रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
१२६ रसगङ्गाधरः
गृहकलहादिजस्तु व्यभिचारी ॥
गुरुबन्धुवधादिपरमापराधजन्मा प्रज्वलनाख्यः क्रोधः ॥
अयं च परविनाशादिहेतुः । क्षुद्रापराधजन्मा तु परुषवचनासंभाषणा-
दिहेतुः । अयमेवामर्षाख्यो व्यभिचारीति विवेकः ॥
परपराक्रम-दानादिस्मृतिजन्मा औन्नत्याख्य उत्साहः ॥
अलौकिकवस्तुदर्शनादिजन्मा विकासाख्यो विस्मयः ॥
गन्तव्यं यदि नाम निश्चितमहो ! गन्ताऽसि केयं त्वरा
द्वित्राण्येव पदानि तिष्ठतु भवान् पश्यामि यावन्मुखम् ।
संसारे घटिकाप्रणालविगलद्वारा समे जीविते
को जानाति पुनस्त्वया सह मम स्याद्वा न वा सङ्गमः ॥
इत्यत्र दैन्यजो विरागो विप्रलम्भे व्यभिचार्येव, तत्पोषकत्वात् । न तस्य
स्थायित्वम् । अतोत्र रससङ्करानौचित्यवर्णनमसहृदयतामेव प्रकाशयति । एतत्सर्व-
मभिप्रेत्याह—गृहकलहादिजेत्यादि ।
रौद्रस्थायिभावलक्षणमाह—गुरुबन्धुवधेत्यादि । आदिपदमिष्टमात्रोपसंग्रा-
हकम् । प्रज्वलनाख्य इत्यस्य चित्तवृत्तिविशेष इति शेषः । व्यभिचारीति ।
रौद्रादाविति शेषः ।
गृह-कलह आदि से उत्पन्न निर्वेद तो क्षणिक होने से विप्रलम्भ शृंगार आदि
रसों में व्यभिचारिभाव होता, स्थायिभाव नहीं ॥
रौद्र रस का स्थायिभाव क्रोध है जिसे चित्त का प्रज्वलन (जलन) भी कहते ।
यह गुरु अथवा अन्य किसी इष्टजन के वध अथवा उसे अत्यन्त कष्ट आदि पहुँचाने
जैसे उत्कट अपराध किये जाने पर उत्पन्न होता ॥
यही क्रोध उत्कट अपराधी के विनाश आदि का कारण है । किन्तु यदि
अपराध साधारण कोटि का होता तो इससे उसके प्रति लोग कठोर वचन का
प्रयोग करते या फिर बोलते हीं नहीं । अन्य प्रकार की कटु भावना आदि भी इसी
से उत्पन्न होतीं । साधारण कोटि के अपराध से उत्पन्न कोप को हीं अमर्ष कहा
जाता जो रौद्र आदि रसों के व्यभिचारिभावों में अन्यतम है । क्रोध और अमर्ष
में यही अन्तर है ॥
. वीर रस का स्थायिभाव उत्साह है जिसे चित्त का औन्नत्य, अर्थात् उत्कृष्ट-
प्रयत्नसम्पन्नता भी कहा जाता । इसकी उत्पत्ति शत्रु के पराक्रम और उसकी
दानशीलता आदि के स्मरण से होती ॥
अद्भुत रस का स्थायिभाव विस्मय है । अलौकिक वस्तु के दर्शन आदि से
उत्पन्न चित्त का विकास ( विस्तार = फैलना ) हीं इसका स्वरूप है ॥
प्रथमाननम् १२७
वागङ्गादिविकारदर्शनजन्मा विकासाख्यो हासः ॥
व्याघ्रादिदर्शनादिजन्मा परमानर्थविषयको वैक्लव्याख्यः स भयम् ॥
परमानर्थविषयकत्वाभावे तु स एव त्रासो व्यभिचारी । अपरे तु
औत्पातिकप्रभवस्त्रासः, स्वापराधद्वारोत्थं भयमिति भयत्रासयोर्भेदमाहुः ॥
कदर्यवस्तुविलोकनजन्मा विचिकित्साख्यचित्तवृत्तिविशेषा जुगुप्सा ॥
एवमेषां स्थायिभावानां लोके तत्तन्नायकगतानां यान्यालम्बनतयोद्दीपन-
विकारेति। स चात्र स्वाभाविकः, कृत्रिमश्च क्षुद्र एव, गुरुतरविकारोऽपि
स्वकृतः न परकृतः, परकृते हि गुरुतरविकारे क्रोधोदयाद् विकर्तरि इति
बोध्यम् ।
निगडनिबद्धव्याघ्रादिदर्शने कस्यचिद्भयानुदयात् परमानर्थविषयक इत्युक्तम् ।
अतश्च यस्य तथाविधव्याघ्रादिदर्शनेऽपि परमानर्थजनकत्वसम्भावना तस्य भयं
ततोऽप्युत्पद्यत एव । क्षुद्रानर्थविषयकत्वे त्वाह—व्यभिचारीति । बीभत्सादाविति
शेषः । शोकभययोर्वैक्लव्यात्मकत्वेऽपि कारणभेदाद् भेदोऽनयोरवगन्तव्यः । औत्पा-
तिकेति । वज्रनिर्घातादिप्रभव इत्यर्थः । अत्रापि कारणभेदादेव त्रासभयोर्भेदः ।
कदर्यम् = कुत्सितम् । विचिकित्सा = गर्हणा । एते च रत्यादयो यथोद्देशं
शृङ्गारादीनां स्थायिनः ।
सम्प्रति आलम्बनकारणादीनां विभावपदव्यपदेशे हेतुमाह—एवमित्यादिना ।
हास्य रस का स्थायिभाव हास है । इसे किसी व्यक्ति के वचन, अङ्ग प्रत्यङ्ग
तथा वेष आदि में विद्यमान विकार के ज्ञान से उत्पन्न चित्तविकास (चित्त का खिल
उठना) कहा जाता है ॥
व्याघ्र आदि हिंस्र जीवों या अन्य किन्हीं परम अनर्थ (= मरण आदि) के जनक
वस्तुओं के दर्शन-श्रवण आदि से उत्पन्न जो चित्त की उत्कट विकलता है वही भय
है । यही भयानक रस का स्थायिभाव है ॥
यदि यह चित्त विकलता परमानर्थविषयक न हो, अर्थात् किसी साधारण अनिष्ट
का जनक प्रतीत होती हो तो उसे 'त्रास' कहते, 'भय' नहीं । अतः त्रास व्यभिचारी
भाव है, स्थायी भाव नहीं । कुछ आचार्यों का मत है कि आधिभौतिक-आधिदैविक
आपदाओं से उत्पन्न चित्तविक्लवता त्रास है जब कि अपने (उत्कट) अपराधों से
उत्पन्न विकलता भय है—यही भय और त्रास में ... ने
कारणभेद से भिन्नता (कार्यभेद) माननी चाहिए ॥
किसी कुत्सित पदार्थ के दर्शन आदि से उत्पन्न एक प्रकार की चित्तवृत्ति, जिसे
'विचिकित्सा' (घृणा) कहते, जुगुप्सा है । यही बीभत्स रस का स्थायी भाव है ॥
इस प्रकार पूर्वोक्त विभिन्न नायक-नायिकाओं में विद्यमान रत्यादि नौ स्थायि-
१२८ रसगङ्गाधरः
तया वा कारणत्वेन प्रसिद्धानि तान्येषु काव्यनाट्ययोर्व्यज्यमानेषु विभाव-
शब्देन व्यपदिश्यन्ते ॥
विभावयन्तीति व्युत्पत्तेः ।
यानि च कार्यतया तान्यनुभावशब्देन ॥
अनु पश्चाद्भाव उत्पत्तिर्येषाम् । अनुभावयन्तीति वा व्युत्पत्तेः ।
यानि व्यभिचरन्ति तानि व्यभिचारिशब्देन ॥
एषु = स्थायिभावेषु । व्यज्यमानेष्वित्यनेन वाच्यत्वादिव्यवच्छेदः । विभावयन्ति =
रत्यादिभावान् सामाजिकगतन् आस्वादाङ्कुरप्रादुर्भावयोग्यान् कुर्व्वन्ति । स्थायि-
जनकत्वे सति साधारणीकरणव्यापारविषयत्वं विभावत्वमिति च प्राहुः ।
पश्चादिति । रत्याद्युत्पत्तेरनन्तरम् इत्यर्थः । अतश्चाव्यवहितप्राक्क्षणावच्छेदेन
वर्त्तमाना अनन्यथासिद्धा रत्यादयः स्थायिनः कारणानि, तदव्यवहितोत्तरक्षणा-
वच्छेदेन जायमानाश्चानुभावाः कार्याणीति व्यपदिश्यन्ते । एतस्य चार्थस्य लौकि-
केऽपि रत्यादिकार्ये सम्भवादतिव्यापकत्वमिति हेतोः काव्यमात्रनियतानुभावपद-
प्रवृत्तिनिमित्तान्तरमाह—अनुभावयन्तीति । अनुमापयन्तीत्यर्थः । अनुभावैर्हि
