रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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तस्याश्चात्र वाक्यवेद्यत्वेऽपि पदस्यैव कुर्वद्रूपत्वात्पदध्वनिविषयत्वम् ।
एतेन भावानां पदव्यङ्ग्यत्वे न वैचित्र्यमिति परास्तम् । सायंतनाम्बु-
जोपमानेन नयनयोत्तरोत्तराधिकनिमीलनोन्मुखत्वध्वननद्वारा तस्या
आनन्दमग्नताप्रकाशः ।
मुदाहरणान्तरं मृग्यम् । श्रोतुस्तत्पदश्रवणानन्तरं वक्तृकर्त्तृकपूर्वानुभवविषयस्यैव
पदार्थस्य प्रतीतिरिति यदि विभाव्यते तर्हि स्मृतेर्न सामान्येनापि तत्पदवाच्यत्वम् ।
तथापि स्मृतेरपि संस्कारजनकत्वमिति गुरुतरं पक्षान्तरमादाय कथंचित्संगमनीयो
ग्रन्थः ।
अत्रेदपि विवेचनीयम्—'शयिता सविधे' इत्यादिपद्यविवरणावसरे 'कथमपि
वाच्यवृत्त्यनालिङ्गितस्यैव व्यङ्ग्यस्य चमत्कारित्वेनालङ्कारिकैः स्वीकारात्' इत्यभिद-
धतो ग्रन्थकृतो वचनमिदं प्रकृतेऽन्यत्र च साहङ्कारेत्यादिपद्यव्याख्यानावसरे निबद्धं
विरुद्धम् । अत एव चास्माभिरपि पूर्वमेवमेवोक्तम् । परन्तु सामान्याकारविशेषा-
कारप्रतीत्योर्वैलक्षण्यं परीक्षकोपदेशसहकृतरत्नादिप्रत्यक्षवन्निर्विवादम् । अत एव
प्रकृतेऽपि तथोक्तं ग्रन्थकारेण । अत एव च 'शयिता सविधे' इत्यादिपद्यव्याख्याना-
वसरेऽपि 'कथमपि वाच्यवृत्ति' इत्यादिपूर्वाचार्यप्रसिद्धपक्षमुपस्थाप्यान्ते 'चुम्बनेच्छायाः
... अचमत्कारित्वाच्च' इति सन्दर्भेण प्रकारान्तरमुक्तम् । अत्र च 'व्यङ्ग्यताव-
में एक-एक शक्ति माननी होगी जिसका परिणाम एक-एक 'तत्' आदि सर्वनाम
शब्द में नाना शक्तियों का अपरिहार्य अभ्युपगम होगा । इससे प्राप्त गौरव का
परिहार, अर्थात् शक्ति-नानात्व का निवारण, करने के लिए आवश्यक है कि उन
शक्यतावच्छेदकों का अनुगमक एक बुद्धिस्थत्व को माना जाय । तब तो बुद्धिस्थ
रूप में सभी प्रकारों—शक्यतावच्छेदकों की एक रूप में ही उपस्थिति और प्रतीति
होगी और इस प्रकार एक ही शक्ति सभी शक्यतावच्छेदकों और उनसे विशिष्ट
शक्यों की उपस्थिति तथा प्रतीति में पर्याप्त हो जायेगी । इस प्रथम मत के अनुसार
अनुगमक बुद्धिस्थत्व के अन्तर्गत स्मृति का समावेश होने पर भी इसे वाच्य नहीं
कहा जा सकता, क्योंकि वाच्यता शक्य और शक्यतावच्छेदक तक ही सीमित है,
उनसे अतिरिक्त में नहीं । अतः इस मत में उक्त पद्य में स्मृति को व्यङ्ग्य
मानने में कोई दोष नहीं है । द्वितीय मत यह है कि 'तत्' आदि सर्वनामों की
को शक्ति बुद्धिस्थत्वविशिष्ट बुद्धिस्थ पदार्थों में है । इस मत में बुद्धिस्थत्व शक्यता-
वच्छेदक होगा और बुद्धिस्थ पदार्थ शक्य । इनमें शक्यतावच्छेदकीभूत बुद्धिस्थत्व
और शक्य—बुद्धिस्थ के घटक बुद्धि के अन्तर्गत स्मृति एक बुद्धि के रूप में
अवश्य आती, किन्तु बुद्धिविशेष स्मृति के रूप में नहीं । अतः बुद्धित्वविशिष्ट