
विष के समान समझने वाली यह मेरी नवोढ़ा सखी नीले कमलों की माला को
भी साँप समझ रही है॥"
इस पद्य में 'कालागुरुद्रव में नवोढ़ा का विषसदृशत्व ज्ञान' उस नायिका में
आश्रित विप्रलम्भ शृङ्गार का अनुभाव (कार्य) है और इसीलिए विप्रलम्भ शृङ्गार
के अभिव्यञ्जक चर्वणा का विषय भी है हीं। उक्त ज्ञान के चित्तवृत्ति-स्वरूप होने
मे भी कोई सन्देह नहीं है। ऐसी स्थिति में रसाभिव्यञ्जक चर्वणा का विषय जो
विषसदृशत्व ज्ञानस्वरूप चित्तवृत्ति, जो वस्तुतः अनुभाव है (व्यभिचारी) भाव नहीं,
उसमें इस चतुर्थ भाव-लक्षण की अतिव्याप्ति का निराकरण नहीं किया जा सकता।
अतः यह लक्षण भी असंगत है। भावत्व का अखण्डोपाधि मानने में भी कोई
प्रमाण न होने से भावत्वाश्रय को भाव कहना भी संगत नहीं है।
२७२ रसगङ्गाधरः
विभावादिव्यज्यमानहर्षाद्यन्यतमत्वं तत्त्वम् ॥
यदाहुः— व्यभिचारी तथाञ्जितः । भावः' इति । हर्षादीनां च सामा-
जिकगतानामेव स्थायिभावन्यायेनाभिव्यक्तिः ।
विभावादीत्यादि । विभावादिव्यज्यमानत्वे सति हर्षाद्यन्यतमत्वं भावत्वमिति
लक्षणार्थः । तत्र हर्षाद्यन्यतमत्वमात्रोक्तौ लौकिकहर्षादावतिव्याप्तिरतो विभावादि
व्यज्यमानत्वमिति विशेषणम् । विभावादिव्यज्यमानत्वमात्रोक्तौ रसेऽतिव्याप्तिरतो
हर्षाद्यन्यतमत्वमप्युक्तम् । विभावादिरित्यत्रादिशब्दादनुभावस्य क्वचिच्च व्यभि-
चारिणोऽपि परिग्रहः ।
उक्तेऽर्थे मम्मटोक्तिं प्रमाणत्वेनोपन्यस्यति—यदाहुरित्यादिना । “व्यभिचारी
तथाञ्जितः । भावः······' इति शुद्धः पाठः (द्र० का० प्र० ४।३२-३६) । 'व्यभि-
चार्यञ्जितो भावः' इति मुद्रितः पाठस्त्वमूलगतत्वादस्माभिरुपेक्षितः । विभावा-
दिभिरञ्जितो व्यंजितो यो व्यभिचारी निर्वेदादिर्हर्षादिर्वा स भाव इति मम्मट
वचनार्थः ।
स्थायिभावन्यायेनेति । यथा कामिन्यादिविषया रत्यादयो वर्त्तमाना एव
सामाजके विभावादिसामग्रीबलादलौकिकत्वमापन्नाः स्थायितया व्यज्यन्ते तथैव
देवादिविषया रत्यादयोऽपि पूर्वत एव सामाजिकहृदये वर्त्तमाना विभागादिसामग्री
बलादलौकिकत्वेन रूपेणाभिव्यक्ता भवन्ति, अत एव च भावपदव्यपदेश्या
उपर्युक्त स्थिति को ध्यान में रखते हुए ग्रन्थकार अब इन ( व्यभिचारी )
भावों का परिष्कृत लक्षण प्रस्तुत कर रहे हैं—
विभाव और अनुभाव से व्यज्यमान हर्ष आदि (३४) चित्तवृत्तियों को 'भाव'
कहा जाता है।
अत एव मम्मट ने कहा है—“( विभाव आदि से ) अभिव्यक्त होने वाले
( निर्वेद, ग्लानि आदि ) को 'व्यभिचारिभाव' कहते ॥”
ये हर्षादि सामाजिक मे पहले से होते । किन्तु स्थायिभाव के समान इनकी
विभावादि-सामग्री से अभिव्यक्ति होने पर हीं ये 'भाव' कहलाते, अन्यथा नहीं ।
तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार सामाजिकनिष्ठ रत्यादि हीं विभावादि सभी सामग्री
से अभिव्यक्त होने पर शृङ्गारादि रसों के 'स्थायिभाव' कहलाते, अन्यथा नहीं
उसी प्रकार सामाजिकगत हर्षादि के लिए 'भाव' या 'व्यभिचारिभाव' शब्द का
प्रयोग तभी होता है जब ये अपनी सामग्री से अभिव्यक्त होते, अन्यथा नहीं ।
यह भी ज्ञातव्य है कि रत्यादि 'स्थायिभाव' रूप में भी अभिव्यक्त होते ओर
'व्यभिचारिभाव' के रूप में भी । किन्तु दोनों में अन्तर यही है कि ये जब सकल
प्रथमाननम् २७३
अपीति तात्पर्यम् । तथापि यदा परिपूर्णा विभावादिसामग्री रत्यादेरभिव्यञ्जिका
तदा ध्वन्यमान्यो रत्यादिर्भजते रसव्यपदेशमन्यथा तु भावव्यपदेशम् । अत एवैषां
व्यभिचारित्वमप्युपपद्यते । तदुक्तं संगीतरत्नाकरे—
रत्यादयः स्थायिभावाः स्युर्भूयिष्ठविभावजाः ।
स्तोकैर्विभावैरुत्पन्नास्त एव व्यभिचारिणः ॥ इति ॥
शब्दान्तरेण—
रत्यादिश्चेन्निरङ्गः स्याद् देवादिविषयोऽथवा ।
अन्याङ्गभावभाग्वा स्यान्न तदा स्थायिशब्दभाक् ॥
