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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

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पृष्ठ 165

प्रथमाननम् १३३
पार्वतीपरमेश्वरविषयककविरतौ प्रधाने निरतिशयप्रेम्णो गुणीभावात् । न
हि गुणीभूतस्य रत्यादे रसध्वनिव्यपदेशहेतुत्वं युक्तम्, 'भिन्नो रसाद्यलं-
कारादलंकार्यतया स्थितः' इति सिद्धान्तात् ।
द्वितीयो यथा—
वाचो माङ्गलिकीः प्रयाणसमये जल्पत्यनल्पं जने
केलीमन्दिरमारुतायनमुखे विन्यस्तवक्त्राम्बुजा ।
निःश्वासग्लपिताधरोपरि पतद्बाष्पार्द्रवक्षोरुहा
बाला लोलविलोचना शिव शिव प्राणेशमालोकते ॥
परमेश्वरयोर्व्यज्यते । स्वोक्तार्थे मम्मटोक्तिं प्रमाणयति — भिन्न इत्यादिना । इदं
चित्रमीमांसाखण्डनं ग्रन्थकृतः प्रौढिवादमात्रम्, तत्रास्मिन्नुदाहरणे स्पष्टमेव ध्वनित्व-
खण्डनादिति विभावनीयम् ।
द्वितीयः = विप्रलम्भः । वाच इत्यादि । स्वप्राणेशस्य प्रयाणसमये माङ्गलिकी-
मङ्गलफलिका वाचो जनेऽनल्पं जल्पति सति क्रीडागृहगवाक्षमुखे विन्यस्तं
मुखकमलं यया सा, अथ च निःश्वासैरुष्मातिशयवद्भिः ग्लपितस्य मलिनीकृतस्या-
धरस्योपरि पतद्भिर्बाष्पैराद्रौ स्तनौ यस्याः सा लोलविलोचना बाला प्राणेश-
मालोकते इत्यर्थः । शिव शिवेति खेदातिशयद्योतनाय ।
सम्पृक्तौ•••• •••" में यह कहा है कि इससे पार्वती-परमेश्वर के निरतिशय
प्रेम का अभिव्यञ्जन होने से यहाँ शृङ्गाररसध्वनि है । किन्तु उन्होंने यह वक्तव्य
ध्वनिमार्ग के मर्म को न समझ कर दिया है, अतः अनुचित है । वस्तुस्थिति
यह है कि पूर्वोक्त पद्य में तो कवि की जो पार्वती-परमेश्वर-विषयक रति है वही
प्रधान है, उन दोनों का निरतिशय प्रेम तो उस कविरति का गुणीभूत है । अतः
पार्वती-परमेश्वरनिष्ठ रति को ध्वनि नहीं कहा जा सकता, क्योंकि गुणीभूत पदार्थ
ध्वनिपदवाच्य कदापि नहीं होता । काव्यप्रकाश (आदि) में यह सिद्धान्त स्थापित
है कि गुणीभूत होने के कारण अलङ्कारभूत रसादि से प्रधानीभूत अलङ्कार्य, अत एव
ध्वनिपदवाच्य, रस सर्वथा भिन्न है । इससे स्पष्ट है कि गुणीभूत पार्वती-परमेश्वर-
निष्ठ रति ध्वनिपदाभिधेय हो नहीं सकती, यहाँ तो पार्वती-परमेश्वरात्मक
देवताविषयक कविरतिस्वरूप 'भाव' ही ध्वनिव्यपदेश्य है ॥
अब विप्रलम्भ शृङ्गार का उदाहरण देखिए :—"एक ओर तो नायक का
अपने घर से प्रस्थान करते समय उसके इष्ट जन प्रचुर रूप में प्रास्थानिक
मङ्गलगान कर रहे हैं और दूसरी ओर उसकी नवोढ़ा प्रियतमा अपने रतिक्रीड़ा-
गृह की खिड़की पर अपना मुखकमल रख कर अपने प्रस्थान-परायण प्राणनाथ