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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 175

प्रथमाननम् १४३
वीरश्चतुर्धा—दानदयायुद्धधर्मैस्तदुपाधेरुत्साहस्य चतुर्विधत्वात् । तत्राद्यो
यथा—
कियदिदमधिकं मे यद्द्विजायार्थयित्रे
कवचमरमणीयं कुण्डले चार्पयामि ।
अकरुणमवकृत्य द्राक्कृपाणेन निर्यद्-
बहुलरुधिरधारं मौलिमावेदयामि ॥
एषा द्विजवेषायेन्द्राय कवचकुण्डलदानोद्यतस्य कर्णस्य तद्दानविस्मितान्
सभ्यान्प्रत्युक्तिः । अत्र याचमान आलम्बनम् । तदुदीरिता स्तुतिरुद्दी-
तत्र रक्ताम्यनेत्रेनेत्यनेनोत्साहात् क्रोधाविर्भावो बोधितः, युद्धवीरे पुनरुत्साहमात्रमिति
भेदोऽनयोस्तात्पर्यविषयीभूतः ।
तदुपाधेरिति । स्थायिभावो रस इति पक्षे ते दानादय उपाधयो यस्येति
विग्रहः । स्थायिभावावच्छिन्ना चिदेव रस इति पक्षे तु स्थायिभावानां रसोपाधित्व-
मिति तस्य प्रकृतस्य वीररसस्योपाधिरिति विग्रहः ।
आद्यः=दानवीरः । कियदि त्यादि । अर्थयित्रे याचकाय द्विजाय विप्ररूपधारिणे
( इन्द्राय ) यदहमरमणीयं क्षुद्रत्वादुपेक्षणीयमात्मनः कवचं कुण्डलद्वयं चार्पयामि तत्
कियदधिकम् ? अपि तु स्वल्पमेव । अधिकं तु तदा भवेद् यदि द्राग् झटिति कृपाणेन
स्वकीयं शिरोऽकरुणमवकृत्य छित्त्वा निर्यन्ती निस्सरन्ती बहुला रुधिरस्य धारा
यस्मात् तच्छिरः तस्मै द्विजाय आवेदयामि । अर्पयामीत्यत्र 'कॢप्ते लिप्सायामिति
लट्, आवेदयामीत्यत्र च वर्त्तमानसामीप्ये स इति बोध्यम् । निर्यद्वहलेत्यादौ
सप्तम्यन्तान्यपदार्थको बहुव्रीहिसमासो रसचन्द्रिकायामुक्तश्चिन्त्यः ।
युक्त पद्य की रचना नहीं कर सका । अतः यह कवि की अशक्ति तो हैं हीं,
साथ साथ इसे रौद्र का उदाहरण देने वाले काव्यप्रकाशकार की भी अशक्ति है ॥
वीररस के चार भेद हैं, क्यों कि दान, दया, युद्ध और धर्म—ये चार इसकी
उपाधियाँ है—ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है ।
इनमें दानवीर का उदाहरण है :—
"एक तो कोई याचना कर रहा हो, वह भी एक ब्राह्मण हो, तो उसे अपना तुच्छ
कवच और ये दोनों कुण्डल दान कर देना मेरे लिए कौन-सी बड़ी बात है ! यथार्थ
दान तो तब होगा यदि मैं निर्दयभाव से अपने खड्ग से झट से काट कर खून की
धारा से लथपथ अपना शिर उसे समर्पित कर दूँ ।"
ब्राह्मण का वेष धारण कर इन्द्र जब कर्ण के पास आये तो कर्ण ने उन्हें अपने
कवच और कुण्डल दे दिये। उस समय कर्ण की दानवीरता को देखकर वहाँ उपस्थित
लोग बहुत हीं विस्मित होकर कर्ण की प्रशंसा करने लगे । उन्हीं के प्रति कर्ण की