सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 298, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 298

२६६ रसगङ्गाधरः
सुतरामश्रव्यः । एवं झय्घटितसयोगपरह्रस्वस्यापि । तथा शनैर्निद्रेत्यत्र,
निर्वर्ण्य पत्युर्मुखमित्यत्र च रेफघटितसंयोगस्य, झय्घटितसंयोगपरह्रस्वस्य च
प्राचुर्यम् । विस्रब्धमित्यत्र महाप्राणघटितस्य, लज्जेत्यत्र स्वात्मसवर्णझयद्वय-
घटितस्य मुखी प्रियेणेत्यत्र भिन्नपदगतदीर्घानन्तरस्य संयोगस्य, तथा क्त्वा-
प्रत्ययस्य पञ्चकृत्वः, लोकतेश्च धातोर्द्विः प्रयोगः कवेर्निर्माणसामग्रीदारिद्र्यं
प्रकाशयति । इत्यलं परकीयकाव्यविमर्शनेन । इति संक्षेपेण निरूपिता
रसाः ॥
अथ भावध्वनिर्निरूप्यते—
सकृदेवायं संयोगोऽश्रव्यतापादकस्तदा द्वौ तु सुतरामेव तथा । नैकट्येन प्रयोगे त्वति-
तमाश्रव्यतेति भावः । एवं झय्घटितेत्यादि । 'दु'-शब्दे, 'चि'-शब्दे, 'नि'-शब्दे,
'प'-शब्दादौ च झय्घटितसंयोगपूर्वस्य ह्रस्वस्य बहुलमुपलब्धिः । अन्यत् स्पष्टम् ।
तदेवं साङ्गोपाङ्गं रसनिरूपणमुपसंहरति — इति संक्षेपेणेत्यादि ।।
भावध्वनिरित्यत्र भावशब्दो हर्षादिचतुस्त्रिंशत्पदार्थपरः, तस्य ध्वनिरित्यर्थः ।
सवर्ण-झय् द्वय-संयोग हैं । ये भी आस-पास हैं । अतः अत्यधिक अश्रव्य हैं ।
इन दोनों संयोगों से पूर्व क्रमशः 'उ' और 'इ' ( श्चि-शब्द में ) ह्रस्व स्वरों में भी
अश्रव्यता है । इसी प्रकार 'शनैर्निद्रा......निर्वर्ण्य पत्युर्मुखम्' इस अंश में रेफघटित
संयोगों का अनेक बार प्रयोग किया गया है । 'द्रा' और 'त्यु' इन झय्-घटित
संयोगों से पूर्व 'इ' और 'अ' इन दो ह्रस्व स्वरों का भी प्रयोग हुआ है। 'विस्रब्धम्'
इस पद में 'ब्ध' यह संयोग महाप्राण घकार से घटित है । 'लज्जा' शब्द में पुनः
सवर्णझय्-द्वय-संयोग तथा उससे पूर्व ह्रस्व स्वर का प्रयोग है । 'मुखी
प्रियेण' इस अंश में दीर्घ स्वर (खी-के) ईकार के बाद अन्य पद 'प्रियेण' में 'प्र'
इस संयोग का भी प्रयोग है । एक हीं पद्य में 'विलोक्य', 'उत्थाय', 'निर्वर्ण्य',
'परिचुम्ब्य' और 'आलोक्य' ये पाँच क्त्वा-प्रत्ययान्त पद भी प्रयुक्त हैं । साथ हीं
'लोक्' धातु का भी दो बार प्रयोग किया गया है । इन सबसे यह स्पष्ट है कि
कवि के पास पद्य-रचना के लिए अपेक्षित सामग्री नहीं थी ।
इसी प्रकार अन्यान्य कवियों की रचनाओं में भी दोषों का अनुसन्धान पाठकों
को स्वयं करना चाहिए । दूसरे के काव्य के दोषों का इस ग्रन्थ में अधिक विवेचन
करना सम्भव नहीं ।
उपर्युक्त रीति से रसों तथा इनसे सम्बद्ध विषयों का निरूपण किया गया ॥
अब भाव-ध्वनियों का निरूपण किया जा रहा है—