सामाजिकनिष्ठा रत्यादय अनुमीयन्ते, कार्याणां सकारणत्वनियमादिति तात्पर्यम् ।
व्यभिचरन्तीति । विशेषेण आभिमुख्येन कार्यजनने चरन्ति स्थायिन उपकुर्व्वन्ति
ये ते व्यभिचारिणः । सह चरन्तीति पाठेऽपि स्थायिसहकारित्वमेव सञ्चारित्वं
भावानाम् । तदुक्त दर्पणे—
भावों के जो आलम्बन कारण या उद्दीपन कारण के रूप में लोक-प्रसिद्ध हैं उन्हें हीं
काव्य नाट्य में स्थायिभावों के अभिव्यञ्जक होने के कारण 'विभाव' कहलाते ।
ये आलम्बनादि कारण विभाव इस लिए कहलाते यतः ये स्थायिभाव को
विभावित, अर्थात् आस्वाद्ययोग्य, करते । अन्यथा स्थायिभावों का अस्तित्व
प्रमाणित न होने से किसी भी प्रक्रिया द्वारा सहृदयों को रसास्वाद न हो सकेगा ।
मुखदर्शनादि को अनुभाव इस लिए कहते यतः इनका भाव, अर्थात् उत्पादन
स्थायिभावों के पश्चाद्भावी है। पश्चाद्भावी का नियतपूर्वभावी कारण से उत्पन्न—
कार्य होना शास्त्र-सिद्ध है¹ । अथवा, इन्हें अनुभाव इस लिए कहा जाता यतः ये
स्थायिभावों को सहृदयों के लिए अनुभावित, अर्थात् प्रतितियोग्य बनाते—इन्हीं
अनुभावों से सहृदयों को नायकादिनिष्ठ स्थायिभावों की अनुभूति होती ।
जो स्थायिभावों के साथ कभी-कभी रहते उन्हें सञ्चारिभाव और वे हीं
१. यह ज्ञातव्य है कि भिन्न-भिन्न स्थायी भावों से उत्पन्न रोमाञ्च आदि अनु-
भावों को भी परस्पर विलक्षण हीं होना चाहिए ।
प्रथमाननम् १२९
तत्र शृङ्गारस्य स्त्रीपुंसावालम्बने। चन्द्रिकावसन्तविविधोपवनरहः-
स्थानादय उद्दीपनविभावाः। तन्मुखावलोकनतद्गुणश्रवणकीर्तनादयोऽन्ये
सात्त्विकभावाश्चानुभावाः। स्मृतिचिन्तादयो व्यभिचारिणः।
करुणस्य बन्धुनाशादय आलम्बनानि। तत्संबन्धिगृहतुरगाभरणदर्श-
नादयस्तत्कथाश्रवणादयश्चोद्दीपकाः। गात्रक्षेपाश्रुपातादयोऽनुभावाः।
विशेषेणाभिमुख्येन चरन्तो व्यभिचारिणः।
स्थायिन्युन्मग्ननिमग्नाः कल्लोला इव वारिधौ ॥ इति ।
अत एव प्रदीपकृताऽपि वर्णितम्—
ये तूपकर्तुमायान्ति स्थायिनं रसमुत्तमम् ।
उपकृत्य च गच्छन्ति ते मता व्यभिचारिणः ॥ इति ।
इदानीमादिनिर्दिष्टानां शृङ्गारादीनां चतुर्णां रसानां विभावानुभावव्यभिचारि-
भावानाह विशेषेण—तत्रेत्यादिना । उक्तेषु रसेष्वित्यर्थः ।
बन्धुनाशादय इति । नष्टबन्ध्वादय इति केचित् । तत्र नष्टानामालम्बनत्वा-
सर्वदा साथ न रहने, अर्थात् व्यभिचरित होने, से 'व्यभिचारिभाव' भी
कहे जाते ॥
उक्त नवविध रसों में—
शृङ्गार रस के नायक-नायिका आलम्बन विभाव हैं । रति के उभयनिष्ठ होने
से नायक के लिये नायिका और नायिका के लिए नायक आलम्बन विभाव है।
आलम्बन का अर्थ विषयता सम्बन्ध से रत्यादि का आश्रय है। चन्द्रिका, वसन्त
ऋतु, विभिन्न प्रकार के रम्य पुष्पों से सम्पन्न उद्यान, एकान्त स्थान तथा अन्य
कामोद्दीपक पदार्थ इस रस के उद्दीपन विभाव हैं। वारम्बार प्रियतम अथवा
प्रियतमा के मुख का परस्पर अनुरक्तभाव से अवलोकन, उसके गुणों का
श्रवण तथा उच्चारण एवम् रोमाञ्च आदि कुछ अन्य सात्त्विक भाव शृङ्गार
के अनुभाव हैं। अनुरागपूर्वक परस्पर-स्मरण एवं चिन्ता आदि इसके व्यभिचारि-
भाव हैं ॥
इष्ट जनों का विनाश अथवा उन पर आई कोई घोर विपत्ति या नष्ट इष्टजन
१. 'व्यभिचारी' यह नाम इस तथ्य का स्पष्ट संकेत करता कि शास्त्र में जिस रस
के जितने व्यभिचारिभाव गिनाये गये हैं वे सब के सब सर्वत्र रस-स्थल में
होते ही हों—यह आवश्यक नहीं है। वस्तुतः उद्दीपन विभावों और अनुभावों
की भी यही स्थिति है। उनमें सर्वदा सब का होना अनिवार्य नहीं। ग्रन्थ में
निर्देश तो उपलक्षण है।
१३० रसगङ्गाधरः
ग्लानिक्षयमोहविषादचिन्तौत्सुक्यदीनताजडतादयो व्यभिचारिणः ।
शान्तस्यानित्यत्वेन ज्ञातं जगदालम्बनम् । वेदान्तश्रवण-तपोवन-तापस-
दर्शनाद्युद्दीपनम् । विषयारुचिशत्रुमित्राद्यौदासीन्यचेष्टाहानिनासाग्रदृष्टया-
दयोऽनुभावाः । हर्षोन्मादस्मृतिमत्यादयो व्यभिचारिणः ।
नुपपत्तेर्बन्ध्वादिनाशस्यैवालम्बनत्वमुचितमिति पण्डितराजाकूतम् । तथा हि यस्या-
श्चित्तवृत्तेर्यो विषयः स एव तस्या आलम्बनम् । प्रकृते च प्रतियोगिनि बन्ध्वादौ
प्रीत्या तन्नाशाऽसहिष्णुत्वलक्षणद्वेषात्मकस्य करुणरसस्थायिनः शोकस्य विषयो न
बन्ध्वादिः, तत्र द्वेषाऽभावात्, अपि तु तन्नाश एवेति युक्तं बन्ध्वादिनाशस्यैवा-
लम्बनत्वं न तु बन्ध्वादेः । यद्वा नष्टबन्ध्वादय एवालम्बनमिति मन्तव्यम्, तथैवा-
नुभवात् सामाजिकानाम् । अत एव स्वयमपि करुणोदाहरणावसरे 'अत्र प्रमीततनय
आलम्बनम्' इति वक्ष्यति । उक्तद्वेषविषयत्वं च यद्यपि नाशस्यैव तथापि अभावस्य
प्रतियोगिविशेषितत्वनियमात् प्रतियोगिनो बन्ध्वादेरपि तत्त्वं कथञ्चिन्निर्वाह्यम् ।
अधिकं विज्ञैर्विवेचनीयम् ।
शान्तं निरूपयति-शान्तस्येत्यादिना । चेष्टाहानिरित्येकोऽनुभावः । हिताऽ-
हितप्राप्तिपरिहारार्था हि क्रिया चेष्टा, सा च सर्वथा जगद्विरक्ते न सम्भवति,
तस्येह जगति समत्वबुद्धेः । यद्यपि पूर्वसंस्कारवशात् स हितमेवादत्ते तथापि तस्य
तत्र हितत्वबुद्धिर्नास्त्येवेत्यर्थः । हर्षोन्माद इति । हर्ष उन्मादश्चेत्यर्थः । अत्रोन्माद-
शब्देन उत्कण्ठादिजन्यश्चित्तविप्लवो न विवक्षितः, तस्य शमप्रधाने चेतस्यसम्भवात् ।
अपि तु परमानन्दप्राप्तिजन्यः परमार्थतोऽसत्ये ब्रह्मभिन्ने जगति सत्यब्रह्मरूपतानुभवः,
व्यवहारतः सत्ये वा जगति परमार्थतस्तद्रूपेणासत्यत्वानुभवो वा । अन्यस्मिन्नन्या-
वभासश्च चित्तविप्लवेऽपि न व्यभिचरति । मत्यादेलक्षणं स्वयमेव भावध्वनि-
करुण रस के आलम्बन विभाव हैं। उस प्रकार के इष्ट जनों के स्मारक
उनके घर, वाहन, आभूषण आदि के दर्शन-स्मरण और उनकी कथा का श्रवण स्मरण
आदि उद्दीपन विभाव हैं। विपत्ति के समय अङ्गों का विक्षेप तथा अश्रुपात आदि
अनुभाव हैं। ग्लानि, क्षय, मोह, विषाद, चिन्ता, औत्सुक्य, दीनता, जड़ता आदि
इस करुण रस के व्यभिचारिभाव हैं ॥
