रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० रसगङ्गाधरः
नापि रसाभिव्यञ्जकचर्वणाविषयचित्तवृत्तित्वं तत्त्वम्; भावादिचर्व-
णायामतिप्रसङ्गवारणाय चर्वणाविषयेति चित्तवृत्तिविशेषणमिति वाच्यम् ।
कालागुरुद्रवं सा हालाहलवद्विजानती नितराम् ।
अपि नीलोत्पलमालां बाला व्यालावलिं किलामनुते ॥
तत्त्वम् = भावत्वम् । ‘नाऽपि’ इत्यस्याग्रिमेण वाच्यमित्येनेनान्वयः । रसाभि-
व्यञ्जकचित्तवृत्तित्वमात्रस्य लक्षणत्वेनाङ्गीकारे दोषं प्रदर्शयन् चर्वणाविषयेति
विशेषणकृत्यमाह—भावादीत्यादिना । उक्तविशेषणाभावे भावादिचर्वणाया अपि
रसाभिव्यञ्जकत्वेन चित्तवृत्तित्वेन च तस्यामतिव्याप्तिः, चर्वणाविषयेति चित्तवृत्ति-
विशेषणोपादाने तु नातिव्याप्तिः, भावादिचर्वणायाश्चित्तवृत्तित्वेपि चर्वणाविषय-
त्वाभावात् । न हि चर्वणा चर्वणाविषयः, तथा सत्यनवस्थाप्रसङ्गात् । एकस्याश्चित्त-
वृत्तेश्चर्वणाख्यचित्तवृत्तिविषयत्वे तु न तथेति चित्तवृत्तिविशेषरूपस्य भावस्य चर्वणा-
स्वरूपविजातीयचित्तवृत्तिविषयत्वे सत्यपि न दोषः । पद्यवाक्यार्थेऽतिव्याप्तिस्तु न,
वाक्यार्थैकदेशस्य क्वचित् चित्तवृत्तिरूपत्वेऽपि वाक्यार्थस्य तथात्वाभावाद् इत्याशयः
पूर्वपक्षस्य । स च निरस्यते—‘नापि...वाच्यम्’ इत्यनेन । हेतुरत्रोच्यते—कालागुरु-
द्रवेत्यादिना ।
अब ‘भाव’ के निम्ननिर्दिष्ट चतुर्थ लक्षण का भी विवेचन कर लेना चाहिए ।
यह लक्षण इस प्रकार है—‘रस का अभिव्यंजन करने वाली चर्वणा का विषय जो
चित्तवृत्ति हो वही भाव है ।’ यद्यपि भावों की चर्वणा भी एक प्रकार की चित्त-
वृत्ति हीं है तथापि यह चर्वणा तो भाव है नहीं । अतः रसाभिव्यंजक चित्तवृत्ति
मात्र को यदि भाव कहा गया होता तो भावचर्वणा-स्वरूप चित्तवृत्ति में, जो
स्वयं भाव नहीं है, इस भाव-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जाती । इसी के निरा-
करणार्थ इस लक्षण में ‘चर्वणा का विषय’ यह चित्तवृत्ति का विशेषण जोड़ दिया
गया है । अब भावचर्वणा-स्वरूप चित्तवृत्ति में अतिव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि
यह चर्वणारूप चित्तवृत्ति स्वयं ‘चर्वणा का विषय’ नहीं होती। एक चर्वणा को दूसरी
चर्वणा का विषय मानने में अनवस्था होगी, क्योंकि तब तो दूसरी चर्वणा को
तीसरी चर्वणा का, तीसरी को चौथी का विषय मानना अपरिहार्य हो जाने से
प्रत्येक प्रथम चर्वणा को उत्तरकालिक दूसरी चर्वणा का विषय मानना हीं होगा ।
इस प्रकार ‘चर्वणा का विषय’ इस विशेषण से चर्वणा में अतिव्याप्ति न होने से
यह चतुर्थ लक्षण आपाततः निर्दोष अवश्य प्रतीत होता । परन्तु विवेचन करने पर
इसकी भी अतिव्याप्ति हो हीं जाती है । इसे स्पष्ट करने के लिए पहले ‘काला-
गुरुद्रवं सा...’ आदि पद्य का अर्थ जान लेना चाहिए—