रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 304, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें२७२ रसगङ्गाधरः
विभावादिव्यज्यमानहर्षाद्यन्यतमत्वं तत्त्वम् ॥
यदाहुः— व्यभिचारी तथाञ्जितः । भावः' इति । हर्षादीनां च सामा-
जिकगतानामेव स्थायिभावन्यायेनाभिव्यक्तिः ।
विभावादीत्यादि । विभावादिव्यज्यमानत्वे सति हर्षाद्यन्यतमत्वं भावत्वमिति
लक्षणार्थः । तत्र हर्षाद्यन्यतमत्वमात्रोक्तौ लौकिकहर्षादावतिव्याप्तिरतो विभावादि
व्यज्यमानत्वमिति विशेषणम् । विभावादिव्यज्यमानत्वमात्रोक्तौ रसेऽतिव्याप्तिरतो
हर्षाद्यन्यतमत्वमप्युक्तम् । विभावादिरित्यत्रादिशब्दादनुभावस्य क्वचिच्च व्यभि-
चारिणोऽपि परिग्रहः ।
उक्तेऽर्थे मम्मटोक्तिं प्रमाणत्वेनोपन्यस्यति—यदाहुरित्यादिना । “व्यभिचारी
तथाञ्जितः । भावः······' इति शुद्धः पाठः (द्र० का० प्र० ४।३२-३६) । 'व्यभि-
चार्यञ्जितो भावः' इति मुद्रितः पाठस्त्वमूलगतत्वादस्माभिरुपेक्षितः । विभावा-
दिभिरञ्जितो व्यंजितो यो व्यभिचारी निर्वेदादिर्हर्षादिर्वा स भाव इति मम्मट
वचनार्थः ।
स्थायिभावन्यायेनेति । यथा कामिन्यादिविषया रत्यादयो वर्त्तमाना एव
सामाजके विभावादिसामग्रीबलादलौकिकत्वमापन्नाः स्थायितया व्यज्यन्ते तथैव
देवादिविषया रत्यादयोऽपि पूर्वत एव सामाजिकहृदये वर्त्तमाना विभागादिसामग्री
बलादलौकिकत्वेन रूपेणाभिव्यक्ता भवन्ति, अत एव च भावपदव्यपदेश्या
उपर्युक्त स्थिति को ध्यान में रखते हुए ग्रन्थकार अब इन ( व्यभिचारी )
भावों का परिष्कृत लक्षण प्रस्तुत कर रहे हैं—
विभाव और अनुभाव से व्यज्यमान हर्ष आदि (३४) चित्तवृत्तियों को 'भाव'
कहा जाता है।
अत एव मम्मट ने कहा है—“( विभाव आदि से ) अभिव्यक्त होने वाले
( निर्वेद, ग्लानि आदि ) को 'व्यभिचारिभाव' कहते ॥”
ये हर्षादि सामाजिक मे पहले से होते । किन्तु स्थायिभाव के समान इनकी
विभावादि-सामग्री से अभिव्यक्ति होने पर हीं ये 'भाव' कहलाते, अन्यथा नहीं ।
तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार सामाजिकनिष्ठ रत्यादि हीं विभावादि सभी सामग्री
से अभिव्यक्त होने पर शृङ्गारादि रसों के 'स्थायिभाव' कहलाते, अन्यथा नहीं
उसी प्रकार सामाजिकगत हर्षादि के लिए 'भाव' या 'व्यभिचारिभाव' शब्द का
प्रयोग तभी होता है जब ये अपनी सामग्री से अभिव्यक्त होते, अन्यथा नहीं ।
यह भी ज्ञातव्य है कि रत्यादि 'स्थायिभाव' रूप में भी अभिव्यक्त होते ओर
'व्यभिचारिभाव' के रूप में भी । किन्तु दोनों में अन्तर यही है कि ये जब सकल