शान्त रस का आलम्बन विभाव तो अनित्य रूप में ज्ञायमान यह सम्पूर्ण
जगत् है। वेदान्त-श्रवण, तपोवन और तपस्वियों के दर्शन आदि इसके उद्दीपन
विभाव हैं । सांसारिक विषयों में अरुचि, शत्रु-मित्र में तटस्थता, हित प्राप्ति या
अहित-निवृत्ति के लिए जनसामान्य द्वारा की जाने वाली चेष्टाओं का अभाव,
नासाग्रभाग पर एकतान दृष्टि आदि इसके अनुभाव हैं और हर्ष, परमानन्दानुभव-
जन्य उल्लास, स्मृति तथा मति आदि इसके व्यभिचारिभाव हैं ॥
प्रथमाननम् १३१
रौद्रस्यापकर्तृपुरुषादिरालम्बनम् । तत्कृतोऽपराधादिरुद्दीपकः ।
वधबन्धादिफलको नेत्रारुण्यदन्तपीडनपरुषभाषणशस्त्रग्रहणादिरनुभावः ।
अमर्षवेगौग्र्यचापलादयः संचारिणः ।
एवं यस्याश्चित्तवृत्तेर्यो विषयः स तस्या आलम्बनम् । निमित्तानि
चोद्दीपकानीति बोध्यम् ।
तत्र शृङ्गारो द्विविधः—संयोगो विप्रलम्भश्च । रतेः संयोगकालाव-
च्छिन्नत्वे प्रथमः, वियोगकालावच्छिन्नत्वे द्वितीयः । संयोगश्च न दंपत्योः
सामानाधिकरण्यम्, एकतल्पशयनेऽपीर्ष्यादिसद्भावे विप्रलम्भस्यैव वर्ण-
प्रकरणे वक्ष्यति । अमर्ष इति । अयं चानुपदमेव ग्रन्थकृता लक्षितः ।
तदेवं शृङ्गारकरुणशान्तरौद्राणां विभावादीन् विशेषतो वर्णयित्वा सम्प्रति
रसान्तरालम्बनोद्दीपनप्रवृत्तिनिमित्तप्रतिपादन
१३२ रसगङ्गाधरः
नात् । एवं वियोगोऽपि न वैयधिकरण्यम्, दोषस्योक्तत्वात् । तस्माद्
द्वाविमौ संयोगवियोगाख्यावन्तःकरणवृत्तिविशेषौ । यत्संयुक्तो वियुक्त-
श्चास्मीति धीः । तत्राद्यो यथा—'शयिता सविधेऽप्यनीश्वरा' इत्यत्र
निरूपितः ।
यत्तु चित्रमीमांसायाम्—'वागर्थाविव संपृक्तौ' इत्यत्र रसध्वनिः,
निरतिशयप्रेमशालिताव्यञ्जनात्' इति, तद्ध्वनिमार्गानकलननिबन्धनम् ।
स्वारस्यादपि दैशिकसामानाधिकरण्यस्यैवावगतेश्च । दोषस्येति । एकतल्पशयनेऽ-
पीत्यादिवाक्योक्तस्येत्यर्थः । तत्र दैशिकवैयधिकरण्याभावेऽपि विप्रलम्भाङ्गीकारादिति
हेतुरत्र । यत् = यतः । वस्तुतोऽत्र सामानाधिकरण्यज्ञानमपेक्षितम् ।
निरतिशयप्रेमेति । प्रेम च नित्यसम्बद्धवागर्थवत् संपृक्तत्ववर्णनात्पार्वती-
रति संयोगकालावच्छिन्न (संयोगकाल से विशिष्ट) हो तो संयोग शृङ्गार
और यदि वियोगकाल से अवच्छिन्न हो तो विप्रलम्भ शृङ्गार होता । संयोग का
अर्थ नायक-नायिका का एक देश में अवस्थान (दैशिक सामानाधिकरण्य) नहीं,
क्योंकि यदि नायक-नायिका में परस्पर ईर्ष्या आदि के कारण तात्कालिक वैमनस्य
हो तो एक घर में क्या, एक शय्या पर भी दोनों के लेटे रहने पर आचार्यों
ने विप्रलम्भ शृङ्गार ही माना है, संयोग शृङ्गार नहीं । अत एव विप्रलम्भ का
भी अर्थ दैशिक वैयधिकरण्य नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने में जो दोष आता—वह कहा
जा चुका है। तात्पर्य यह है कि यदि दैशिक वैयधिकरण्य ही विप्रलम्भ हो तब तो
तात्कालिक वैमनस्य के कारण एक शय्या पर लेटी नायक-नायिका के बीच दैशिक
सामानाधिकरण्य रहने पर भी विप्रलम्भ का जो आचार्यों ने स्वीकार किया है
वह असङ्गत हो जायेगा । अतः संयोग और विप्रलम्भ ये दोनों ही दो चित्तवृत्तियाँ
हैं जिनके कारण नायक-नायिका में क्रमशः 'हम संयुक्त हैं' और 'हम वियुक्त हैं'
इस प्रकार की धारणाएं बनतीं १। इन दोनों भेदों में संयोग शृङ्गार का उदाहरण
तो उत्तमोत्तम काव्य का जो उदाहरण 'शयिता सविधेऽप्यनीश्वरा' आदि पद्य
दिया गया है वही है।
चित्रमीमांसाकार अप्पय्य दीक्षित ने रघुवंश के प्रथम पद्य—"वागर्थाविव
१. अतः उक्त धारणाएं चाहे दैशिक सामानाधिकरण्य होने पर होती हों या
इसके अभाव में, यथाक्रम उभयविध शृङ्गार रस होगा। कालिक सामाना-
धिकरण्य तो उभयविध शृङ्गारों में अनिवार्य है, इसके अभाव का ज्ञान
होने पर तो करुणरस ही होगा, शृङ्गार नहीं।
प्रथमाननम् १३३
पार्वतीपरमेश्वरविषयककविरतौ प्रधाने निरतिशयप्रेम्णो गुणीभावात् । न
हि गुणीभूतस्य रत्यादे रसध्वनिव्यपदेशहेतुत्वं युक्तम्, 'भिन्नो रसाद्यलं-
कारादलंकार्यतया स्थितः' इति सिद्धान्तात् ।
द्वितीयो यथा—
वाचो माङ्गलिकीः प्रयाणसमये जल्पत्यनल्पं जने
केलीमन्दिरमारुतायनमुखे विन्यस्तवक्त्राम्बुजा ।
निःश्वासग्लपिताधरोपरि पतद्बाष्पार्द्रवक्षोरुहा
बाला लोलविलोचना शिव शिव प्राणेशमालोकते ॥
परमेश्वरयोर्व्यज्यते । स्वोक्तार्थे मम्मटोक्तिं प्रमाणयति — भिन्न इत्यादिना । इदं
चित्रमीमांसाखण्डनं ग्रन्थकृतः प्रौढिवादमात्रम्, तत्रास्मिन्नुदाहरणे स्पष्टमेव ध्वनित्व-
खण्डनादिति विभावनीयम् ।
द्वितीयः = विप्रलम्भः । वाच इत्यादि । स्वप्राणेशस्य प्रयाणसमये माङ्गलिकी-
मङ्गलफलिका वाचो जनेऽनल्पं जल्पति सति क्रीडागृहगवाक्षमुखे विन्यस्तं
मुखकमलं यया सा, अथ च निःश्वासैरुष्मातिशयवद्भिः ग्लपितस्य मलिनीकृतस्या-
धरस्योपरि पतद्भिर्बाष्पैराद्रौ स्तनौ यस्याः सा लोलविलोचना बाला प्राणेश-
मालोकते इत्यर्थः । शिव शिवेति खेदातिशयद्योतनाय ।
सम्पृक्तौ•••• •••" में यह कहा है कि इससे पार्वती-परमेश्वर के निरतिशय
प्रेम का अभिव्यञ्जन होने से यहाँ शृङ्गाररसध्वनि है । किन्तु उन्होंने यह वक्तव्य
ध्वनिमार्ग के मर्म को न समझ कर दिया है, अतः अनुचित है । वस्तुस्थिति
यह है कि पूर्वोक्त पद्य में तो कवि की जो पार्वती-परमेश्वर-विषयक रति है वही
प्रधान है, उन दोनों का निरतिशय प्रेम तो उस कविरति का गुणीभूत है । अतः
पार्वती-परमेश्वरनिष्ठ रति को ध्वनि नहीं कहा जा सकता, क्योंकि गुणीभूत पदार्थ
ध्वनिपदवाच्य कदापि नहीं होता । काव्यप्रकाश (आदि) में यह सिद्धान्त स्थापित
है कि गुणीभूत होने के कारण अलङ्कारभूत रसादि से प्रधानीभूत अलङ्कार्य, अत एव
ध्वनिपदवाच्य, रस सर्वथा भिन्न है । इससे स्पष्ट है कि गुणीभूत पार्वती-परमेश्वर-
निष्ठ रति ध्वनिपदाभिधेय हो नहीं सकती, यहाँ तो पार्वती-परमेश्वरात्मक
देवताविषयक कविरतिस्वरूप 'भाव' ही ध्वनिव्यपदेश्य है ॥
