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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 414 में से

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पृष्ठ 166

१३४ रसगङ्गाधरः
अत्राप्यालम्बनस्य नायकस्य, निःश्वासाश्रुपातादेरनुभावस्य, विषाद-
चिन्तावेगादेश्च व्यभिचारिणः संयोगाद्रतिरभिव्यज्यमाना वियोगकालाव-
च्छिन्नत्वाद् विप्रलम्भरसव्यपदेशहेतुः ।
यथा वा—
आविर्भूता यदवधि मधुस्यन्दिनी नन्दसूनोः
कान्तिः काचिन्निखिलनयनाकर्षणे कार्मणज्ञा ।
श्वासो दीर्घस्तदवधि मुखे पाण्डिमा गण्डयुग्मे
शून्या वृत्तिः कुलमृगदृशां चेतसि प्रादुरासीत् ॥
आविर्भूतेत्यादि । यदवधि यतः प्रभृति नन्दसूनोः कृष्णस्य मधुस्यन्दनशीला
कामरसस्यन्दिनी, निखिलानां नयनानामाकर्षणे कार्मणज्ञा मन्त्रतन्त्रविधिज्ञा वशी-
करणक्षमा काचिद् विलक्षणा नवयौवनप्रभवा कान्तिराविर्भूता तदवधि ततः प्रभृत्येव
कुलमृगदृशां यदुरमणीनां वियोगातिशयवशाद् दीर्घः श्वासो मुखे, पाण्डिमा गण्डयुग्मे,
चेतसि च शून्या निरालम्बना वृत्तिः प्रादुरासीत् प्रावर्त्ततेत्यर्थः । निरालम्बनत्वं च
वृत्तेः श्रीकृष्णप्राप्त्यशक्यतयोन्नेयम् ।
अत्रालम्बनस्य श्रीकृष्णस्यानुभावस्य दीर्घश्वासादेस्तद्व्यङ्ग्यविषादादिव्यभिचा-
रिणश्च संयोगाद् वियोगकालावच्छिन्नत्वेन विप्रलम्भो व्यज्यत इति पूर्ववज्ज्ञेयम् ।
को बड़ी ही कातर दृष्टि से एकटक देख रही है ओर उसकी आंखों से इतने आंसू
बह रहे हैं जो उसके दीर्घ उष्ण निश्वास से कुम्हलाये अधर से टपकते हुए उसके
स्तनों को भी गीले कर रहे हैं । ओह ! कितने कष्ट की बात है !’’
एक नवोढ़ा के विषय में किसी सहृदय द्वारा उक्त इस पद्य में नायक-स्वरूप
आलम्बन विभाव, निःश्वास-अश्रुपात आदि अनुभावों और विषाद, चिन्ता, आवेग
आदि व्यभिचारिभावों के सम्बन्ध से अभिव्यज्यमान जो नायिकानिष्ठ नायक-
विषयक रति है वह वियोगकाल से अवच्छिन्न (= वियोगकालिक ) होने से
विप्रलम्भ कहलाती है ।
एक अन्य उदाहरण भी—
“जब से नन्दतनय श्रीकृष्ण की युवतियों के मन में कामरस प्रवाहित करने
वाली और उन सब की आँखों को आकृष्ट करने में जादूगर के समान कुशल
यौवनावस्था की वह अलौकिक छटा प्रकट हुई उसी समय से कुलाङ्गनाओं के
मुख पर दीर्घ श्वास, उनके दोनो कपोलों पर सफेदी और उनके मन में शून्य
वृत्ति (= उदासी ) का भी आरम्भ हो गया ।।”
इसमें भी श्रीकृष्ण आलम्बन विभाव, दीर्घ श्वास आदि अनुभाव