इत्यनेन प्रदीपेऽप्येतदुक्तमेव ।
इदन्तु बोध्यम्—सविषयकाणां पदार्थानां विषयभेदाद् भेदस्य सर्वतन्त्रसिद्धान्त-
सिद्धतया नायिकादिविषयकरत्यादेः देवादिविषयकरत्यादिभिन्नत्वेऽपि रतित्वेन
साजात्यमादाय 'त एव' इत्युक्तम् । 'स्तोकैर्विभावैः' इत्यस्यायमाशयः—स्थायि-
भावाभिव्यञ्जिका विभावादिसामग्री सकला, भावाभिव्यञ्जिका पुनर्विकला । भावा-
भिव्यञ्जने हि क्वचिदालम्बनत्वे सत्यपि आलम्बनत्वादिनो विशेषरूपेण विभावादेर्न
कारणत्वम्, बहूनां भावानां निर्विषयत्वेन विषयरूपालम्बनस्य तत्रासम्भवात् ।
यत्पुनरुद्दीपनविभावस्यावश्यकत्वं तदपि नोद्दीपनत्वेन विशेषरूपेण कारणत्वमभिप्रेत्येति
स्वयमपि 'विभावस्त्वत्र व्यभिचारिणो निमित्तकारणसामान्यम्' इत्यनेन वक्ष्यत्येव ।
अधिकमनुपदं वक्ष्यते ।
सामग्री से अभिव्यक्त होने के कारण प्रधान रूप में योग्य आलम्बन को विषय बनाते
तब ये 'स्थायिभाव' होते, विकल सामग्री से अप्रधानरूप में अभिव्यक्त होने पर 'व्यभि-
चारि-भाव' कहलाते । विकल सामग्री का अभिप्राय यही है कि व्यभिचारि-भाव के रूप
में इनकी अभिव्यक्ति के लिये आलम्बन-उद्दीपन आदि की विशेष रूप में (आलम्बन-
त्वादि रूप में ) अपेक्षा नहीं होती । कुछ निर्विषयक व्यभिचारि-भाव तो ऐसे हैं
जिनके आलम्बन विभाव होते ही नहीं । जिनके सविषय होने से आलम्बन-विभाव
होते भी उनकी भी अभिव्यक्ति के लिये आलम्बन-विभाव की विशेष रूप में (आलम्बन-
त्वेन रूपेण) नहीं अपि तु सामान्य निमित्त कारण के रूप में ही आवश्यकता होती ।
यही स्थिति उद्दीपन-विभाव की भी है । परन्तु 'स्थायिभाव' की अभिव्यक्ति के लिये
तो आलम्बन और उद्दीपन इन दोनों ही विभावों की आवश्यकता विशेषरूप में होती
ही है, सामान्य रूपमात्र में नहीं । स्वयं ग्रन्थकार ही 'विभावस्त्वत्र व्यभिचारिणो
निमित्तकारणसामान्यम्' इत्यादि वचनों द्वारा इस तथ्य को स्पष्ट करेंगे ।
इस प्रकार 'स्थायिभाव-न्याय से व्यभिचारि-भाव की अभिव्यक्ति' का तात्पर्य
२७४ रसगङ्गाधरः
सापि रसन्यायेनेति केचित् ।
व्यङ्ग्यान्तरन्यायेनेत्यपरे मन्यन्ते ।
रसन्यायेनेति : यथा विभावादिसकलसामग्रीचर्वणाभग्नावरणचिद्विशिष्टो
रत्यादिरूपो भग्नावरणरत्याद्युपहितचित्स्वरूपो वा रसोऽभिव्यज्यते चर्व्यते तथैव
विभावादिचर्वणाभग्नावरणचिद्विशिष्टो हर्षादिभावोऽपीत्यर्थः । इदं चाभिनवगुप्तादि-
मतेनोक्तम् ।
स्वमतमाह—व्यङ्ग्यान्तरन्यायेनेति । व्यङ्ग्याद्रसादन्यो व्यङ्ग्योऽलङ्का-
रादिर्व्यङ्ग्यान्तरम्, तस्य यथा स्वसामग्रीबलेनाभिव्यक्तिस्तथैव हर्षादिभावाना-
मप्यभिव्यक्तिरित्यर्थः । 'अपरे' इत्यस्य 'न परे' इत्यर्थात् स्वमतमिदमिति प्रतीयते ।
अस्य मतस्येदं सारम्—यावानानन्दो रसचर्वणायामनुभूयते सामाजिकैस्तावन्नानन्दो
नालङ्कारादिव्यङ्ग्यचर्वणायामिति वस्तुगतिः । तथा च विभावादिसकलसामग्री-
चर्वणया आनन्दरूपायाश्चितो यादृश आवरणभङ्गस्तादृशो नालङ्कारादिविषय इत्या-
स्थेयं फलबलात् । यत्किञ्चिदानन्दमात्रानुभवाच्चालङ्कारध्वनावपि तदधिष्ठानभूताया-
स्तदुपहिताया वा चित (आनन्दरूपायाः) आनन्दावरणस्य शैथिल्यं पुनरवश्याभ्युपेयम्,
सर्वथा सत्यावरणे तत्रानन्दमात्राप्रत्ययाऽसम्भवात् । एवं भावध्वनावपि रसाप-
कृष्टानन्दमात्रानुभवोपपादनाय विकलविभावादिसामग्रीचर्वणया हर्षाद्यधिष्ठान-
चैतन्यस्य यदावरणं तस्य यथानुभवं यथायथं शैथिल्यमवश्यमास्थेयम् । सकल-
स्पष्ट करना चाहिए।
उपर्युक्त भावाभिव्यक्ति रसाभिव्यक्ति के तुल्य होती—ऐसा कुछ (अभिनव
गुप्त आदि) आचार्यों का मत है। आशय यही है कि जिस प्रकार विभावादि-सकल-
सामग्री की चर्वणा से जिसका आवरणभङ्ग हो चुका होता उस 'चित्' से विशिष्ट रत्यादि
की रस-रूप में अभिव्यक्ति होती उसी प्रकार विभावादि-विकल-सामग्री की चर्वणा