अब विप्रलम्भ शृङ्गार का उदाहरण देखिए :—"एक ओर तो नायक का
अपने घर से प्रस्थान करते समय उसके इष्ट जन प्रचुर रूप में प्रास्थानिक
मङ्गलगान कर रहे हैं और दूसरी ओर उसकी नवोढ़ा प्रियतमा अपने रतिक्रीड़ा-
गृह की खिड़की पर अपना मुखकमल रख कर अपने प्रस्थान-परायण प्राणनाथ
१३४ रसगङ्गाधरः
अत्राप्यालम्बनस्य नायकस्य, निःश्वासाश्रुपातादेरनुभावस्य, विषाद-
चिन्तावेगादेश्च व्यभिचारिणः संयोगाद्रतिरभिव्यज्यमाना वियोगकालाव-
च्छिन्नत्वाद् विप्रलम्भरसव्यपदेशहेतुः ।
यथा वा—
आविर्भूता यदवधि मधुस्यन्दिनी नन्दसूनोः
कान्तिः काचिन्निखिलनयनाकर्षणे कार्मणज्ञा ।
श्वासो दीर्घस्तदवधि मुखे पाण्डिमा गण्डयुग्मे
शून्या वृत्तिः कुलमृगदृशां चेतसि प्रादुरासीत् ॥
आविर्भूतेत्यादि । यदवधि यतः प्रभृति नन्दसूनोः कृष्णस्य मधुस्यन्दनशीला
कामरसस्यन्दिनी, निखिलानां नयनानामाकर्षणे कार्मणज्ञा मन्त्रतन्त्रविधिज्ञा वशी-
करणक्षमा काचिद् विलक्षणा नवयौवनप्रभवा कान्तिराविर्भूता तदवधि ततः प्रभृत्येव
कुलमृगदृशां यदुरमणीनां वियोगातिशयवशाद् दीर्घः श्वासो मुखे, पाण्डिमा गण्डयुग्मे,
चेतसि च शून्या निरालम्बना वृत्तिः प्रादुरासीत् प्रावर्त्ततेत्यर्थः । निरालम्बनत्वं च
वृत्तेः श्रीकृष्णप्राप्त्यशक्यतयोन्नेयम् ।
अत्रालम्बनस्य श्रीकृष्णस्यानुभावस्य दीर्घश्वासादेस्तद्व्यङ्ग्यविषादादिव्यभिचा-
रिणश्च संयोगाद् वियोगकालावच्छिन्नत्वेन विप्रलम्भो व्यज्यत इति पूर्ववज्ज्ञेयम् ।
को बड़ी ही कातर दृष्टि से एकटक देख रही है ओर उसकी आंखों से इतने आंसू
बह रहे हैं जो उसके दीर्घ उष्ण निश्वास से कुम्हलाये अधर से टपकते हुए उसके
स्तनों को भी गीले कर रहे हैं । ओह ! कितने कष्ट की बात है !’’
एक नवोढ़ा के विषय में किसी सहृदय द्वारा उक्त इस पद्य में नायक-स्वरूप
आलम्बन विभाव, निःश्वास-अश्रुपात आदि अनुभावों और विषाद, चिन्ता, आवेग
आदि व्यभिचारिभावों के सम्बन्ध से अभिव्यज्यमान जो नायिकानिष्ठ नायक-
विषयक रति है वह वियोगकाल से अवच्छिन्न (= वियोगकालिक ) होने से
विप्रलम्भ कहलाती है ।
एक अन्य उदाहरण भी—
“जब से नन्दतनय श्रीकृष्ण की युवतियों के मन में कामरस प्रवाहित करने
वाली और उन सब की आँखों को आकृष्ट करने में जादूगर के समान कुशल
यौवनावस्था की वह अलौकिक छटा प्रकट हुई उसी समय से कुलाङ्गनाओं के
मुख पर दीर्घ श्वास, उनके दोनो कपोलों पर सफेदी और उनके मन में शून्य
वृत्ति (= उदासी ) का भी आरम्भ हो गया ।।”
इसमें भी श्रीकृष्ण आलम्बन विभाव, दीर्घ श्वास आदि अनुभाव
प्रथमाननम् १३५
यथा वा—
नयनाञ्चलावमर्शं या न कदाचित्पुरा सेहे ।
आलिङ्गितापि जोषं तस्थौ सा गन्तुकेन दयितेन ॥
इहापि सहजचाञ्चल्यनिवृत्तिर्जडता चानुभावव्यभिचारिणौ । इमं च
पञ्चविधं प्राञ्चः प्रवासादिभिरामनन्ति । ते च प्रवासाभिलापविरहेर्ष्या-
शापानां विशेषाऽनुपलम्भान्नास्माभिः प्रपञ्चिताः ।
करुणो यथा -
अपहाय सकलबान्धवचिन्तामुद्वास्य गुरुकुलप्रणयम् ।
हा तनय विनयशालिन् ! कथमिव परलोकपथिकोऽभूः ॥
श्रीकृष्णविषयककविरतिं प्रति विप्रलम्भगतैर्गुणीभूतत्वाच्छङ्क्योदाहरणान्तरं
नयनाञ्चलेत्यादीति रसचन्द्रिका । नयनाञ्चलेत्यादि । नयनाञ्चलस्य पक्ष्मणोऽव-
मर्शमाघातं या पुरा न सेहे सैव गन्तुकेन दयितेनालिङ्गिताऽपि गमनकाले जोषं तूष्णीं
तस्थौ जडवदिति पदार्थः । अत्रावमर्शश्च सम्भोगकालिकपतिपक्ष्मणो विवक्षितः ।
यद्वाऽत्र लोकसमक्षं पतिकटाक्षसम्बन्ध एव नयनाञ्चलावमर्शः । इमं चेति ।
विप्रलम्भशृङ्गारमित्यर्थः । प्राञ्चः प्रकाशकारादयः । विशेषाऽनुपलम्भादित्यस्य
फले विप्रलम्भभेदानाम् इत्यादिः ।
अपहायेत्यादि उद्वास्य = निरस्य । अत्र विनयशालित्वेन बान्धवपरित्याग
और दीनता आदि व्यभिचारिभावों के सम्बन्ध से कुलाङ्गनानिष्ठ श्रीकृष्ण-
विषयक रति अभिव्यक्त हो रही है । यतः यह रति वियोगकाल से अवच्छिन्न
है अत एव इसे भी विप्रलम्भ कहा जाना चाहिए ।
अथवा यह तीसरा उदाहरण देखिए :—
“जो यह कामिनी लोक लज्जा के कारण अपने प्रियतम के कटाक्षपात को भी
पहले कभी न सह पाती थी वही आज दूर जाने वाले पति के द्वारा प्रगाढ़ आलिङ्गन
किये जाने के समय भी चुपचाप खड़ी रही ॥”
इस पद्य में प्रस्थान करने वाला प्रियतम आलम्बन विभाव, प्रस्थानादि
उद्दीपन विभाव, चञ्चलता की निवृत्ति अनुभाव और इससे व्यज्यमान जड़ता
आदि व्यभिचारिभाव हैं । यतः नायिका की नायकविषयक रति यहाँ वियोगकाल
से अवच्छिन्न है अतः यहाँ का शृङ्गार विप्रलम्भ कहा जाएगा ।
मम्मट आदि प्राचीन आचार्य वियोग के हेतुओं के प्रवास, अभिलाष, विरह,
ईर्ष्या और शाप इन पाँच प्रकार के होने से विप्रलम्भ को भी पाँच प्रकार का
मानते । किन्तु हमने इन सब का पृथक् वर्णन इसीलिए छोड़ दिया है कि इनमें,
वस्तुतः इनके फल में, कोई स्पष्ट तारतम्य प्रतीत नहीं होता ।
अब करुण रस का उदाहरण लीजिए :—
१३६ रसगङ्गाधरः
अत्र प्रमीततनय आलम्बनम् । तत्कालावच्छिन्नबान्धवदर्शनाद्युद्दी-
पनम् । रोदनमनुभावः । दैन्यादयः संचारिणः ।
शान्तो यथा--
मलयानिलकालकूटयो रमणीकुन्तलभोगिभोगयोः ।
श्वपचात्मभुवोर्निरन्तरा मम जाता परमात्मनि स्थितिः ॥
अत्र प्रपञ्चः सर्वोऽप्यालम्वनम् । सर्वत्र साम्यमनुभावः । मत्यादयः
संचारिणः । यद्यपि प्रथमार्धे उत्तमाधमयोरुपक्रमाद् द्वितीयार्धेऽधमोत्तम-
वचनं क्रमभङ्गमावहति, तथापि वक्तुर्ब्रह्मात्मकतयोत्तमाधमज्ञानवैकल्यं
आश्चर्यं द्योत्यते । प्रमीतो मृतः ।
मलयानिलत्यादि । निरन्तरा = तारतम्यरहिता । 'मानापमानयोस्तुल्यः'
इत्यादि वचनं चात्र प्रमाणम् । उत्तमा...वैकल्यमिति । एतच्च परमात्मप्रतिष्ठस्य
सर्वत्र तुच्छत्वबुद्धिरित्यतो लभ्यते ।
"हा विनयशील पुत्र ! अपने सभी परिजनों की अपार चिन्ता को छोड़कर
और गुरुकुल के अगाध प्रेम की उपेक्षा कर तूने क्योंकर परलोक का पथ अपना
लिया !"
