रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ रसगङ्गाधरः
प्रधानध्वन्यमानभावे रसव्यञ्जकताभावादव्याप्त्यापत्तेश्च । न च तत्रापि
प्रान्ते रसोऽभिव्यज्यत एवेति वाच्यम्, भावध्वनिविलोपप्रसङ्गात् । भावचम-
त्कारप्रकर्षाद्भावध्वनित्वम्, रसस्तु तत्र व्यज्यमानोऽप्यचमत्कारित्वान्न
ध्वनिव्यपदेशहेतुरित्यपि न शक्यं वदितुम् । चमत्काररहितरसव्र्यक्तौ
मानाभावात् । रसे, हि धर्मिग्राहकमानेनानन्दांशाऽविनाभावस्य प्रागेवावे-
दनात् ।
प्रधानेत्यादि । यत्र भावस्यैव प्राधान्येन ध्वननम्, न तु रसस्य तेन, तथा सति
गुणस्य भावस्य ध्वनिव्यपदेशानुपपत्तेरित्यतः तस्मिन् भावे यथाकथञ्चिदपि
रसव्यंजकत्वाभावाद् भावक्षणाऽव्याप्तिः । दर्प णोयुक्तदिशो निराकरणार्थ-
माह—नचेत्यादि । प्रान्ते = भावध्वननानन्तरम् । विलोप इति । रसस्य
प्रान्तेऽभिव्यज्यमानस्यैव प्रधानतया ध्वनिव्यपदेशहेतुत्वेन तदङ्गभूतभावस्या-
प्रधानस्य कुत्रापि ध्वनिव्यपदेशहेतुत्वानुपपत्तेरित्यर्थः । भावचमत्कारेत्यादिः
पूर्वपक्षः । चमत्कारातिशयनिमित्तकस्तु रसाङ्गीभूतेऽपि भावे ध्वनित्व-
व्यवहार उपपन्न इत्याशयः पूर्वपक्षस्य । चमत्काररहितेत्यादिरुत्तरपक्षः ।
निरतिशयचमत्काररहितेत्यर्थः । यो हि रसः स निरतिशयचमत्कारवानेव, यश्च न
निरतिशयचमत्कारवान् स न रस इत्याशय उत्तरपक्षस्य । एतमेवोपपादयति—रसे
हीत्यादिना । आनन्दांश एव निरतिशयचमत्कारविशिष्टो, न कश्चिदन्यः । तथा
भावना के भी शब्दभिन्न होने से उक्त अतिव्याप्ति दोष इस तृतीय-पक्ष में भी
यथापूर्व बना हीं रहता है । इसके अतिरिक्त, इस तृतीय लक्षण की भाव-ध्वनि
में अव्याप्ति भी होगी हीं, क्योंकि ध्वन्यमान भाव रस व्यंजक नहीं होते । यदि
कोई भी भाव पहले व्यञ्जित होकर भी पश्चात् रस का व्यंजक हो जाय तो उसे
ध्वनि—भाव-ध्वनि कहा नहीं जा सकता । कोई भी तत्त्व 'ध्वनि' तभी कहा
जाता जब वह प्रधान रूप में अभिव्यक्त होता हो । स्वयम् अभिव्यक्त होकर
दूसरे की अभिव्यक्ति करने वाला तो उस अभिव्यज्यमान अन्य तत्त्व का
अङ्ग बन जाता । ऐसी स्थिति में तृतीय लक्षण करने पर तो भाव ध्वनि का
अस्तित्व हीं मिट जाएगा । अतः तृतीय लक्षण असंगत है । भाव द्वारा अन्ततः रस
का अभिव्यंजन होने पर भी जहाँ अभिव्यज्यमान रस की अपेक्षा उसका
अभिव्यंजक भाव अधिक आकर्षक—चमत्कारजनक (और वाच्यार्थ की अपेक्षा प्रधान)
हो वही भाव-ध्वनि कहलाता, अन्य नहीं; अतः तृतीय लक्षण करने पर भी भाव-
ध्वनि के अस्तित्व का मिटना और उस कारण भाव-ध्वनि में अव्याप्ति दिखलाकर
तृतीय लक्षण का खण्डन करना अनुचित है—यह तर्क भी असंगत है, क्योंकि एक