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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 314

क्तानुगमकतया न वाच्यतासंस्पर्शः। बुद्धिस्थत्वं शक्यतावच्छेदकमिति नयेऽपि
स्मृतित्वेन स्मृतेर्व्यक्तिवेद्यतैव ।
न वाच्यत्वसंस्पर्श इति तद्ध्वनित्वमाह—बुद्धिस्थत्वमित्यादिना । तथा च वाच्यता-
वच्छेदकव्यङ्ग्यतावच्छेदकयोर्भेदात् सामान्याकारेण वाच्याया अपि स्मृतेर्विशेषाकारेण
व्यङ्ग्यत्वं चमत्कारित्वाच्च ध्वनित्वमिति लभ्यते ।
यत् पुनः बुद्धिस्थत्वमिति प्रतीकमादायोक्तं रसचन्द्रिकायाम्—'परमिदं सर्वम-
सङ्गतमेव । यतः सर्वत्रैवोपस्थितौ शक्यतावच्छेदकं भासते, बुद्धिस्थत्वन्तु न कुत्रापि
घटादिपदजन्योपस्थितौ ।' इति तत्तु तत्पदजन्योपस्थितौ बुद्धिस्थत्वस्य शक्यता-
वच्छेदकतया भानमिति वदतो ग्रन्थकृतः किं विरुणद्धि इति न विद्मः । किञ्च कृत-
संकेतं मित्रादिकम्प्रति अधुना तत्र गन्तव्यमित्यादि वचनात् विशेषार्थकपदान्तरासम-
भिव्याहृततत्पदात् तटस्थस्य यो बोधस्तत्र बुद्धिस्थत्वादतिरिक्तं किं शक्यतावच्छेदकं
सम्भवतीत्यपि विभावनीयम् । तथा च लाघवात् सर्वत्रैव तत्पदघटितबोधे बुद्धिस्थत्व-
मेव शक्यतावच्छेदकमस्त्विति ग्रन्थकृतोऽभिप्रायः ।
इदं पुनरत्र विचिन्त्यताम्—पदार्थोपस्थितिपूर्वकस्यैव शब्दप्रयोगस्य वक्तृकर्त्तृकस्य
सम्भवात् पूर्वानुभूतपदार्थप्रतिपादकशब्दप्रयोगात्पूर्वं तदुपस्थितेरावश्यकत्वमिति
निर्विवादम् । न चैतादृशस्थलेषु पदार्थोपस्थितिर्वक्तुरनुभवरूपा, तस्याः संस्कारशेष-
त्वात् । तथा च या बुद्धिस्तत्पदस्य शक्यतावच्छेदिका तद्घटिका वा सा
स्मृतिरूपापीतिपरिशेषाद् वाच्यत्वमेवान्ततः स्मृतेरिति भावरूपायाः स्मृतेस्तत्पदाघटित-
पुनः प्रश्न उठ सकता है कि 'तत्' आदि सर्वनाम शब्दों के वाच्य अर्थ के अन्त-
र्गत स्मृति के आ जाने से उसे व्यङ्ग्य कैसे माना जा सकता । इसके उत्तर में
ग्रन्थकार ने—उक्त सर्वनाम शब्दों की शक्ति किस अर्थ मे है और उसमें स्मृति का
समावेश है अथवा नहीं, यदि है भी तो किस रूप में है—एक बुद्धि के रूप में अथवा
स्मृति के रूप में—इसका विचार कर यह स्पष्ट किया है कि जिस रूप में स्मृति के
वाच्य होने पर उसे व्यङ्ग्य मानना असम्भव है उस रूप में स्मृति 'तत्' आदि पदों
का वाच्य नहीं है, अतः उसे व्यङ्ग्य मानने में कोई आपत्ति नहीं उठती। यहाँ 'तत्'
आदि पदों की शक्ति के विषय में प्रथमतः यह मत प्रस्तुत किया गया है कि इनकी
शक्ति बुद्धिस्थ जो (घटत्व-पटत्व) आदि प्रकार—विशेषण हैं, उनसे अवच्छिन्न-विशिष्ट
(घट-पट आदि) पदार्थों में है। इस मत में बुद्धिस्थत्व शक्यतावच्छेदकीभूत घटत्व-
पटत्व आदि नाना प्रकारों का अनुगमक है, स्वयं में यह न शक्य है और न शक्यता-
वच्छेदक। बुद्धिस्थत्व को शक्यतावच्छेदक का अनुगमक (उपलक्षण) न मानने पर
शक्यतावच्छेदकों के और उनके कारण शक्यों के भी नानात्व के कारण एक-एक शक्य