यहाँ मृत पुत्र आलम्बन विभाव है । मृत्युकाल में उपस्थित प्रियजनों के दर्शन
आदि उद्दीपन विभाव हैं । रोदन अनुभाव है और दैन्य आदि व्यभिचारिभाव हैं ।
अतः इनसे अभिव्यज्यमान पित्रादिनिष्ठ शोकस्वरूप स्थायिभाव करुणरस
के रूप में अभिव्यक्त होता है ।
अब शान्तरस का उदाहरण प्रस्तुत है :—
"मेरी तो परमात्मा में प्रतिष्ठा हो चुकी है, अर्थात् मैं परमात्मस्वरूप हो चुका
हूँ, जिससे (प्रतिष्ठा से) मलयानिल और विष के, रमणी के आकर्षक केश-कलाप
और सर्प की फणां के एवम् चाण्डाल और सर्वज्ञ ब्रह्मा के बीच कोई अन्तर नहीं
रह गया ॥"
इसमें तुच्छ रूप में परिज्ञात समस्त प्रपञ्च आलम्बन विभाव है । सभी
उच्च नीच सांसारिक पदार्थों में समत्वबुद्धि अनुभाव है और मति, धृति आदि
व्यभिचारिभाव हैं । इन सब से शान्तरस अभिव्यक्त है । यद्यपि इस पद्य के
पूर्वार्द्ध में पहले प्रकृष्ट-पदार्थों-मलयपवन और कामिनी-केशकलाप का और बाद
में अपकृष्ट-विष और सर्प की फणा का निर्देश और उत्तरार्ध में पहले अपकृष्ट
चाण्डाल का और बाद में उत्कृष्ट ब्रह्मा का निर्देश होने से क्रमभङ्ग अवश्य दिखाई
देता तथापि प्रकृत में यह दोष न होकर गुण ही है, क्योंकि इससे वक्ता का यह
प्रथमाननम् १३७
संपन्नमिति द्योतनाय क्रमभङ्गो गुण एव ।
इदं पुनर्नोदाहार्यम्—
सुरस्रोतस्विन्याः पुलिनमधितिष्ठन्नयनयो-
र्विधायान्तर्मुद्रामथ सपदि विद्राव्य विषयान् ।
विधूतान्तर्ध्वान्तो मधुरमधुरायां चिति कदा
निमग्नः स्यां कस्यांचन नवनभस्याम्बुदरुचि ॥
अत्रापि यद्यपि विषयगणालम्बनः सुरस्रोतस्विनीतीराद्युद्दीपितो नयन-
निमीलनादिभिरनुभावितः स्थायी निर्वेदः प्रतीयते, तथापि भगवद्वासु-
देवालम्बनायां कविरतौ गुणीभूत इति न शान्तरसध्वनिव्यपदेशहेतुः ।
इदं च पद्यं मन्निर्मितायां भगवद्भक्तिप्रधानायां करुणालहर्य्यामुपनिबद्धमिति
प्रत्युदाहरणमाह — इदमित्यादिना ।
सुरस्रोतस्विन्या इत्यादि । विधूतमन्तर्ध्वान्तमज्ञानं यस्य तादृशोऽहं गङ्गातटे
१३८ रसगङ्गाधरः
तत्प्रधानभावप्राधान्यमेवार्हति । शान्तरसाननुगुणश्चायमोजस्वी गुम्फ इति
चानुदाहार्यमेवैतत् । पूर्वपद्ये तु ‘परमात्मनि स्थितिः’ इत्यनेन तत्ताद्रूप्या-
वगमाद्रतेरप्रतिपत्तिः ।
रौद्रो यथा-
नवोच्छलितयौवनस्फुरदखर्वगर्वज्वरे
मदीयगुरुकार्मुकं गलितसाध्वसं वृश्चति ।
तत्प्रधानेत्यादि । तस्यां करुणालहर्यां यः प्रधानो भावो भगवद्विषयककविरति-
स्वरूपः तस्यैव प्राधान्यमत्रापि पद्ये तदन्तर्गते युक्तमित्यर्थः । अत्रैव कारणान्तरमाह-
शान्तेत्यादिना । ओजस्वी ⇒ संयोगपूर्ववर्तित्वह्रस्वप्राचुर्यरूपः सुरस्रोतस्विन्याः,
तिष्ठन्नयनयोः ...न्तमुद्राम्, विद्राव्य, ...न्तध्वान्तिः, निमग्नः, कस्यां, नमस्या
...इत्यादौ । उदाहरणप्रत्युदाहरणयोर्व्यतिरेकमाह - पूर्वपद्य इत्यादिना । मलयानिलै-
त्यादिपद्य इत्यर्थः । रतेरप्रतिपत्तिरिति । अयमाशयः-रतिर्हि द्वैतापेक्षा नाभेदबुद्धौ
सत्यां सन्तिष्ठते । ततः पूर्वं तु सत्यामभेदापेक्षायां सा नितरामुपयुज्यते, अद्वैतभाव-
नार्थमपेक्ष्यमाणे परमेश्वरानुग्रहे तस्या अङ्गत्वात् । ईश्वरानुग्रहस्तु तत्र समपेक्ष्यत
एव । यथाह खण्डनकृत्-
ईश्वरानुग्रहादेषा पुंसामद्वैतभावना ।
महाभयकृतत्राणा द्वित्राणां यदि जायते ॥ इति ।
अतश्च यावदद्वैतभावना न पर्यवसिता तावदेव रतिरिति प्रत्युदाहरणे तस्या
अपर्यवसितत्वेन तत्र रतेः सत्त्वं प्रतीतिश्च न विरुध्यते । उदाहरणे पुनरद्वैतभाव-
नायाः पर्यवसितत्वेन द्वैतापेक्षाया रतेरसम्भवान्न तदानीं तत्प्रतिपत्तिरिति ।
उक्त निर्वेद तो उसका गुणीभूत है । यह तो स्पष्ट किया जा चुका है कि
प्रधानीभूत स्थायिभाव हीं रसध्वनि कहला सकता, गुणीभूत स्थायिभाव
नहीं । अतः यह पद्य भगवद्भक्ति को प्रधानरूप में अभिव्यक्त करनेवाली
मेरी रचना 'करुणालहरी' का है अतः प्रसङ्गानुसार भक्तिस्वरूप भाव का हीं
प्राधान्य इसमें मानना उचित है । साथ हीं, इस पद्य में जो ओजस्वी वर्ण-
संघटना है वह भी शान्तरस के अनुकूल नहीं है । इसलिए भी इसे शान्तरसध्वनि
का उदाहरण नहीं मानना चाहिए । इस पद्य के विपरीत पूर्वोदाहृत 'मलयानिल०'
आदि पद्य में 'मेरी तो परमात्मा में प्रतिष्ठा हो चुकी है' इस कथन से स्पष्ट है कि
चिन्तक परमात्मा से अभिन्न हो चुका है। ऐसी स्थिति में उसमें परमात्मविषयक
रति है-ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि रति (भक्ति) तो भक्त, भजनीय आदि
की अपेक्षा रखने के कारण भेदाधीन है, अभेद में वह हो नहीं सकती ॥
प्रथमाननम् १३९
अयं पततु निर्दयं दलितदृप्तभूभृद्गल-
स्खलद्रुधिरघस्मरो मम परश्वधो भैरवः ॥
अत्र तदानीं रामत्वेनाऽज्ञातो गुरुकार्मुकभञ्जक आलम्बनम् । अत एव
विशेष्यानुपादानम्, गुरुद्रुहो नामग्रहणानौचित्यात्, क्रोधाविष्काराद्वा ।
ध्वनिविशेषानुमितो निःशङ्कधनुर्भङ्ग उद्दीपकः । परुषोक्तिरनुभावः । गर्वो-
ग्रत्वादयः संचारिणः । एषा च धनुर्भङ्गध्वनिभग्नसमाधेर्भार्गवस्योक्तिः ।
नवोच्छलितेत्यादि । नवोच्छलितं नवोद्भूतं यद् यौवनं तेन स्फुरन्
अखर्वोज्जलपो गर्वस्वरूपो ज्वरो यत्र, अत एव मदीयस्य गुरोर्महेश्वरस्य कार्मुकं
गलितं साध्वसं भयं यस्मिन् कर्मणि तादृशं कार्मुकसम्बन्धि व्रश्चनं छेदनं भङ्गं
कुर्वति (रामे) अयं दृप्तानां भूभृतां दलितैर्गलैः स्खलतो रुधिरस्य घस्मरः पानकर्ता
भैरवो मम परश्वधः परशुः निर्दयं यथा स्यात्तथा पतत्विति पद्यार्थः ।
अत्र रौद्ररसध्वनिमुपपादयति—अत्रेत्यादिना । तदानीम् = धनुर्भङ्गभूमौ क्रुद्ध-
परशुरामोपस्थितिकाले । रामत्वेन = दशरथज्येष्ठपुत्रत्वेन, यौगिकर्तृ कर्मणाधि-
करणत्वेन वा अज्ञात इत्यर्थः । आलम्बनं क्रोधस्य परशुरामनिष्ठस्य । अत एव=
अज्ञातत्वादपीत्यर्थः । विशेष्यस्य = रामस्य । विशिष्यानुपादानमिति पाठस्तु युक्ततरः
प्रतीयते । रामस्यानुपादाने कारणान्तरमाह—गुरुद्रुह इत्यादिना । अनौचित्यं चात्र
