रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ रसगङ्गाधरः
सापि रसन्यायेनेति केचित् ।
व्यङ्ग्यान्तरन्यायेनेत्यपरे मन्यन्ते ।
रसन्यायेनेति : यथा विभावादिसकलसामग्रीचर्वणाभग्नावरणचिद्विशिष्टो
रत्यादिरूपो भग्नावरणरत्याद्युपहितचित्स्वरूपो वा रसोऽभिव्यज्यते चर्व्यते तथैव
विभावादिचर्वणाभग्नावरणचिद्विशिष्टो हर्षादिभावोऽपीत्यर्थः । इदं चाभिनवगुप्तादि-
मतेनोक्तम् ।
स्वमतमाह—व्यङ्ग्यान्तरन्यायेनेति । व्यङ्ग्याद्रसादन्यो व्यङ्ग्योऽलङ्का-
रादिर्व्यङ्ग्यान्तरम्, तस्य यथा स्वसामग्रीबलेनाभिव्यक्तिस्तथैव हर्षादिभावाना-
मप्यभिव्यक्तिरित्यर्थः । 'अपरे' इत्यस्य 'न परे' इत्यर्थात् स्वमतमिदमिति प्रतीयते ।
अस्य मतस्येदं सारम्—यावानानन्दो रसचर्वणायामनुभूयते सामाजिकैस्तावन्नानन्दो
नालङ्कारादिव्यङ्ग्यचर्वणायामिति वस्तुगतिः । तथा च विभावादिसकलसामग्री-
चर्वणया आनन्दरूपायाश्चितो यादृश आवरणभङ्गस्तादृशो नालङ्कारादिविषय इत्या-
स्थेयं फलबलात् । यत्किञ्चिदानन्दमात्रानुभवाच्चालङ्कारध्वनावपि तदधिष्ठानभूताया-
स्तदुपहिताया वा चित (आनन्दरूपायाः) आनन्दावरणस्य शैथिल्यं पुनरवश्याभ्युपेयम्,
सर्वथा सत्यावरणे तत्रानन्दमात्राप्रत्ययाऽसम्भवात् । एवं भावध्वनावपि रसाप-
कृष्टानन्दमात्रानुभवोपपादनाय विकलविभावादिसामग्रीचर्वणया हर्षाद्यधिष्ठान-
चैतन्यस्य यदावरणं तस्य यथानुभवं यथायथं शैथिल्यमवश्यमास्थेयम् । सकल-
स्पष्ट करना चाहिए।
उपर्युक्त भावाभिव्यक्ति रसाभिव्यक्ति के तुल्य होती—ऐसा कुछ (अभिनव
गुप्त आदि) आचार्यों का मत है। आशय यही है कि जिस प्रकार विभावादि-सकल-
सामग्री की चर्वणा से जिसका आवरणभङ्ग हो चुका होता उस 'चित्' से विशिष्ट रत्यादि
की रस-रूप में अभिव्यक्ति होती उसी प्रकार विभावादि-विकल-सामग्री की चर्वणा
से जिसका आवरण (आंशिक रूप में) हँट चुका होता उस 'चित्' से विशिष्ट हर्षादि
भावों की अभिव्यक्ति होती। इस मत में रस-चर्वणा और भाव-चर्वणा में समान
आनन्दानुभव होना चाहिए था, किन्तु ऐसा होता नहीं। साथ ही सकल सामग्री और
विकल सामग्री से समान रूप में 'चित्' के आवरण का अभिभव मानना भी उचित
नहीं है।
अतः ग्रन्थकार का मत यही है कि रस-चर्वणा और भाव-चर्वणा में अनुभूय-
मान आनन्द के उत्कर्षापकर्ष के अनुसार दोनों प्रकार की सामग्रियों से होने वाले
आवरण भङ्ग में भी उत्कर्षापकर्ष अवश्य मन्तव्य है। अतः जैसे रस-चर्वणा की अपेक्षा
स्वल्प आनन्द का अनुभव अन्य अलङ्कारादि व्यङ्ग्यों की चर्वणा में होता वैसे ही