से जिसका आवरण (आंशिक रूप में) हँट चुका होता उस 'चित्' से विशिष्ट हर्षादि
भावों की अभिव्यक्ति होती। इस मत में रस-चर्वणा और भाव-चर्वणा में समान
आनन्दानुभव होना चाहिए था, किन्तु ऐसा होता नहीं। साथ ही सकल सामग्री और
विकल सामग्री से समान रूप में 'चित्' के आवरण का अभिभव मानना भी उचित
नहीं है।
अतः ग्रन्थकार का मत यही है कि रस-चर्वणा और भाव-चर्वणा में अनुभूय-
मान आनन्द के उत्कर्षापकर्ष के अनुसार दोनों प्रकार की सामग्रियों से होने वाले
आवरण भङ्ग में भी उत्कर्षापकर्ष अवश्य मन्तव्य है। अतः जैसे रस-चर्वणा की अपेक्षा
स्वल्प आनन्द का अनुभव अन्य अलङ्कारादि व्यङ्ग्यों की चर्वणा में होता वैसे ही
प्रथमाननम् २७५
विभावानुभावौ चात्र व्यञ्जकौ । न त्वेकस्मिन्व्यभिचारिणि ध्वन्यमाने
व्यभिचार्यन्तरं व्यञ्जकतयावश्यमपेक्ष्यते, तस्यैव प्राधान्यापत्तेः ।
वस्तुतस्तु प्रकरणादिवशात्प्राधान्यमनुभवति कस्मिंश्चिद्भावे तदीय-
सामग्रीव्यङ्ग्यत्वेन नान्तरीकतया तनिमानमावहतो व्यभिचार्यन्तरस्या-
विभावादिसामग्रीचर्वणया यथावरणभङ्गो न तथा विकलविभावादिसामग्रीचर्वणया।
सम्भवति, तथा तु सति रसानन्दभावानन्दयोस्तुल्यकक्ष्यत्वमनुभवविरुद्धं युक्तिविरुद्धं
चापतेत् । अतश्च यत्रापि देवादिविषयकरत्यादावापातः प्रतीयत आलम्बनादि-
सकलसामग्री तत्रापि फलबलादालम्बनादौ रसचर्वणाप्रयोजकालम्बनादिवैजात्यं
कल्पनीयमेवेति तत्रापि विकलैव सामग्री । यत्र पुनरालम्बनासम्भवो निर्विषयेषु
भावेषु तत्र सामग्रीव
२७६ रसगङ्गाधरः
ङ्गत्वेऽपि न क्षतिः । यथा गर्वादावमर्षस्य, अमर्षादौ वा गर्वस्य । न चैवं
सति गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वापत्तिः, पृथग्विभावानुभावाभिव्यक्तस्यैव ( भावस्य )
गुणीभूतव्यङ्ग्यव्यपदेशहेतुत्वात् । अत एव न नान्तरीयकस्य भावस्य
ध्वननं भवति । अन्यथा गर्वादिध्वनेरुच्छेद एव भवेत् ।
नान्तरीयकस्यापि भावस्य प्रधानभावाङ्गभूतस्य व्यङ्ग्यत्वेन तमादाय गुणीभूत-
व्यङ्ग्यत्वं कथं न तत्र सम्भवति—इत्याशङ्कां निरस्यति—न चैवमित्यादिना ।
एषा चाशङ्का विवक्षावशाद्ध्वनेरपि गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वं गुणीभूतव्यङ्ग्यस्यापि
ध्वनित्वमित्यभ्युपगच्छतां ध्वनिकारादीनां मतमनुसृत्य । स्वमते तु यथेच्छं
नान्तरीयकस्य पार्यन्तिकस्यैव वेति नावसरोऽस्या आशङ्कायाः । पृथग्वि-
त्यादि । पृथक् स्वतन्त्रावेकभावाभिव्यञ्जकभिन्नौ यौ विभावानुभावौ ताभ्याम-
भिव्यक्तस्यैव, न त्वेकविभावानुभावाभिव्यक्तस्य, अत एव नान्तरीयकस्य भावस्येत्यर्थः ।
भावस्येत्यनन्तरं चमत्कारातिशयवत इति पूरणीयम् । अभिव्यञ्जकस्य च पृथक्त्वा-
न्नान्तरीयकत्वं न सम्भवतीति हेतोः क्वचित् पुस्तके ( काशीमुद्रिते ) पृथग्विभावानु-
भावाभिव्यक्तस्यैवातएवाऽनान्तरीयकस्य भावस्य गुणीभूतव्यङ्ग्यव्यपदेश-
हेतुत्वात् , अन्यथा गर्वादिध्वनेरुच्छेद एव स्यात् ! इति पाठोऽपि सम्य-
ग्वेव । अत एवेत्यादि । अत्र अत एव नान्तरीयकस्य भावस्य ध्वननं
भवति इति निर्णयसागरमुद्रितः पाठोऽसङ्गतत्वादस्माभिरुपेक्षितः । अत्र ध्वननम्
प्राधान्येनाभिव्यक्तिः । यद्यपि नान्तरीयकस्यात एवाङ्गभूतस्य भावस्याऽप्रधानस्य
( अतिशय-चमत्कार-युक्तता के कारण ) प्रधानता सुनिश्चित हो जाती वहाँ उसी
प्रधान भाव के अभिव्यञ्जक सामग्री से प्रधान भाव के पहले अभिव्यक्त होने वाला
नान्तरीयक भाव प्रधान भाव का अङ्ग हो जाता । फलतः उस नान्तरीयक भाव
की अभिव्यक्ति भी सुस्पष्ट रूप से नहीं हो पाती । इससे वह नान्तरीयक भाव
दुर्बल रूप में प्रतीत होता और उसमें प्रधान भाव के समान चमत्कारातिशय भी
नहीं होता । अतः ऐसा नान्तरीयक भाव यदि किसी ध्वन्यमान भाव का अङ्ग—