रामस्य पातक्तित्वेन बोध्यम् । क्रोधातिरेकेऽपि शत्रुनामग्रहणं प्रायेण न दृश्यत इति
लोकस्वभावोऽपि नामाग्रहणे हेत्वन्तरमित्याह । ध्वनिविशेषोऽत्र रामदोर्बलदलत्
कोदण्डकोलाहल एव । एतादृशस्य ध्वनिविशेषस्य धनुर्भङ्गव्यापकत्वादुक्तमनुमित इति ।
निःशङ्कभञ्जनं च गलितसाध्वसं वृश्चतीत्यनेनात्र पद्य उक्तमेव । रौद्रव्यञ्जने सह-
अब रौद्ररस का उदाहरण देखिए :—
“नवीन यौवन से उत्पन्न असीम अहङ्कारस्वरूपी ज्वर से उद्दीप्त इस क्षत्रिय पर,
जिसने मेरे आराघनीय गुरुदेव—भगवान् पिनाकपाणि ‘शिव’ के धनुष को निर्भीक-
भाव से तोड़ डाला है, मेरा यह भयङ्कर फरशा, जो उद्दान्त क्षत्रियों के कटे गलों से
बहते हुए रक्त को पीने में प्रवीण है, निर्दय होकर प्रहार करे ॥”
इस पद्यार्थ में परशुराम द्वारा क्रोध की अभिव्यक्ति के समय ‘यह राम हैं’
इस प्रकार विशेषरूप में अज्ञात किन्तु ‘इसी ने हमारे गुरु का धनुष तोड़ा है’ इस
प्रकार सामान्य रूप में ज्ञात व्यक्ति आलम्बन है । इसी उद्देश्य से पद्य में
‘राम’ इस विशेष्य का निर्देश नहीं किया गया है । साथ हीं, गुरु के शत्रु का नाम
लेना भी अनुचित है, अथवा क्रोध-काल में विशेष रूप में क्रोध-विषयीभूत व्यक्ति
का नाम लेना स्वाभाविक नहीं होता । इस लिए भी राम का नाम न लिया
१४० रसगङ्गाधरः
वृत्तिरप्यत्र महोद्धता रौद्रस्य परर्मौजस्वितां परिपुष्णाति । अन्यत्र गुरु-
स्मरणे सत्यहंभावविगमस्यावश्यकतया प्रकृते चाजहत्स्वार्थलक्षणामूल-
ध्वननेन मदीयेत्यनेन गर्वोत्कर्षस्यैव प्रकाशनात्स्फुटं गम्यमानेन विवेक-
शून्यत्वेन क्रोधस्याधिक्यं गम्यते ।
कारिभूतमोजोगुणं तदनुकूलं गुम्फं च वक्ष्यमाणमत्र उपपादयति — वृत्तिरित्यादिना ।
रौद्रस्य = क्रोधस्य । परर्मौजस्विताम् = रसावस्थावाप्तिपर्यन्तमुत्कर्षम् । अन्यत्र =
क्रोधाभावकाले । मदीयेत्यत्रास्मत्पदस्याजहत्स्वार्थलक्षणया स्वार्थसहितः त्रिःसप्तकृत्वः
क्षत्रियाणां निहन्ता पित्रादेशान्मातृवधकर्तेत्यादिर्वाऽर्थः । एतेन च क्षत्रियनिहन्तृ-
त्वादिनैकेन रूपेण अस्मच्छब्दार्थप्रतीतिः । अयमाशयः—अन्यस्य कस्यचिद्
गुरुशब्दार्थस्य क्रोधोद्दीपकत्वाभावात् प्रकरणविरोधाच्च ज्ञानदातैवार्थः सिद्धः ।
एतादृशस्य गुरोः शिष्यसापेक्षत्वान्मदीयपदप्रयोगं विनापि प्रक्रान्तजामदग्न्य-
सम्बन्धप्रतीतेर्वाच्यमात्रार्थकस्य अस्मच्छब्दस्य प्रकृते नोपयोगः । इममेवानुपयोगलक्षणं
मुख्यार्थबाधमादाय प्रकृते लक्षणया क्षत्रियनिहन्तृत्वधर्मविशिष्टस्य धर्मिणः प्रतीतिः ।
व्यञ्जनया चेतराणां मातृहन्तृत्वादीनां बहूनां धर्माणां बोधः । अस्मच्छब्द-
वाच्यमात्रस्य प्रतीतेरनुपयोगेऽपि विरोधिborderत्वाभावादहजहत्स्वार्थैव लक्षणा । तथा च
प्रकृतेऽर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिरिति । लक्षणयैव सर्वेषां धर्माणां प्रतीतिस्तु न
मन्तव्या, एकस्यैवोपयोगिनो धर्मस्य लक्ष्यत्वेनैव मुख्यार्थबाधस्यानुपयोगित्वलक्षणस्य
निराकरणादन्यत्र धर्मेषु लक्षणाया अप्रसरादिति । एतादृशेन च लक्ष्यार्थेन
जाना उचित ही है । टूटने की कड़कड़ाहट के श्रवण से अनुमित 'निर्भीक होकर
धनुष का तोडना' उद्दीपन विभाव है । कठोर वचन बोलना अनुभाव है । अभि-
व्यज्यमान अहङ्कार, उग्रता आदि व्यभिचारिभाव हैं । यह पद्यात्मक वचन
धनुर्भङ्ग की ध्वनि सुनने से टूटी हुई समाधि वाले परशुराम द्वारा कहा गया है ।
यहाँ उपलब्ध अत्यन्त उद्धत 'वृत्ति' रौद्र रस ( क्रोध ) की अत्यन्त उत्कटता का
परिपोषक है । वस्तुतः जब क्रोध नहीं होता तो व्यक्ति में अहङ्कार का उदय नहीं
होता । इस पद्य में, इसके विपरीत, 'मदीय' शब्द से अत्यधिक गर्व ( अहङ्कार )
की प्रतीति होती । तात्पर्य यह है कि गुरु शब्द के नित्यसापेक्ष होने से और प्रसङ्ग-
वश भी 'मेरे गुरु' ऐसा अर्थ 'मदीय' इस विशेषण के बिना भी स्पष्ट है । अतः
स्वार्थमात्र के प्रतिपादन के लिए इस पद्य में 'मदीय' विशेषण का कोई उपयोग नहीं
है । यही अनुपयोगिता यहाँ 'मदीय' शब्द के मुख्यार्थ की बाधा है । अतः इस शब्द
को लाक्षणिक मानना तो आवश्यक है ही जिससे 'मदीय' शब्द की अनुपयोगिता का
निराकरण हो सके । इस लिए 'इक्कीस बार समस्त क्षत्रियों का संहार करना' अथवा
इदं तु नोदाहार्यम्—
धनुर्विदलनध्वनिश्रवणतत्क्षणविर्भव-
न्महागुरुवधस्मृतिः श्वसनवेगधूताधरः ।
विलोचनविनिःसरद्बहलविस्फुलिङ्गव्रजो
रघुप्रवरमाक्षिपञ्जयति जामदग्न्यो मुनिः ॥
अत्राप्यपराधास्पदेन रघुनन्दनेनालम्बितो धनुर्विदलनध्वनिश्रवणेनो-
गर्वात्कर्षस्य, तेन च विवेकशून्यत्वस्य, तेन च क्रोधाधिक्यस्य ध्वननमिति सन्दर्भार्थः ।
क्रोधस्याधिक्यं चात्र रसपर्यन्त उत्कर्ष एव ।
अधुना प्रत्युदाहरणमुखेन क्रोधस्य व्यङ्ग्यस्य गुणीभूतत्वमुपपादयति—
धनुर्विदलनैत्यादिपद्येन । धनुर्विदलनेन जायमानस्य ध्वनेः श्रवणात् तत्क्षणे
श्रवणक्षणे तदव्यवहितोत्तरक्षण एव वाविर्भवन्ती महागुरोः पितुर्जमदग्नेर्वधस्य
सहस्रबाहुसूनुकृतस्य स्मृतिर्यस्य, पितृवधोद्भूतक्रोधोत्थस्य श्वसनस्य निःश्वासस्य
वेगेन धूतः कम्पितोऽधरोष्ठो यस्य, क्रोधारुणाभ्यां विलोचनाभ्यां विनिस्सरन् बहलो
विपुलः स्फुलिङ्गव्रजोऽग्निकणसमूहो यस्य, अथ च रघुप्रवरं धनुर्भञ्जकं रामचन्द्रम्
आक्षिपन् जामदग्न्यः परशुरामो मुनिर्जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तत इति पदार्थः । अत्र
तृतीयचरणं 'क्रोधाद् रक्तनेत्राभ्यां विनिस्सरतां बहलानां विस्फुलिङ्गानां व्रजं यस्य
सः' इति रसचन्द्रिकोक्तो समासश्चिन्त्यः, व्रजशब्दस्य समूहाथर्कस्य नपुंसकत्वमपि
तथैव । अत्र वचनस्यान्यवक्तृकतया रघुप्रवरेति विशेष्योपादानेऽपि न पूर्वपद्यवद्
दोषः ।
अत्रालम्बनविभावादिब्यङ्ग्योऽपि क्रोधो जयतिपदप्रतिपादितायां परशुरामविष-
यिण्यां कविरतौ गुणीभूत इति न ध्वनिकाष्ठामधिरोहतीत्युपपादयति—अत्रेत्यादिना ।
