रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ रसगङ्गाधरः
अत्र प्रमीततनय आलम्बनम् । तत्कालावच्छिन्नबान्धवदर्शनाद्युद्दी-
पनम् । रोदनमनुभावः । दैन्यादयः संचारिणः ।
शान्तो यथा--
मलयानिलकालकूटयो रमणीकुन्तलभोगिभोगयोः ।
श्वपचात्मभुवोर्निरन्तरा मम जाता परमात्मनि स्थितिः ॥
अत्र प्रपञ्चः सर्वोऽप्यालम्वनम् । सर्वत्र साम्यमनुभावः । मत्यादयः
संचारिणः । यद्यपि प्रथमार्धे उत्तमाधमयोरुपक्रमाद् द्वितीयार्धेऽधमोत्तम-
वचनं क्रमभङ्गमावहति, तथापि वक्तुर्ब्रह्मात्मकतयोत्तमाधमज्ञानवैकल्यं
आश्चर्यं द्योत्यते । प्रमीतो मृतः ।
मलयानिलत्यादि । निरन्तरा = तारतम्यरहिता । 'मानापमानयोस्तुल्यः'
इत्यादि वचनं चात्र प्रमाणम् । उत्तमा...वैकल्यमिति । एतच्च परमात्मप्रतिष्ठस्य
सर्वत्र तुच्छत्वबुद्धिरित्यतो लभ्यते ।
"हा विनयशील पुत्र ! अपने सभी परिजनों की अपार चिन्ता को छोड़कर
और गुरुकुल के अगाध प्रेम की उपेक्षा कर तूने क्योंकर परलोक का पथ अपना
लिया !"
यहाँ मृत पुत्र आलम्बन विभाव है । मृत्युकाल में उपस्थित प्रियजनों के दर्शन
आदि उद्दीपन विभाव हैं । रोदन अनुभाव है और दैन्य आदि व्यभिचारिभाव हैं ।
अतः इनसे अभिव्यज्यमान पित्रादिनिष्ठ शोकस्वरूप स्थायिभाव करुणरस
के रूप में अभिव्यक्त होता है ।
अब शान्तरस का उदाहरण प्रस्तुत है :—
"मेरी तो परमात्मा में प्रतिष्ठा हो चुकी है, अर्थात् मैं परमात्मस्वरूप हो चुका
हूँ, जिससे (प्रतिष्ठा से) मलयानिल और विष के, रमणी के आकर्षक केश-कलाप
और सर्प की फणां के एवम् चाण्डाल और सर्वज्ञ ब्रह्मा के बीच कोई अन्तर नहीं
रह गया ॥"
इसमें तुच्छ रूप में परिज्ञात समस्त प्रपञ्च आलम्बन विभाव है । सभी
उच्च नीच सांसारिक पदार्थों में समत्वबुद्धि अनुभाव है और मति, धृति आदि
व्यभिचारिभाव हैं । इन सब से शान्तरस अभिव्यक्त है । यद्यपि इस पद्य के
पूर्वार्द्ध में पहले प्रकृष्ट-पदार्थों-मलयपवन और कामिनी-केशकलाप का और बाद
में अपकृष्ट-विष और सर्प की फणा का निर्देश और उत्तरार्ध में पहले अपकृष्ट
चाण्डाल का और बाद में उत्कृष्ट ब्रह्मा का निर्देश होने से क्रमभङ्ग अवश्य दिखाई
देता तथापि प्रकृत में यह दोष न होकर गुण ही है, क्योंकि इससे वक्ता का यह