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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 414 में से

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पृष्ठ 167

प्रथमाननम् १३५
यथा वा—
नयनाञ्चलावमर्शं या न कदाचित्पुरा सेहे ।
आलिङ्गितापि जोषं तस्थौ सा गन्तुकेन दयितेन ॥
इहापि सहजचाञ्चल्यनिवृत्तिर्जडता चानुभावव्यभिचारिणौ । इमं च
पञ्चविधं प्राञ्चः प्रवासादिभिरामनन्ति । ते च प्रवासाभिलापविरहेर्ष्या-
शापानां विशेषाऽनुपलम्भान्नास्माभिः प्रपञ्चिताः ।
करुणो यथा -
अपहाय सकलबान्धवचिन्तामुद्वास्य गुरुकुलप्रणयम् ।
हा तनय विनयशालिन् ! कथमिव परलोकपथिकोऽभूः ॥
श्रीकृष्णविषयककविरतिं प्रति विप्रलम्भगतैर्गुणीभूतत्वाच्छङ्क्योदाहरणान्तरं
नयनाञ्चलेत्यादीति रसचन्द्रिका । नयनाञ्चलेत्यादि । नयनाञ्चलस्य पक्ष्मणोऽव-
मर्शमाघातं या पुरा न सेहे सैव गन्तुकेन दयितेनालिङ्गिताऽपि गमनकाले जोषं तूष्णीं
तस्थौ जडवदिति पदार्थः । अत्रावमर्शश्च सम्भोगकालिकपतिपक्ष्मणो विवक्षितः ।
यद्वाऽत्र लोकसमक्षं पतिकटाक्षसम्बन्ध एव नयनाञ्चलावमर्शः । इमं चेति ।
विप्रलम्भशृङ्गारमित्यर्थः । प्राञ्चः प्रकाशकारादयः । विशेषाऽनुपलम्भादित्यस्य
फले विप्रलम्भभेदानाम् इत्यादिः ।
अपहायेत्यादि उद्वास्य = निरस्य । अत्र विनयशालित्वेन बान्धवपरित्याग
और दीनता आदि व्यभिचारिभावों के सम्बन्ध से कुलाङ्गनानिष्ठ श्रीकृष्ण-
विषयक रति अभिव्यक्त हो रही है । यतः यह रति वियोगकाल से अवच्छिन्न
है अत एव इसे भी विप्रलम्भ कहा जाना चाहिए ।
अथवा यह तीसरा उदाहरण देखिए :—
“जो यह कामिनी लोक लज्जा के कारण अपने प्रियतम के कटाक्षपात को भी
पहले कभी न सह पाती थी वही आज दूर जाने वाले पति के द्वारा प्रगाढ़ आलिङ्गन
किये जाने के समय भी चुपचाप खड़ी रही ॥”
इस पद्य में प्रस्थान करने वाला प्रियतम आलम्बन विभाव, प्रस्थानादि
उद्दीपन विभाव, चञ्चलता की निवृत्ति अनुभाव और इससे व्यज्यमान जड़ता
आदि व्यभिचारिभाव हैं । यतः नायिका की नायकविषयक रति यहाँ वियोगकाल
से अवच्छिन्न है अतः यहाँ का शृङ्गार विप्रलम्भ कहा जाएगा ।
मम्मट आदि प्राचीन आचार्य वियोग के हेतुओं के प्रवास, अभिलाष, विरह,
ईर्ष्या और शाप इन पाँच प्रकार के होने से विप्रलम्भ को भी पाँच प्रकार का
मानते । किन्तु हमने इन सब का पृथक् वर्णन इसीलिए छोड़ दिया है कि इनमें,
वस्तुतः इनके फल में, कोई स्पष्ट तारतम्य प्रतीत नहीं होता ।
अब करुण रस का उदाहरण लीजिए :—