अन्य एक प्रकृतोपयोगी धर्मविशेष से विशिष्ट मेरे गुरु के कार्मुक•••••••••इस प्रकार
का लक्ष्यार्थ 'मदीय' शब्द का स्वीकार करना पड़ता है । अतः यह अजहत्स्वार्था
लक्षणा है । इससे वक्ता परशुराम की विवेकशून्यता का और इस विवेकशून्यता से
अत्यधिक क्रोध का अभिव्यञ्जन होता । इस प्रकार यह भी स्पष्ट है कि यहाँ
अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि है ॥
निम्नलिखित पद्य तो रौद्ररसध्वनि का उदाहरण नहीं हो सकता है:—
"एक क्षत्रिय द्वारा किये गये शिवधनुर्भङ्ग के कोलाहल को सुनने से तत्काल
जिन्हें सहस्रबाहुपुत्र द्वारा किये गये अपने पिता जमदग्नि के वध का स्मरण हो आया
है, जिनका अधर अपने क्रोधजनित निःश्वास से फड़क रहा है, जिनकी आँखों से
क्रोधाग्नि की चिनगारियां निकल रही हैं और जो रामचन्द्र पर अपना आक्रोश
प्रकट कर रहे हैं उन मुनि परशुराम की जय हो ।"
१४२ रसगङ्गाधरः
द्दीपितो निश्वासनेत्रवलनादिभिरनुभावितो महागुरुवधस्मृतिगर्वोग्रत्वा-
दिभिश्च संचारितः क्रोधो यद्यपि व्यज्यते, तथाप्यसौ तत्प्रभाववर्णनबीज-
भूतायां कविरतौ गुणीभूत इति न रौद्ररसध्वनिव्यपदेशहेतुः । काव्यप्रकाश-
गतरौद्ररसोदाहरणे तु 'कृतमनुमतं दृष्टं वा यैरिदं गुरुपातकम्' इति पद्ये
रौद्ररसव्यञ्जनक्षमा नास्ति वृत्तिः, अतस्तत्कवेरशक्तिरेव ।
महागुर्वित्यादि । महागुरुवधस्मृतेर्वाच्यतया व्यभिचारित्वकथनं चिन्त्यम् ।
तत्प्रभावेत्यादि । तस्य परशुरामस्य प्रभावस्तद्वर्णनं बीजभूतं यस्यां रतावित्यर्थः ।
यद्वा तत्प्रभाववर्णनस्य बीजभूतायां रतावित्यर्थः ।
कृतमनुमतमित्यादि । भट्टनारायणकृते वेणीसंहारे तृतीयेऽङ्के पितृवधेनाति-
क्रुद्धस्याश्वत्थाम्न इयमुक्तिः । रौद्ररसव्यञ्जनक्षमा वृत्तिः 'परुषा' 'गौडी' इत्यादि-
नामभिः प्रसिद्धा । कवेः = भट्टनारायणस्य । अशक्तिरेवेति । आनन्दवर्धनाभिनव-
गुप्तपादादिभिस्तु 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति' इत्यादिवेणीसंहारपद्य एव सत्यप्येतादृश-
वृत्त्यभावे प्रसादेन रौद्ररसाभिव्यञ्जनं स्वीकृतमेव । स्वयमपि वक्ष्यत्येवमेवेति प्रौढि-
रेवेयं पण्डितराजस्य । रौद्रस्य युद्धवीराद् भेदकं तु रक्तास्यनेत्रत्वमुक्तं दर्पणकारेण ।
इस पद्य में भी अपराधी रामचन्द्र परशुराम के क्रोध के आलम्बन हैं। धनुर्भङ्ग
के कोलाहल का सुनना उद्दीपनविभाव है। क्रोधजनित निःश्वास और आँखों से
क्रोधाग्नि की चिनगारियों का निकलना आदि अनुभाव हैं। अपने पिता के वध
का स्मरण¹, अहङ्कार एवम् उग्रता आदि व्यभिचारिभाव हैं। अतः क्रोध का
अभिव्यञ्जन तो होता ही है। किन्तु यह क्रोध परशुराम के प्रभाव के वर्णन के
मूलभूत कवि-(वक्तृ-)निष्ठ रति (निरतिशयप्रेम = भक्ति) का अङ्ग है, क्योंकि
'जयति' इस सर्वोत्कर्षबोधक क्रिया पद से यह रति स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।
अतः इसे रौद्ररसध्वनि का उदाहरण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अन्याङ्गभूत रस
ध्वनिपदव्यपदेश्य नहीं होता। काव्यप्रकाश में जो :-
'कृतमनुमतं दृष्टं वा यैरिदं गुरुपातकम्' इत्यादि वेणीसंहार का पद्य रौद्ररस-
ध्वनि का उदाहरण दिया गया है उसमें रौद्ररस के अभिव्यञ्जन के लिए अपेक्षित
महोद्धता वृत्ति (= परुषा = कठोराक्षरघटिता वर्णसंघटना) नहीं है। कवि चाहता
तो है इस पद्य द्वारा उत्कट कोटि के क्रोध को व्यक्त करना, किन्तु अनुकूल वृत्ति से
१. इस 'स्मरण' के वाच्य होने से इसे व्यभिचारिभाव कहना उचित नहीं है,
क्योंकि व्यभिचारिभाव व्यङ्ग्य होता, वाच्य नहीं, हां यदि महागुरु शब्द
का अर्थ माता हो जिनका वध परशुराम ने पिता की आज्ञा से किया था
तो कथञ्चित् इसे व्यभिचारिभाव कहा जा सकता है।
प्रथमाननम् १४३
वीरश्चतुर्धा—दानदयायुद्धधर्मैस्तदुपाधेरुत्साहस्य चतुर्विधत्वात् । तत्राद्यो
यथा—
कियदिदमधिकं मे यद्द्विजायार्थयित्रे
कवचमरमणीयं कुण्डले चार्पयामि ।
अकरुणमवकृत्य द्राक्कृपाणेन निर्यद्-
बहुलरुधिरधारं मौलिमावेदयामि ॥
एषा द्विजवेषायेन्द्राय कवचकुण्डलदानोद्यतस्य कर्णस्य तद्दानविस्मितान्
सभ्यान्प्रत्युक्तिः । अत्र याचमान आलम्बनम् । तदुदीरिता स्तुतिरुद्दी-
तत्र रक्ताम्यनेत्रेनेत्यनेनोत्साहात् क्रोधाविर्भावो बोधितः, युद्धवीरे पुनरुत्साहमात्रमिति
भेदोऽनयोस्तात्पर्यविषयीभूतः ।
तदुपाधेरिति । स्थायिभावो रस इति पक्षे ते दानादय उपाधयो यस्येति
विग्रहः । स्थायिभावावच्छिन्ना चिदेव रस इति पक्षे तु स्थायिभावानां रसोपाधित्व-
मिति तस्य प्रकृतस्य वीररसस्योपाधिरिति विग्रहः ।
आद्यः=दानवीरः । कियदि त्यादि । अर्थयित्रे याचकाय द्विजाय विप्ररूपधारिणे
( इन्द्राय ) यदहमरमणीयं क्षुद्रत्वादुपेक्षणीयमात्मनः कवचं कुण्डलद्वयं चार्पयामि तत्
कियदधिकम् ? अपि तु स्वल्पमेव । अधिकं तु तदा भवेद् यदि द्राग् झटिति कृपाणेन
स्वकीयं शिरोऽकरुणमवकृत्य छित्त्वा निर्यन्ती निस्सरन्ती बहुला रुधिरस्य धारा
यस्मात् तच्छिरः तस्मै द्विजाय आवेदयामि । अर्पयामीत्यत्र 'कॢप्ते लिप्सायामिति
लट्, आवेदयामीत्यत्र च वर्त्तमानसामीप्ये स इति बोध्यम् । निर्यद्वहलेत्यादौ
सप्तम्यन्तान्यपदार्थको बहुव्रीहिसमासो रसचन्द्रिकायामुक्तश्चिन्त्यः ।
युक्त पद्य की रचना नहीं कर सका । अतः यह कवि की अशक्ति तो हैं हीं,
साथ साथ इसे रौद्र का उदाहरण देने वाले काव्यप्रकाशकार की भी अशक्ति है ॥
वीररस के चार भेद हैं, क्यों कि दान, दया, युद्ध और धर्म—ये चार इसकी
उपाधियाँ है—ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है ।
इनमें दानवीर का उदाहरण है :—
"एक तो कोई याचना कर रहा हो, वह भी एक ब्राह्मण हो, तो उसे अपना तुच्छ
कवच और ये दोनों कुण्डल दान कर देना मेरे लिए कौन-सी बड़ी बात है ! यथार्थ
दान तो तब होगा यदि मैं निर्दयभाव से अपने खड्ग से झट से काट कर खून की
धारा से लथपथ अपना शिर उसे समर्पित कर दूँ ।"