व्यञ्जक कदाचित् हो भी तो भी कोई अनुपपत्ति नहीं । इसके उदाहरण के रूप में
'गर्व' का प्राधान्येन अभिव्यञ्जन के लिए उससे पूर्व नान्तरीयक 'अमर्ष' का अभि-
व्यञ्जन या 'अमर्ष' का ही प्राधान्येन अभिव्यञ्जन से पूर्व उसी सामग्री से नान्त-
रीयक रूप में अभिव्यक्त 'गर्व' को लिया जा सकता है । अतः स्पष्ट है कि
नान्तरीयक भाव में वह चमत्कार नहीं होता जो प्रधानीभूत भाव में होता । अत
एव व्यङ्ग्य होने पर भी किसी नान्तरीयक भाव के आधार पर किसी काव्य को
'गुणीभूतव्यङ्ग्य' नहीं कहा जा सकता । 'गुणीभूतव्यङ्ग्य' तो तब कहा जाता है
प्रथमाननम् २७७
विभावस्त्वत्र व्यभिचारिणो निमित्तकारणसामान्यम् । न तु रसस्येव सर्वथै-
वालम्बनोद्दीपने अपेक्षिते । यदि तु क्वचित्संभवतस्तदा न वार्येते ।
भावान्तरापेक्षयाऽतिशयचमत्कारवत्त्वे गुणीभूतव्यङ्ग्यत्वापत्तिस्तथापि स्वमते नान्त-
रीयकस्य भावस्य चमत्कारातिशयवत्त्वं न कथञ्चिदभ्युपेयते, यथा गर्वादावमर्षस्य
अत एव 'नान्तरीयकतया तनिमानमावहतो व्यभिचार्यन्तरस्य' इत्यनुपदमेवोक्तम् ।
तत्र तनिमानमित्यस्य शैथिल्यमत एवाऽचमत्कारित्वमित्यर्थः । यद्यपि चात्र प्रधानी-
भूतस्य भावस्य चमत्कारातिशयजनकत्वेनोत्तमोत्तमकाव्यत्वम्, रसध्वनिस्थलेऽपि तथैव
तथापि सामग्रीवैकल्याद्विषयस्वभावाच्च भावध्वन्यादिस्थले न तावानानन्दो यावान्
रसध्वनिस्थले । अत उत्तमोत्तमत्वेऽप्युभयोः किञ्चित्तारतम्यमस्त्येव । विभागे
चैतत्तारतम्यं न बाधकमिति नोत्तमोत्तमत्वव्याघातो भावध्वनेरिति बोध्यम् ।
अन्यथेति । गुणीभूतस्य नान्तरीयकस्यापि भावस्य गुणीभूतव्यङ्ग्यव्यपदेशहेतु-
त्वाभ्युपगमे सतीत्यर्थः । उच्छेद इति । गर्वादिध्वनावप्यमर्षादिभावस्य नान्त-
रीयकस्य नियमेन व्यङ्ग्यतया तत्रापि तमादाय गुणीभूतव्यपदेश एव स्यान्न तु भाव-
ध्वनिव्यपदेश इत्याशयः ।
निमित्तेत्यादि कारणतावच्छेदकं च तद्व्यक्तित्वमेव । आलम्बनत्वादिना
कारणत्वं तु न घटते, निर्विषयाणां ग्लान्यादिभावानामालम्बनाभावेन तत्त्वेन कारणत्वे
व्यतिरेकव्यभिचारात् । अतो यत्रापि भावे देवादिविषयकरत्यादौ शङ्कादौ च सम्भव-
जब एक प्रधान भाव के व्यञ्जक विभावादि से भिन्न¹ विभावादि सामग्री से किसी
दूसरे भाव की अभिव्यक्ति हो और वह दूसरा भाव चमत्कारातिशययुक्त हो । ऐसी
स्थिति में यह दूसरा भाव नान्तरीयक नहीं, अपितु अनान्तरीयक होगा । अत
एव नान्तरीयक भाव की ध्वनि प्रधान रूप में अथवा चमत्कारातिशययुक्त भाव के रूप
में कथमपि सम्भव नहीं ।
व्यभिचारि-भाव के अभिव्यञ्जन में विभाव की कारणता विशेषरूप में
( विभाव अथवा आलम्बन-उद्दीपन के रूप में ) नहीं, अपितु एक निमित्त-
कारण के रूप में ही होती, न कि रस के अभिव्यञ्जन में जिस प्रकार विशेषरूप में
विभाव की कारणता होती उस प्रकार । यह विषय पहले भी स्पष्ट किया जा
चुका है । अतः मात्र उद्दीपन-विभावस्वरूप निमित्त कारण से, आलम्बन के बिना
भी, व्यभिचारि-भाव की अभिव्यक्ति हो ही सकती है । हाँ, यदि किसी भाव के
निमित्त कारण के रूप में आलम्बन और उद्दीपन दोनों ही सम्भव हों तो दोनों को
हीं निमित्त कारण मानना चाहिए ।
१. यह भिन्नता आंशिक रूप में ही प्रायः सम्भव है ।
२७८ रसगङ्गाधरः
हर्षादयस्तु --
हर्षस्मृतिब्रीडामोहधृतिशङ्काग्लानिदैन्यचिन्तामदश्रमगवनिद्रामतिव्या-
घित्राससुप्तविबोधा मर्षावहित्थोन्मादमरणवितर्कविषादौत्सुक्या वेगजड-
तालस्यासूयापस्मारचपलताः । प्रतिपक्षकृताधिककारादिजन्मा निर्वेदश्चेति
त्रयस्त्रिंशद्व्यभिचारिणः । गुरुदेवनृपपुत्रादिविषया रतिश्चेति चतुस्त्रिंशत् ।
एतेन वात्सल्याख्यं पुत्राद्यालम्बनं रसान्तरमिति परास्तम् । उच्छृङ्खल-
ताया मुनिवचनपराहतत्वात् ।
तत्र
त्यालम्बनं तत्राप्यालम्वनस्य आलम्बनत्वेन न निमित्तत्वमपि तु तद्व्यक्तित्वेनैवेति
