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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 414 में से

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पृष्ठ 174

१४२ रसगङ्गाधरः
द्दीपितो निश्वासनेत्रवलनादिभिरनुभावितो महागुरुवधस्मृतिगर्वोग्रत्वा-
दिभिश्च संचारितः क्रोधो यद्यपि व्यज्यते, तथाप्यसौ तत्प्रभाववर्णनबीज-
भूतायां कविरतौ गुणीभूत इति न रौद्ररसध्वनिव्यपदेशहेतुः । काव्यप्रकाश-
गतरौद्ररसोदाहरणे तु 'कृतमनुमतं दृष्टं वा यैरिदं गुरुपातकम्' इति पद्ये
रौद्ररसव्यञ्जनक्षमा नास्ति वृत्तिः, अतस्तत्कवेरशक्तिरेव ।
महागुर्वित्यादि । महागुरुवधस्मृतेर्वाच्यतया व्यभिचारित्वकथनं चिन्त्यम् ।
तत्प्रभावेत्यादि । तस्य परशुरामस्य प्रभावस्तद्वर्णनं बीजभूतं यस्यां रतावित्यर्थः ।
यद्वा तत्प्रभाववर्णनस्य बीजभूतायां रतावित्यर्थः ।
कृतमनुमतमित्यादि । भट्टनारायणकृते वेणीसंहारे तृतीयेऽङ्के पितृवधेनाति-
क्रुद्धस्याश्वत्थाम्न इयमुक्तिः । रौद्ररसव्यञ्जनक्षमा वृत्तिः 'परुषा' 'गौडी' इत्यादि-
नामभिः प्रसिद्धा । कवेः = भट्टनारायणस्य । अशक्तिरेवेति । आनन्दवर्धनाभिनव-
गुप्तपादादिभिस्तु 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति' इत्यादिवेणीसंहारपद्य एव सत्यप्येतादृश-
वृत्त्यभावे प्रसादेन रौद्ररसाभिव्यञ्जनं स्वीकृतमेव । स्वयमपि वक्ष्यत्येवमेवेति प्रौढि-
रेवेयं पण्डितराजस्य । रौद्रस्य युद्धवीराद् भेदकं तु रक्तास्यनेत्रत्वमुक्तं दर्पणकारेण ।
इस पद्य में भी अपराधी रामचन्द्र परशुराम के क्रोध के आलम्बन हैं। धनुर्भङ्ग
के कोलाहल का सुनना उद्दीपनविभाव है। क्रोधजनित निःश्वास और आँखों से
क्रोधाग्नि की चिनगारियों का निकलना आदि अनुभाव हैं। अपने पिता के वध
का स्मरण¹, अहङ्कार एवम् उग्रता आदि व्यभिचारिभाव हैं। अतः क्रोध का
अभिव्यञ्जन तो होता ही है। किन्तु यह क्रोध परशुराम के प्रभाव के वर्णन के
मूलभूत कवि-(वक्तृ-)निष्ठ रति (निरतिशयप्रेम = भक्ति) का अङ्ग है, क्योंकि
'जयति' इस सर्वोत्कर्षबोधक क्रिया पद से यह रति स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।
अतः इसे रौद्ररसध्वनि का उदाहरण नहीं कहा जा सकता, क्योंकि अन्याङ्गभूत रस
ध्वनिपदव्यपदेश्य नहीं होता। काव्यप्रकाश में जो :-
'कृतमनुमतं दृष्टं वा यैरिदं गुरुपातकम्' इत्यादि वेणीसंहार का पद्य रौद्ररस-
ध्वनि का उदाहरण दिया गया है उसमें रौद्ररस के अभिव्यञ्जन के लिए अपेक्षित
महोद्धता वृत्ति (= परुषा = कठोराक्षरघटिता वर्णसंघटना) नहीं है। कवि चाहता
तो है इस पद्य द्वारा उत्कट कोटि के क्रोध को व्यक्त करना, किन्तु अनुकूल वृत्ति से
१. इस 'स्मरण' के वाच्य होने से इसे व्यभिचारिभाव कहना उचित नहीं है,
क्योंकि व्यभिचारिभाव व्यङ्ग्य होता, वाच्य नहीं, हां यदि महागुरु शब्द
का अर्थ माता हो जिनका वध परशुराम ने पिता की आज्ञा से किया था
तो कथञ्चित् इसे व्यभिचारिभाव कहा जा सकता है।