ब्राह्मण का वेष धारण कर इन्द्र जब कर्ण के पास आये तो कर्ण ने उन्हें अपने
कवच और कुण्डल दे दिये। उस समय कर्ण की दानवीरता को देखकर वहाँ उपस्थित
लोग बहुत हीं विस्मित होकर कर्ण की प्रशंसा करने लगे । उन्हीं के प्रति कर्ण की
१४४ रसगङ्गाधरः
पिका । कवचादिवितरणं तत्र लघुत्वबुद्ध्यादिकं चानुभावः । मे इत्यर्था-
न्तरसङ्क्रमितवाच्यध्वन्युत्थापितो गर्वः स्वकीयलोकोत्तरपितृजन्यत्वादि-
स्मृतिश्च संचारिणौ । वृत्तिरप्यत्र तत्तदर्थानुरूपोद्गमविरामशालितया सहृद-
यैकचमत्कारिणी । तथा हि—उत्साहपोषकं कवचकुण्डलार्पणयोर्लघुत्व-
अर्थान्तरसंक्रमितेत्यादि । अयम्भावः—अर्पयामीत्यादिक्रियापद उत्तमपुरुष-
सामर्थ्यात् प्रकान्तरत्वाच्चास्मदर्थस्य प्रतीत्या तदभिधानाय 'मे' इतिपदस्य नात्रोपयोग
इति वाच्यार्थमात्रविवक्षायामनुपयोगितालक्षणवाच्यार्थबाधादत्रास्मत्पदं लाक्षणिकं
सत् सकलकोषदातृत्वविशिष्टमस्मत्पदार्थं बोधयति । अविरोधित्वाच्चात्रास्मच्छन्द-
वाच्यार्थस्य लक्ष्यार्थे समावेशोऽपि नायुक्त इत्युपादानलक्षणैवात्र । तत एक
लक्षिताद्धर्मविशिष्टधर्मिणोऽनुपयोगितालक्षणवाच्यार्थबाधस्य निराकरणादर्थान्तरे
गर्वादौ क्षीणसामर्थ्योपादानलक्षणा न तद्धर्मान्तरं प्रतिपादयितुमलमिति व्यञ्जनैवा-
संख्येयार्थद्योतिका तत्प्रतिपादिकाऽगत्या स्वीकर्त्तव्येति भवति गर्वादीनामर्थान्तर-
संक्रमितध्वनिसमुत्थापितत्वमिति । स्वकीयेति । एतच्चास्मदर्थापेक्षया, सहृदयापेक्षया
तु तदीयेति मन्तव्यम् । स्मृतिः सहृदयानामिति शेषः । एषा च स्मृतिः शक्यसम्बद्ध-
त्वादुक्तार्थैकसम्बन्धिज्ञानविधया जायते । ये तु लोकोत्तरपितृजन्यत्वं शक्यता-
वच्छेदकं मन्यन्ते तेषां शक्यार्थस्य प्रकृतानुपयोगित्वलक्षणो बाधो लक्षणाप्रयोजकः
कथमुपपद्यत इति चिन्त्यम् । अतस्तद्व्यक्तित्वमेवात्र शक्यतावच्छेदकमस्मदर्थ इति
यह उचित है । यहाँ याचना करने वाले ब्राह्मण आलम्बन हैं । उन्हीं ब्राह्मण
द्वारा की गयी कर्ण की स्तुति ( जो इस पद्य में निर्दिष्ट नहीं है ) उद्दीपन
विभाव है । कवच और कुण्डलों का दान और उन कवचादि में तुच्छता-बुद्धि
आदि अनुभाव हैं । पद्यस्थ 'मे' पद में अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि से प्रतीयमान
गर्व ( अहङ्कार ) और लोकोत्तर पिता भगवान् सूर्य से उत्पन्न होने की स्मृति
व्यभिचारिभाव हैं । तात्पर्य यह है कि प्रकृत पद्य में 'अर्पयामि' और 'आवेदयामि'
इन उत्तमपुरुषों की क्रियाओं और प्रसङ्ग से हीं 'मे' पद के बिना भी अस्मच्छब्दार्थ
का बोध हो जाने से वाच्यार्थमात्र का प्रतिपादन करने के लिए 'मे' पद का कोई
उपयोग नहीं है । यही अनुपयोगिता यहाँ अस्मच्छब्द के मुख्यार्थ का बाध--
लक्षणाबीज है । यतः 'समस्त राज्य को समर्पित कर देने वाले मेरे लिए' यह अर्थ 'मे'
पद का प्रकृतानुपयोगी नहीं है अतः यहाँ अस्मच्छब्द में जहत्स्वार्था लक्षणा न मानकर
अजहत्स्वार्था लक्षणा हीं उचित है । एवञ्च 'समस्त ···· मेरे लिए' इस अर्था-
न्तर में संक्रमित हो गया है वाच्यार्थ जिसका उस अस्मच्छब्द में वर्त्तमान व्यञ्जना
(ध्वनि)-अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनि से प्रतीयमान कर्णनिष्ठ गर्व और भगवान् सूर्य
का पुत्र होना--व्यभिचारिभाव कहे गये हैं । प्रतिपाद्य अर्थों के अनुरूप प्रारब्ध
प्रथमाननम् १४५
निरूपणं विधातुं पूर्वार्धे तदनुकूलशिथिलबन्धात्मिका । उत्तरार्धे तु
मौलितः प्राग्वक्तृगतगर्वोत्साहपरिपोषणायोद्धता । ततः परं ब्राह्मणे सवि-
नयत्वं प्रकाशयितुं तन्मूलीभूतं गर्वरहित्यं ध्वनयितुं पुनः शिथिलैव । अत
एवावेदयामीत्युक्तम्, न तु ददामि वितरामीति वा ।
इदं तु नोदाहरणीयम्—
यस्योद्दामदिवानिशार्थिविलसद्दानप्रवाहप्रथा-
माकर्ण्यावनिमण्डलागतवियद्वन्दीन्द्रवृन्दाननात् ।
ईर्ष्यानिर्भरफुल्लररोमनिकरव्यावल्गदूधःस्रवत्-
पीयूषप्रकरैः सुरेन्द्रसुरभिः प्रावृट्पयोदायते ॥
विभावनीयं विज्ञैः । न तु ददामीत्यादि । ददामीत्यादौ शब्दशक्तिस्वाभाव्याद-
हङ्कारः कर्तुः प्रतीयते, आवेदयामीत्यत्र तु न तथेति भावः ।
प्रत्युदाहरणमाह—इदं त्वित्यादिना ।
यस्योद्दामेत्यादि । दानशोण्डस्य कस्यचिन्नृपस्य स्तुतिरियम् । यस्य
नृपस्य अर्थिषु याचकेषु दिवानिशं विलसत उद्दाम्नोऽप्रतिहतस्य दानप्रवाहस्य
प्रथां प्रसिद्धिम् अवनिमण्डलाद् भूमण्डलादागतानां वियद्वन्दीन्द्राणामुत्तमस्वर्गिय-
स्तुतिपाठकानां चारणानामाननादाकर्ण्य सुरेन्द्रसुरभिरिन्द्रस्वामिका कामधेनुः ईर्ष्या
और परिसमाप्त भिन्न-भिन्न वृत्तियां भी सहृदयों को अत्यन्त आकृष्ट करने वाली
हैं। जैसे—पद्य के पूर्वार्द्ध में कवच और कुण्डलों की तुच्छता का प्रतिपादन,
जिससे कर्ण का दानोत्साह परिपुष्ट होता है, करने के लिए (तुच्छता-प्रतिपादन के)
अनुकूल शिथिला वृत्ति (कोमलपद योजना) है; उत्तरार्द्ध में 'मौलिम्' पद के पहले
(अकरुणम्····················घारम् ) वक्ता कर्ण के गर्व और दानोत्साह का उत्कृष्ट
अभिव्यञ्जन कराने हेतु उद्धता वृत्ति है। तत्पश्चात् 'मौलिमावेदयामि' इस अन्त्य
भाग में याचक ब्राह्मण के प्रति अपनी विनम्रता के प्रकाशन के मूलभूत गर्वशून्यता
की व्यञ्जना के लिए तदनुकूल शिथिला वृत्ति ही है। यही कारण है कि
'ददामि' अथवा 'वितरामि' इत्यादि गर्वप्रकाशक क्रियापद का नहीं अपि तु
'आवेदयामि' इस गर्वशून्यता-सूचक अथवा नम्रता-सूचक क्रियापद का ही प्रयोग
किया गया है ॥
निम्ननिर्दिष्ट पद्य को तो दानवीरध्वनि का उदाहरण नहीं देना चाहिए—
“ये महाराज इतने उदार हैं कि इनके द्वारा दिन-रात याचकों को दिये ज ने
वाले अधिकाधिक दानप्रवाह को भूमण्डल से लौटकर आये स्वर्गीय श्रेष्ठ बन्दियों
के मुख से सुनकर स्वर्गस्थ कामधेनु को भी इनसे ईर्ष्या हो गई है जिससे इसका
सारा शरीर रोमाञ्चित हो उठा है। इसी रोमाञ्च के कारण इसके दुग्धपूर्ण स्तनों