ज्ञेयम् । क्वचित्—सविषयकभावस्थले ।
भावान् परिगणयति—हर्षेत्यादिना । 'माङ्गलिकतया हर्षनिरूपणं प्रथमं
रोचते पण्डितराजाय' इति रसचन्द्रिका । काव्यविषयत्वाद्वा तथा कृतम् ।
मुनिवचनेत्यादि । यदि वात्सल्यमपि रसान्तरं स्यात्तर्हि सर्वज्ञेन मुनिना
तस्यापि स्थायिभावरूपेण पुत्रादिविषयकरतेर्गणना कृता स्यात्, न चैवमित्यतो न
वात्सल्यं रसान्तरम् । अत एव च पुत्रादिविषया रतिरपि भाव एव, न स्थायि-
भाव इत्याशयः ।
हर्ष आदि भाव निम्न-निर्दिष्ट हैं—
(१) हर्ष, (२) स्मृति, (३) ब्रीडा, (४) मोह, (५) धृति, (६) शङ्का, (७)
ग्लानि, (८) दैन्य, (९) चिन्ता (१०) मद, (११) श्रम, (१२) गर्व, (१३) निद्रा,
(१४) मति, (१५) व्याधि, (१६) त्रास, (१७) सुप्त, (१८) विबोध, (१९) अमर्ष,
(२०) अवहित्था, (२१) उग्रता, (२२) उन्माद, (२३) मरण, (२४) वितर्क, (२५)
विषाद, (२६) औत्सुक्य, (२७) आवेग, (२८) जड़ता, (२९) आलस्य, (३०) असूया,
(३१) अपस्मार और (३२) चपलता । शत्रु द्वारा धिक्कारने-ललकारने आदि से
उत्पन्न, (३३) निर्वेद—वैराग्य भी एक भाव है । इनके अतिरिक्त, गुरु-विषयक,
देव-विषयक, नृप-विषयक, और पुत्रादि-विषयक (३४) रति भी एक भाव है ।
इस प्रकार चौंतीस (३४) भाव हुए ।
कुछ लोग पुत्रादि-विषयक वात्सल्य को भी एक अन्य रस मानते । पुत्रादि-
विषयक रति इसका स्थायिभाव होना चाहिए था । किन्तु पुत्रादि-विषयक
रति का भरत मुनि द्वारा एक व्यभिचारि-भावरूप में परिगणन न किये जाने से इसे
स्थायिभाव मानकर वात्सल्य रस मानना उच्छृङ्खलता मात्र है । अतः वात्सल्य
को रस नहीं माना जा सकता ।
प्रथमाननम् २७९
इष्टप्राप्त्यादिजन्मा सुखविशेषो हर्षः ।
तदुक्तम्--
'देवभर्तृगुरुस्वामिप्रसादः प्रियसंगमः ।
मनोरथाप्तिरप्राप्यमनोहरधनागमः ।।
अथोत्पत्तिश्च पुत्रादेर्विभावो यत्र जायते ।
नेत्रवक्त्रप्रसादश्च प्रियोक्तिः पुलकोद्गमः ।।
अश्रुस्वेदादयश्चानुभावा हर्षं तमादिशेत् ।।' इति ॥
उदाहरणम् --
अवधौ दिवसावमानकाले भवनद्वारि विलोचने दधाना ।
अवलोक्य समागतं तदा मामथ रामा विकसन्मुखी बभूव ।
अत्रावधिकाले प्रियागमनं विभावः । मुखविकासोऽनुभावः ।
इष्टप्राप्त्यादीति । आदिशब्देनानिष्टनिवृत्त्यादिर्गृह्यत इति रसचन्द्रिका ।
तच्च तदैव शोभते यद्यनिष्टनिवृत्त्या दुःखाभावातिरिक्तं किमपि भावरूपं भवतीति
मन्यते । न चैवमनुभवसिद्धम् । अनिष्टनिवृत्त्यनन्तरं कस्यचनेष्टस्य प्राप्तौ जायमानं
सुखन्तु नानिष्टनिवृत्तिज यम् । अत एव स्वयमेव ग्रन्थकृदाहादिपदग्राह्यं
तदुक्तमिति ग्रन्थेन । प्रियसङ्गम इत्युपलक्षणं प्रियासंगमस्यापि । अप्राप्येति ।
दुष्प्राप्येत्यर्थः । दुष्प्राप्यानिष्टधननिवृत्त्यर्थं मनोहरेति धनविशेषणम् । सर्वेषामेतेषा-
मिष्टप्राप्तिरूपत्वेऽपि गोबलीवर्दन्यायेन ब्राह्मणवसिष्ठन्यायेन वा पृथगुपादानम् ।
अवधावित्यदिपद्यं स्पष्टार्थम् ।
प्रियागमनमित्यत्र आगमनमुत्तरपदम् । अनुभाव इति । आभ्यां हर्षो भावो
इष्ट वस्तु की प्राप्ति आदि से उत्पन्न सुखविशेषात्मक चित्तवृत्तिविशेष को
हर्ष कहते ।
यही बात संगीतरत्नाकर में कही गयी है—
"जिस चित्तवृत्ति-विशेष के विभाव होते हैं—देवता, राजा, गुरु और स्वामी
(पति) की प्रसन्नता; प्रिय के साथ मिलन; मनोरथ ( उत्कटेच्छाविषयीभूत वस्तु )
की प्राप्ति; उस प्रकार के धन का लाभ जो सरलता से प्राप्त करने योग्य नहीं होता
और पुत्र-पुत्री आदि की उत्पत्ति तथा अनुभाव होते—नेत्रों और मुख की प्रसन्नता;
प्रिय वचन; रोमाञ्च, अश्रु एवम् स्वेद (पसीना) आदि उसे ही हर्ष कहना चाहिए ।।"
इसका उदाहरण निम्नलिखित है—
"मेरे आगमन की अवधि जो सायं सन्ध्या थी उस समय घर के दरवाजे पर
अपनी आँखें टिका कर खड़ी मेरी प्रियतमा ने जब मुझे आया हुआ देखा तब उसका
