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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 414 में से

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पृष्ठ 164

१३२ रसगङ्गाधरः
नात् । एवं वियोगोऽपि न वैयधिकरण्यम्, दोषस्योक्तत्वात् । तस्माद्
द्वाविमौ संयोगवियोगाख्यावन्तःकरणवृत्तिविशेषौ । यत्संयुक्तो वियुक्त-
श्चास्मीति धीः । तत्राद्यो यथा—'शयिता सविधेऽप्यनीश्वरा' इत्यत्र
निरूपितः ।
यत्तु चित्रमीमांसायाम्—'वागर्थाविव संपृक्तौ' इत्यत्र रसध्वनिः,
निरतिशयप्रेमशालिताव्यञ्जनात्' इति, तद्ध्वनिमार्गानकलननिबन्धनम् ।
स्वारस्यादपि दैशिकसामानाधिकरण्यस्यैवावगतेश्च । दोषस्येति । एकतल्पशयनेऽ-
पीत्यादिवाक्योक्तस्येत्यर्थः । तत्र दैशिकवैयधिकरण्याभावेऽपि विप्रलम्भाङ्गीकारादिति
हेतुरत्र । यत् = यतः । वस्तुतोऽत्र सामानाधिकरण्यज्ञानमपेक्षितम् ।
निरतिशयप्रेमेति । प्रेम च नित्यसम्बद्धवागर्थवत् संपृक्तत्ववर्णनात्पार्वती-
रति संयोगकालावच्छिन्न (संयोगकाल से विशिष्ट) हो तो संयोग शृङ्गार
और यदि वियोगकाल से अवच्छिन्न हो तो विप्रलम्भ शृङ्गार होता । संयोग का
अर्थ नायक-नायिका का एक देश में अवस्थान (दैशिक सामानाधिकरण्य) नहीं,
क्योंकि यदि नायक-नायिका में परस्पर ईर्ष्या आदि के कारण तात्कालिक वैमनस्य
हो तो एक घर में क्या, एक शय्या पर भी दोनों के लेटे रहने पर आचार्यों
ने विप्रलम्भ शृङ्गार ही माना है, संयोग शृङ्गार नहीं । अत एव विप्रलम्भ का
भी अर्थ दैशिक वैयधिकरण्य नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने में जो दोष आता—वह कहा
जा चुका है। तात्पर्य यह है कि यदि दैशिक वैयधिकरण्य ही विप्रलम्भ हो तब तो
तात्कालिक वैमनस्य के कारण एक शय्या पर लेटी नायक-नायिका के बीच दैशिक
सामानाधिकरण्य रहने पर भी विप्रलम्भ का जो आचार्यों ने स्वीकार किया है
वह असङ्गत हो जायेगा । अतः संयोग और विप्रलम्भ ये दोनों ही दो चित्तवृत्तियाँ
हैं जिनके कारण नायक-नायिका में क्रमशः 'हम संयुक्त हैं' और 'हम वियुक्त हैं'
इस प्रकार की धारणाएं बनतीं १। इन दोनों भेदों में संयोग शृङ्गार का उदाहरण
तो उत्तमोत्तम काव्य का जो उदाहरण 'शयिता सविधेऽप्यनीश्वरा' आदि पद्य
दिया गया है वही है।
चित्रमीमांसाकार अप्पय्य दीक्षित ने रघुवंश के प्रथम पद्य—"वागर्थाविव
१. अतः उक्त धारणाएं चाहे दैशिक सामानाधिकरण्य होने पर होती हों या
इसके अभाव में, यथाक्रम उभयविध शृङ्गार रस होगा। कालिक सामाना-
धिकरण्य तो उभयविध शृङ्गारों में अनिवार्य है, इसके अभाव का ज्ञान
होने पर तो करुणरस ही होगा, शृङ्गार नहीं।