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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 316

२८४ रसगङ्गाधरः
दरानमत्कंधरबन्धमीषन्निमीलितस्निग्धविलोचनाब्जम् ।
अनल्पनिःश्वासभरालसाङ्गं स्मरामि सङ्गं चिरमङ्गनायाः ॥
च्छेदकतया भासमानजात्यादिरूपेण यत्र वाच्यता तत्रैवाचमत्कारिता । पूर्वोदाहरणे
हि मनोरथत्वेच्छात्वयोर्घटत्वकलशत्ववदेकतया तेनैव रूपेण वाच्यताऽस्तीति न दोषः ।'
इति मर्मप्रकाशोक्तं मतान्तरमपि चिन्त्यमेव ।
तस्याः = स्मृतेः । कुर्वद्रूपत्वं कार्यजननसामर्थ्यं तच्च प्रकृते स्मृतिव्यञ्जकत्व-
मेव तदादिपदे प्रसिद्धमिति भावः । तेन च कुर्वद्रूपेण पदेन चमत्कारकारिणा तद्-
घटितवाक्यस्यापि तथात्वं विज्ञेयम् । यदाहुर्ध्वनिकृतः –
विच्छित्तिशोभिनेकेन भूषणेनेव कामिनी ।
पदद्योत्येन सुकवेर्ध्वनिना भाति भारती ॥ इति ।
प्रत्युदाहरणम्—दरानमदिति । दरमीषदानमन् कन्धरबन्धो यस्मिन्
(तमङ्गनायाः सङ्गम), अथ च ईषन्निमिलिते स्निग्धे विलोचने अब्जे इव मनोज्ञे यत्र
तम् अनल्पनिःश्वासभरेणालसमङ्गं यस्यास्तस्तस्या अङ्गनायाः प्रियतमायाः सङ्गं चिरं
स्मरामीत्यर्थः ।
स्मृति में वाच्यता आने पर भी स्मृतित्वविशिष्ट स्मृति में, जिसमें व्यङ्ग्यता अभिप्रेत
है, वाच्यता नहीं है। इस प्रकार स्मृति को व्यङ्ग्य कहना सर्वथा उचित है।
इस विषय में विशेष विचार संस्कृतटीका में द्रष्टव्य हैं।
उक्त स्मृति की अभिव्यञ्जना यद्यपि पूरे पद्यात्मक वाक्य से होती हुई प्रतीत
होती तथापि पद्यान्तर्गत 'तत्', 'तानि' और 'सा' इन तोन पदों में स्मृतिव्यञ्जन-
सामर्थ्य की उत्कटता के कारण यहाँ स्मृति को पद से ही व्यङ्ग्य समझना चाहिए।
अत एत्र यह मत निरस्त हो जाता है कि हर्षादि भावों के पद-व्यङ्ग्य होने पर
उनमें चमत्कार नहीं रह जाता ।
इस पद्य से प्रसङ्गात् नायिका की आनन्दमग्नता भी उसकी आँखों के उत्तरोत्तर
अधिकाधिक संकोच प्राप्त करते जाने की व्यञ्जना द्वारा ध्वनित होती है। संकोच
की अभिव्यक्ति सायंकालिक कमल से आँखों की उपमा से होती है।
अब एक प्रत्युदाहरण भी द्रष्टव्य है—
“मैं प्रियतमा के साथ हुए उस समागम का स्मरण चिरकाल करता रहता हूँ
जिसमें उसकी गर्दन कुछ झुकी हुई थी, उसके आकर्षक नयन-कमल लज्जा से कुछ
संकुचित हो गये थे और उसका सारा शरीर रतिश्रमजन्य अत्यधिक निःश्वास से
अलसाया हुआ था ॥”