२८० रसगङ्गाधरः
संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिः ॥
यथा—
तन्मञ्जु मन्दहसितं श्वसितानि तानि
सा वै कलङ्कविधुरा मधुराननश्रीः ।
अद्यापि मे हृदयमुन्मदयन्ति हन्त
सायन्तनाम्बुजसहोदरलोचनायाः ॥
चिन्ताविशेषोऽत्र विभावः । स्रस्तगात्रतानिश्चलत्वादय आक्षेपगम्या
व्यजत इत्यर्थः ॥
मुद्रणेऽतिविलम्बेन व्याख्या नष्टा पुरातनी ॥
साम्प्रतं समयाभावादक्षराथॊ निरूप्यते ॥
संस्कारजन्यमिति । संस्कारमात्रव्यापारकमित्यर्थः ।
तन्मञ्जु मन्देत्यादि । चिरविप्रयुक्तस्य नायकस्योक्तिरियम् । यदीयम्
उक्तिरात्मगता हसितादिस्वरूपविशेषज्ञानवन्मित्रकर्मिका वा तर्हि तत्पदं बुद्धिस्थ-
प्रकारावच्छिन्नबोधकम्, यदि तु अज्ञातहसितादिस्वरूपविशेषमित्रकर्मिका तर्हि तत्पदं
बुद्धिस्थत्वावच्छि
प्रथमाननम् २८१
अनुभावा
यद्यप्यत्रास्या एव स्मृतेः संचारिण्याः, नायिकारूपस्य विभावस्य
हन्तपदगम्यस्य हृदयवैकल्यरूपानुभावस्य संयोगाद् विप्रलम्भरसाभिव्यक्तौ
रसध्वनित्वं शक्यते वक्तुम्, तथापि स्मृतेरेवात्र पुरःस्फूर्तिकत्वाच्चमत्कारी-
त्वाच्च तद्ध्वनित्वमुक्तम् ।
तदादेर्बुद्धिस्थप्रकारावच्छिन्ने शक्तिरिति नये बुद्धेः शक्यतावच्छेद-
स्मृतिबीजस्य बोधिकाः' इत्युक्तत्वात् । आक्षेपगम्या इति तु वाचकशब्दाभावात् ।
अस्य विप्रलम्भध्वनित्वमाशङ्क्य निराचष्टे—यद्यपीत्यादिना । हन्तपदगम्य-
स्येति निपातानां द्योतकत्वमिति मतानुसारेणोक्तम् । पुरःस्फूर्तिकत्वादिति तच्छब्द-
सामर्थ्यात् । चमत्कारित्वाच्चेति वचनस्वाभाव्यात् । तद्ध्वनित्वम्—स्मृति-
ध्वनित्वम् ।
स्मृतेरस्यास्तत्पदवाच्यतासंस्पर्शेण कथं ध्वनित्वमिति निरूपयति—तदादे-
रित्यादिना । बुद्धिस्थो यः प्रकारो घटत्वादिस्तदवच्छिन्ने घटादौ शक्तिरित्येकः
प्रसिद्धो नयः । अत्र च घटत्वादीनां प्रकाराणामानन्त्येन शक्यानन्त्यप्रसङ्गः, तं परि-
हर्तुं बुद्धिस्थत्वेनैकेन रूपेणानुगमान्न तदादिपदस्य नानार्थत्वापत्तिरिति बोध्यम् ।
तथा च पक्षेऽत्र बुद्धिस्थत्वं न शक्यं न वा शक्यतावच्छेदकम् अपि तु शक्यतावच्छेद-
कतावच्छेदकमिति स्पष्टम् । अत एवास्योपलक्षणत्वम् । शक्यतावच्छेदकपर्यनतस्य
शक्यत्वं तु प्रसिद्धम् । तथा चात्र पक्षे बुद्धेः शक्यकोटावप्रवेशान्न तत्पदेन बुद्धित्वेन
सामान्यरूपेणापि बुद्धिविशेषस्य स्मृतेर्वाच्यतासंस्पर्श इति सुव्यक्तमेव । यदा तु पूर्वोक्त-
प्रकारेण बुद्धिस्थत्वं शक्यतावच्छेदकतया शक्यमेव, न पुनः शक्यतावच्छेदकतावच्छेदक-
तयाऽशक्यम्, तदापि बुद्धित्वेन रूपेण स्मृतेस्तत्पदवाच्यत्वेऽपि स्मृतित्वेन विशेषरूपेण
आक्षेपलभ्य भ्रुकुटी का उन्नयन ओर शरीर में निश्चलता आदि इसके अनुभाव हैं
जिनसे स्मृतिस्वरूप चित्तवृत्ति ध्वनित होती है ।
यहाँ प्रश्न यह उठता कि इस पद्य से विप्रलम्भ शृङ्गार रस की ध्वनि क्यों नहीं
मानी जाती, कारण इसमें अभिव्यज्यमान स्मृतिस्वरूप सञ्चारिभाव, नायिकारूपी
आलम्बनविभाव और 'हन्त' इस निपात पद से गम्यमान हृदय-विकलतारूपी अनुभाव
के प्रस्तुत होने से इनके संयोग से विप्रलम्भ की ध्वनि की परिस्थिति तो है ही ।
फिर इसमें प्रधानरूप में स्मृति की ही ध्वनि क्यों मानी जाती ? इसका उत्तर यही
दिया गया है कि यहाँ शब्दसामर्थ्य से स्मृति की ही अभिव्यक्ति पहले होती और
वही स्मृति चमत्कारिणी है । इसीलिए यहाँ स्मृतिध्वनि ही मान्य है, विप्रलम्भ-
ध्वनि नही ।
क्तानुगमकतया न वाच्यतासंस्पर्शः। बुद्धिस्थत्वं शक्यतावच्छेदकमिति नयेऽपि
स्मृतित्वेन स्मृतेर्व्यक्तिवेद्यतैव ।
न वाच्यत्वसंस्पर्श इति तद्ध्वनित्वमाह—बुद्धिस्थत्वमित्यादिना । तथा च वाच्यता-
वच्छेदकव्यङ्ग्यतावच्छेदकयोर्भेदात् सामान्याकारेण वाच्याया अपि स्मृतेर्विशेषाकारेण
