रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमाननम् १२७
वागङ्गादिविकारदर्शनजन्मा विकासाख्यो हासः ॥
व्याघ्रादिदर्शनादिजन्मा परमानर्थविषयको वैक्लव्याख्यः स भयम् ॥
परमानर्थविषयकत्वाभावे तु स एव त्रासो व्यभिचारी । अपरे तु
औत्पातिकप्रभवस्त्रासः, स्वापराधद्वारोत्थं भयमिति भयत्रासयोर्भेदमाहुः ॥
कदर्यवस्तुविलोकनजन्मा विचिकित्साख्यचित्तवृत्तिविशेषा जुगुप्सा ॥
एवमेषां स्थायिभावानां लोके तत्तन्नायकगतानां यान्यालम्बनतयोद्दीपन-
विकारेति। स चात्र स्वाभाविकः, कृत्रिमश्च क्षुद्र एव, गुरुतरविकारोऽपि
स्वकृतः न परकृतः, परकृते हि गुरुतरविकारे क्रोधोदयाद् विकर्तरि इति
बोध्यम् ।
निगडनिबद्धव्याघ्रादिदर्शने कस्यचिद्भयानुदयात् परमानर्थविषयक इत्युक्तम् ।
अतश्च यस्य तथाविधव्याघ्रादिदर्शनेऽपि परमानर्थजनकत्वसम्भावना तस्य भयं
ततोऽप्युत्पद्यत एव । क्षुद्रानर्थविषयकत्वे त्वाह—व्यभिचारीति । बीभत्सादाविति
शेषः । शोकभययोर्वैक्लव्यात्मकत्वेऽपि कारणभेदाद् भेदोऽनयोरवगन्तव्यः । औत्पा-
तिकेति । वज्रनिर्घातादिप्रभव इत्यर्थः । अत्रापि कारणभेदादेव त्रासभयोर्भेदः ।
कदर्यम् = कुत्सितम् । विचिकित्सा = गर्हणा । एते च रत्यादयो यथोद्देशं
शृङ्गारादीनां स्थायिनः ।
सम्प्रति आलम्बनकारणादीनां विभावपदव्यपदेशे हेतुमाह—एवमित्यादिना ।
हास्य रस का स्थायिभाव हास है । इसे किसी व्यक्ति के वचन, अङ्ग प्रत्यङ्ग
तथा वेष आदि में विद्यमान विकार के ज्ञान से उत्पन्न चित्तविकास (चित्त का खिल
उठना) कहा जाता है ॥
व्याघ्र आदि हिंस्र जीवों या अन्य किन्हीं परम अनर्थ (= मरण आदि) के जनक
वस्तुओं के दर्शन-श्रवण आदि से उत्पन्न जो चित्त की उत्कट विकलता है वही भय
है । यही भयानक रस का स्थायिभाव है ॥
यदि यह चित्त विकलता परमानर्थविषयक न हो, अर्थात् किसी साधारण अनिष्ट
का जनक प्रतीत होती हो तो उसे 'त्रास' कहते, 'भय' नहीं । अतः त्रास व्यभिचारी
भाव है, स्थायी भाव नहीं । कुछ आचार्यों का मत है कि आधिभौतिक-आधिदैविक
आपदाओं से उत्पन्न चित्तविक्लवता त्रास है जब कि अपने (उत्कट) अपराधों से
उत्पन्न विकलता भय है—यही भय और त्रास में ... ने
कारणभेद से भिन्नता (कार्यभेद) माननी चाहिए ॥
किसी कुत्सित पदार्थ के दर्शन आदि से उत्पन्न एक प्रकार की चित्तवृत्ति, जिसे
'विचिकित्सा' (घृणा) कहते, जुगुप्सा है । यही बीभत्स रस का स्थायी भाव है ॥
इस प्रकार पूर्वोक्त विभिन्न नायक-नायिकाओं में विद्यमान रत्यादि नौ स्थायि-