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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 305

प्रथमाननम् २७३
अपीति तात्पर्यम् । तथापि यदा परिपूर्णा विभावादिसामग्री रत्यादेरभिव्यञ्जिका
तदा ध्वन्यमान्यो रत्यादिर्भजते रसव्यपदेशमन्यथा तु भावव्यपदेशम् । अत एवैषां
व्यभिचारित्वमप्युपपद्यते । तदुक्तं संगीतरत्नाकरे—
रत्यादयः स्थायिभावाः स्युर्भूयिष्ठविभावजाः ।
स्तोकैर्विभावैरुत्पन्नास्त एव व्यभिचारिणः ॥ इति ॥
शब्दान्तरेण—
रत्यादिश्चेन्निरङ्गः स्याद् देवादिविषयोऽथवा ।
अन्याङ्गभावभाग्वा स्यान्न तदा स्थायिशब्दभाक् ॥
इत्यनेन प्रदीपेऽप्येतदुक्तमेव ।
इदन्तु बोध्यम्—सविषयकाणां पदार्थानां विषयभेदाद् भेदस्य सर्वतन्त्रसिद्धान्त-
सिद्धतया नायिकादिविषयकरत्यादेः देवादिविषयकरत्यादिभिन्नत्वेऽपि रतित्वेन
साजात्यमादाय 'त एव' इत्युक्तम् । 'स्तोकैर्विभावैः' इत्यस्यायमाशयः—स्थायि-
भावाभिव्यञ्जिका विभावादिसामग्री सकला, भावाभिव्यञ्जिका पुनर्विकला । भावा-
भिव्यञ्जने हि क्वचिदालम्बनत्वे सत्यपि आलम्बनत्वादिनो विशेषरूपेण विभावादेर्न
कारणत्वम्, बहूनां भावानां निर्विषयत्वेन विषयरूपालम्बनस्य तत्रासम्भवात् ।
यत्पुनरुद्दीपनविभावस्यावश्यकत्वं तदपि नोद्दीपनत्वेन विशेषरूपेण कारणत्वमभिप्रेत्येति
स्वयमपि 'विभावस्त्वत्र व्यभिचारिणो निमित्तकारणसामान्यम्' इत्यनेन वक्ष्यत्येव ।
अधिकमनुपदं वक्ष्यते ।
सामग्री से अभिव्यक्त होने के कारण प्रधान रूप में योग्य आलम्बन को विषय बनाते
तब ये 'स्थायिभाव' होते, विकल सामग्री से अप्रधानरूप में अभिव्यक्त होने पर 'व्यभि-
चारि-भाव' कहलाते । विकल सामग्री का अभिप्राय यही है कि व्यभिचारि-भाव के रूप
में इनकी अभिव्यक्ति के लिये आलम्बन-उद्दीपन आदि की विशेष रूप में (आलम्बन-
त्वादि रूप में ) अपेक्षा नहीं होती । कुछ निर्विषयक व्यभिचारि-भाव तो ऐसे हैं
जिनके आलम्बन विभाव होते ही नहीं । जिनके सविषय होने से आलम्बन-विभाव
होते भी उनकी भी अभिव्यक्ति के लिये आलम्बन-विभाव की विशेष रूप में (आलम्बन-
त्वेन रूपेण) नहीं अपि तु सामान्य निमित्त कारण के रूप में ही आवश्यकता होती ।
यही स्थिति उद्दीपन-विभाव की भी है । परन्तु 'स्थायिभाव' की अभिव्यक्ति के लिये
तो आलम्बन और उद्दीपन इन दोनों ही विभावों की आवश्यकता विशेषरूप में होती
ही है, सामान्य रूपमात्र में नहीं । स्वयं ग्रन्थकार ही 'विभावस्त्वत्र व्यभिचारिणो
निमित्तकारणसामान्यम्' इत्यादि वचनों द्वारा इस तथ्य को स्पष्ट करेंगे ।
इस प्रकार 'स्थायिभाव-न्याय से व्यभिचारि-भाव की अभिव्यक्ति' का तात्पर्य