व्यङ्ग्यत्वं चमत्कारित्वाच्च ध्वनित्वमिति लभ्यते ।
यत् पुनः बुद्धिस्थत्वमिति प्रतीकमादायोक्तं रसचन्द्रिकायाम्—'परमिदं सर्वम-
सङ्गतमेव । यतः सर्वत्रैवोपस्थितौ शक्यतावच्छेदकं भासते, बुद्धिस्थत्वन्तु न कुत्रापि
घटादिपदजन्योपस्थितौ ।' इति तत्तु तत्पदजन्योपस्थितौ बुद्धिस्थत्वस्य शक्यता-
वच्छेदकतया भानमिति वदतो ग्रन्थकृतः किं विरुणद्धि इति न विद्मः । किञ्च कृत-
संकेतं मित्रादिकम्प्रति अधुना तत्र गन्तव्यमित्यादि वचनात् विशेषार्थकपदान्तरासम-
भिव्याहृततत्पदात् तटस्थस्य यो बोधस्तत्र बुद्धिस्थत्वादतिरिक्तं किं शक्यतावच्छेदकं
सम्भवतीत्यपि विभावनीयम् । तथा च लाघवात् सर्वत्रैव तत्पदघटितबोधे बुद्धिस्थत्व-
मेव शक्यतावच्छेदकमस्त्विति ग्रन्थकृतोऽभिप्रायः ।
इदं पुनरत्र विचिन्त्यताम्—पदार्थोपस्थितिपूर्वकस्यैव शब्दप्रयोगस्य वक्तृकर्त्तृकस्य
सम्भवात् पूर्वानुभूतपदार्थप्रतिपादकशब्दप्रयोगात्पूर्वं तदुपस्थितेरावश्यकत्वमिति
निर्विवादम् । न चैतादृशस्थलेषु पदार्थोपस्थितिर्वक्तुरनुभवरूपा, तस्याः संस्कारशेष-
त्वात् । तथा च या बुद्धिस्तत्पदस्य शक्यतावच्छेदिका तद्घटिका वा सा
स्मृतिरूपापीतिपरिशेषाद् वाच्यत्वमेवान्ततः स्मृतेरिति भावरूपायाः स्मृतेस्तत्पदाघटित-
पुनः प्रश्न उठ सकता है कि 'तत्' आदि सर्वनाम शब्दों के वाच्य अर्थ के अन्त-
र्गत स्मृति के आ जाने से उसे व्यङ्ग्य कैसे माना जा सकता । इसके उत्तर में
ग्रन्थकार ने—उक्त सर्वनाम शब्दों की शक्ति किस अर्थ मे है और उसमें स्मृति का
समावेश है अथवा नहीं, यदि है भी तो किस रूप में है—एक बुद्धि के रूप में अथवा
स्मृति के रूप में—इसका विचार कर यह स्पष्ट किया है कि जिस रूप में स्मृति के
वाच्य होने पर उसे व्यङ्ग्य मानना असम्भव है उस रूप में स्मृति 'तत्' आदि पदों
का वाच्य नहीं है, अतः उसे व्यङ्ग्य मानने में कोई आपत्ति नहीं उठती। यहाँ 'तत्'
आदि पदों की शक्ति के विषय में प्रथमतः यह मत प्रस्तुत किया गया है कि इनकी
शक्ति बुद्धिस्थ जो (घटत्व-पटत्व) आदि प्रकार—विशेषण हैं, उनसे अवच्छिन्न-विशिष्ट
(घट-पट आदि) पदार्थों में है। इस मत में बुद्धिस्थत्व शक्यतावच्छेदकीभूत घटत्व-
पटत्व आदि नाना प्रकारों का अनुगमक है, स्वयं में यह न शक्य है और न शक्यता-
वच्छेदक। बुद्धिस्थत्व को शक्यतावच्छेदक का अनुगमक (उपलक्षण) न मानने पर
शक्यतावच्छेदकों के और उनके कारण शक्यों के भी नानात्व के कारण एक-एक शक्य
प्रथमाननम् २८३
तस्याश्चात्र वाक्यवेद्यत्वेऽपि पदस्यैव कुर्वद्रूपत्वात्पदध्वनिविषयत्वम् ।
एतेन भावानां पदव्यङ्ग्यत्वे न वैचित्र्यमिति परास्तम् । सायंतनाम्बु-
जोपमानेन नयनयोत्तरोत्तराधिकनिमीलनोन्मुखत्वध्वननद्वारा तस्या
आनन्दमग्नताप्रकाशः ।
मुदाहरणान्तरं मृग्यम् । श्रोतुस्तत्पदश्रवणानन्तरं वक्तृकर्त्तृकपूर्वानुभवविषयस्यैव
पदार्थस्य प्रतीतिरिति यदि विभाव्यते तर्हि स्मृतेर्न सामान्येनापि तत्पदवाच्यत्वम् ।
तथापि स्मृतेरपि संस्कारजनकत्वमिति गुरुतरं पक्षान्तरमादाय कथंचित्संगमनीयो
ग्रन्थः ।
अत्रेदपि विवेचनीयम्—'शयिता सविधे' इत्यादिपद्यविवरणावसरे 'कथमपि
वाच्यवृत्त्यनालिङ्गितस्यैव व्यङ्ग्यस्य चमत्कारित्वेनालङ्कारिकैः स्वीकारात्' इत्यभिद-
धतो ग्रन्थकृतो वचनमिदं प्रकृतेऽन्यत्र च साहङ्कारेत्यादिपद्यव्याख्यानावसरे निबद्धं
विरुद्धम् । अत एव चास्माभिरपि पूर्वमेवमेवोक्तम् । परन्तु सामान्याकारविशेषा-
कारप्रतीत्योर्वैलक्षण्यं परीक्षकोपदेशसहकृतरत्नादिप्रत्यक्षवन्निर्विवादम् । अत एव
प्रकृतेऽपि तथोक्तं ग्रन्थकारेण । अत एव च 'शयिता सविधे' इत्यादिपद्यव्याख्याना-
वसरेऽपि 'कथमपि वाच्यवृत्ति' इत्यादिपूर्वाचार्यप्रसिद्धपक्षमुपस्थाप्यान्ते 'चुम्बनेच्छायाः
