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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 161

प्रथमाननम् १२९
तत्र शृङ्गारस्य स्त्रीपुंसावालम्बने। चन्द्रिकावसन्तविविधोपवनरहः-
स्थानादय उद्दीपनविभावाः। तन्मुखावलोकनतद्गुणश्रवणकीर्तनादयोऽन्ये
सात्त्विकभावाश्चानुभावाः। स्मृतिचिन्तादयो व्यभिचारिणः।
करुणस्य बन्धुनाशादय आलम्बनानि। तत्संबन्धिगृहतुरगाभरणदर्श-
नादयस्तत्कथाश्रवणादयश्चोद्दीपकाः। गात्रक्षेपाश्रुपातादयोऽनुभावाः।
विशेषेणाभिमुख्येन चरन्तो व्यभिचारिणः।
स्थायिन्युन्मग्ननिमग्नाः कल्लोला इव वारिधौ ॥ इति ।
अत एव प्रदीपकृताऽपि वर्णितम्—
ये तूपकर्तुमायान्ति स्थायिनं रसमुत्तमम् ।
उपकृत्य च गच्छन्ति ते मता व्यभिचारिणः ॥ इति ।
इदानीमादिनिर्दिष्टानां शृङ्गारादीनां चतुर्णां रसानां विभावानुभावव्यभिचारि-
भावानाह विशेषेण—तत्रेत्यादिना । उक्तेषु रसेष्वित्यर्थः ।
बन्धुनाशादय इति । नष्टबन्ध्वादय इति केचित् । तत्र नष्टानामालम्बनत्वा-
सर्वदा साथ न रहने, अर्थात् व्यभिचरित होने, से 'व्यभिचारिभाव' भी
कहे जाते ॥
उक्त नवविध रसों में—
शृङ्गार रस के नायक-नायिका आलम्बन विभाव हैं । रति के उभयनिष्ठ होने
से नायक के लिये नायिका और नायिका के लिए नायक आलम्बन विभाव है।
आलम्बन का अर्थ विषयता सम्बन्ध से रत्यादि का आश्रय है। चन्द्रिका, वसन्त
ऋतु, विभिन्न प्रकार के रम्य पुष्पों से सम्पन्न उद्यान, एकान्त स्थान तथा अन्य
कामोद्दीपक पदार्थ इस रस के उद्दीपन विभाव हैं। वारम्बार प्रियतम अथवा
प्रियतमा के मुख का परस्पर अनुरक्तभाव से अवलोकन, उसके गुणों का
श्रवण तथा उच्चारण एवम् रोमाञ्च आदि कुछ अन्य सात्त्विक भाव शृङ्गार
के अनुभाव हैं। अनुरागपूर्वक परस्पर-स्मरण एवं चिन्ता आदि इसके व्यभिचारि-
भाव हैं ॥
इष्ट जनों का विनाश अथवा उन पर आई कोई घोर विपत्ति या नष्ट इष्टजन
१. 'व्यभिचारी' यह नाम इस तथ्य का स्पष्ट संकेत करता कि शास्त्र में जिस रस
के जितने व्यभिचारिभाव गिनाये गये हैं वे सब के सब सर्वत्र रस-स्थल में
होते ही हों—यह आवश्यक नहीं है। वस्तुतः उद्दीपन विभावों और अनुभावों
की भी यही स्थिति है। उनमें सर्वदा सब का होना अनिवार्य नहीं। ग्रन्थ में
निर्देश तो उपलक्षण है।