रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् २६७
अथ किं भावत्वम् ? विभावानुभावभिन्नत्वे सति रसव्यञ्जकत्वमिति
चेत् ? रसकाव्यवाक्येऽतिव्याप्त्यापत्तेः, अर्थद्वारा शब्दस्यापि व्यञ्जकत्वात् ।
द्वारान्तरनिरपेक्षत्वेन व्यञ्जकत्वे विशेषिते त्वसंभवः प्रसज्येत । भावस्यापि
भावनाद्वारैव व्यञ्जकत्वात्, भावनायामतिव्याप्त्यापत्तेश्च । अत एव च
विभावानुभावभिन्नत्वस्येव शब्दभिन्नत्वस्यापि तद्विशेषणत्वे न निस्तारः;
रसकाव्येति । रसाभिव्यंजककाव्येत्यर्थः । काव्ये रसाभिव्यञ्जकत्वं च तद-
भिव्यंजकार्थोपस्थापनद्वारेणेति सम्प्रदायः 'अर्थस्य व्यंजकत्वे तत् शब्दस्य सहका-
रिता' इत्यादिना वर्णितः । तदाह—अर्थद्वारेत्यादिना । लक्षणवाक्ये साक्षाद्व्यजक-
त्वानुक्तेः परम्परया रसव्यञ्जके काव्यवाक्येऽतिव्याप्तिरुक्ता । भावनायामित्यादि ।
भावनाया द्वारान्तरनिरपेक्षाया एव रसव्यञ्जकत्वादिति भावः । न निस्तार इति ।
भावनायां शब्दभिन्नत्वस्यापि सत्त्वेन तत्रातिव्याप्तेर्यथापूर्वमवस्थानादित्यर्थः ।
इस प्रसङ्ग में सर्वप्रथम यह विवेचनीय है कि 'भाव'' कहते किसे ? इसका
क्या लक्षण है ? 'विभाव और अनुभाव से भिन्न जो रस-व्यञ्जक तत्त्व है वह
भाव है' यह कहना तो उचित नहीं है, क्योंकि रस-व्यञ्जक काव्यात्मक वाक्य में
इस लक्षण की अतिव्याप्ति स्पष्ट है । उक्त काव्य-में विभावानुभाव-भिन्नत्व भी है,
और रस-व्यञ्जकत्व भी, क्योंकि रस-व्यञ्जक अर्थ का प्रतिपादक होने से काव्य को
रस-व्यञ्जक कहना कविसम्प्रदाय में प्रसिद्ध है । यदि 'विभाव-अनुभाव से भिन्न
और रस के साक्षाद् व्यञ्जक को भाव' कहा जाय तो उक्त अतिव्याप्ति तो नहीं
होगी, क्योंकि काव्य-वाक्य में अर्थ-द्वारा रस-व्यञ्जकता होती, साक्षात् नहीं ।
परन्तु असम्भव तो होगा हीं, कारण एक भी 'भाव' बिना भावना के रस-व्यञ्जक
नहीं होता । ऐसी स्थिति में सब भावों में भावना-द्वारा हीं रस-व्यञ्जकता के
प्रसिद्ध होने से ( किसी भी भाव के साक्षाद् रस-व्यञ्जक न होने से ) किसी
भी भाव में उक्त लक्षण समन्वित न हो सकेगा । इसके साथ हीं, भावों की
'भावना' में उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति भी होगी हीं, क्योंकि भावों की भावना
साक्षाद् रस-व्यञ्जक भी है और विभावानुभाव से भिन्न भी । 'भाव' की भावना
में इस अतिव्याप्ति के कारण हीं 'विभाव-अनुभाव से भिन्न, शब्द से भिन्न और
साक्षाद् रस-व्यंजक तत्त्व को भाव' कहना भी सम्भव नहीं, क्योंकि भाव की
१. यहाँ परिष्कार भावत्व का अभीष्ट है जिसके आश्रय को 'भाव' कहा जाना
सम्भव है । परन्तु सरलता की दृष्टि से इन सब लक्षणों को भाव के लक्षण
कहा गया है । इससे इन लक्षणों के अनुसार भावत्व का स्वरूप क्या होगा —
यह समझना सरल हो जायेगा ।