... अचमत्कारित्वाच्च' इति सन्दर्भेण प्रकारान्तरमुक्तम् । अत्र च 'व्यङ्ग्यताव-
में एक-एक शक्ति माननी होगी जिसका परिणाम एक-एक 'तत्' आदि सर्वनाम
शब्द में नाना शक्तियों का अपरिहार्य अभ्युपगम होगा । इससे प्राप्त गौरव का
परिहार, अर्थात् शक्ति-नानात्व का निवारण, करने के लिए आवश्यक है कि उन
शक्यतावच्छेदकों का अनुगमक एक बुद्धिस्थत्व को माना जाय । तब तो बुद्धिस्थ
रूप में सभी प्रकारों—शक्यतावच्छेदकों की एक रूप में ही उपस्थिति और प्रतीति
होगी और इस प्रकार एक ही शक्ति सभी शक्यतावच्छेदकों और उनसे विशिष्ट
शक्यों की उपस्थिति तथा प्रतीति में पर्याप्त हो जायेगी । इस प्रथम मत के अनुसार
अनुगमक बुद्धिस्थत्व के अन्तर्गत स्मृति का समावेश होने पर भी इसे वाच्य नहीं
कहा जा सकता, क्योंकि वाच्यता शक्य और शक्यतावच्छेदक तक ही सीमित है,
उनसे अतिरिक्त में नहीं । अतः इस मत में उक्त पद्य में स्मृति को व्यङ्ग्य
मानने में कोई दोष नहीं है । द्वितीय मत यह है कि 'तत्' आदि सर्वनामों की
को शक्ति बुद्धिस्थत्वविशिष्ट बुद्धिस्थ पदार्थों में है । इस मत में बुद्धिस्थत्व शक्यता-
वच्छेदक होगा और बुद्धिस्थ पदार्थ शक्य । इनमें शक्यतावच्छेदकीभूत बुद्धिस्थत्व
और शक्य—बुद्धिस्थ के घटक बुद्धि के अन्तर्गत स्मृति एक बुद्धि के रूप में
अवश्य आती, किन्तु बुद्धिविशेष स्मृति के रूप में नहीं । अतः बुद्धित्वविशिष्ट
४. नव रस लक्षण, स्थायी भाव, विभाव-अनुभाव-व्यभिचारी भाव एवं प्रथम आनन उपसंहार
२८४ रसगङ्गाधरः
दरानमत्कंधरबन्धमीषन्निमीलितस्निग्धविलोचनाब्जम् ।
अनल्पनिःश्वासभरालसाङ्गं स्मरामि सङ्गं चिरमङ्गनायाः ॥
च्छेदकतया भासमानजात्यादिरूपेण यत्र वाच्यता तत्रैवाचमत्कारिता । पूर्वोदाहरणे
हि मनोरथत्वेच्छात्वयोर्घटत्वकलशत्ववदेकतया तेनैव रूपेण वाच्यताऽस्तीति न दोषः ।'
इति मर्मप्रकाशोक्तं मतान्तरमपि चिन्त्यमेव ।
तस्याः = स्मृतेः । कुर्वद्रूपत्वं कार्यजननसामर्थ्यं तच्च प्रकृते स्मृतिव्यञ्जकत्व-
मेव तदादिपदे प्रसिद्धमिति भावः । तेन च कुर्वद्रूपेण पदेन चमत्कारकारिणा तद्-
घटितवाक्यस्यापि तथात्वं विज्ञेयम् । यदाहुर्ध्वनिकृतः –
विच्छित्तिशोभिनेकेन भूषणेनेव कामिनी ।
पदद्योत्येन सुकवेर्ध्वनिना भाति भारती ॥ इति ।
प्रत्युदाहरणम्—दरानमदिति । दरमीषदानमन् कन्धरबन्धो यस्मिन्
(तमङ्गनायाः सङ्गम), अथ च ईषन्निमिलिते स्निग्धे विलोचने अब्जे इव मनोज्ञे यत्र
तम् अनल्पनिःश्वासभरेणालसमङ्गं यस्यास्तस्तस्या अङ्गनायाः प्रियतमायाः सङ्गं चिरं
स्मरामीत्यर्थः ।
स्मृति में वाच्यता आने पर भी स्मृतित्वविशिष्ट स्मृति में, जिसमें व्यङ्ग्यता अभिप्रेत
है, वाच्यता नहीं है। इस प्रकार स्मृति को व्यङ्ग्य कहना सर्वथा उचित है।
इस विषय में विशेष विचार संस्कृतटीका में द्रष्टव्य हैं।
उक्त स्मृति की अभिव्यञ्जना यद्यपि पूरे पद्यात्मक वाक्य से होती हुई प्रतीत
होती तथापि पद्यान्तर्गत 'तत्', 'तानि' और 'सा' इन तोन पदों में स्मृतिव्यञ्जन-
सामर्थ्य की उत्कटता के कारण यहाँ स्मृति को पद से ही व्यङ्ग्य समझना चाहिए।
अत एत्र यह मत निरस्त हो जाता है कि हर्षादि भावों के पद-व्यङ्ग्य होने पर
उनमें चमत्कार नहीं रह जाता ।
इस पद्य से प्रसङ्गात् नायिका की आनन्दमग्नता भी उसकी आँखों के उत्तरोत्तर
अधिकाधिक संकोच प्राप्त करते जाने की व्यञ्जना द्वारा ध्वनित होती है। संकोच
की अभिव्यक्ति सायंकालिक कमल से आँखों की उपमा से होती है।
अब एक प्रत्युदाहरण भी द्रष्टव्य है—
“मैं प्रियतमा के साथ हुए उस समागम का स्मरण चिरकाल करता रहता हूँ
जिसमें उसकी गर्दन कुछ झुकी हुई थी, उसके आकर्षक नयन-कमल लज्जा से कुछ
संकुचित हो गये थे और उसका सारा शरीर रतिश्रमजन्य अत्यधिक निःश्वास से
अलसाया हुआ था ॥”