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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 414 में से

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पृष्ठ 176

१४४ रसगङ्गाधरः
पिका । कवचादिवितरणं तत्र लघुत्वबुद्ध्यादिकं चानुभावः । मे इत्यर्था-
न्तरसङ्क्रमितवाच्यध्वन्युत्थापितो गर्वः स्वकीयलोकोत्तरपितृजन्यत्वादि-
स्मृतिश्च संचारिणौ । वृत्तिरप्यत्र तत्तदर्थानुरूपोद्गमविरामशालितया सहृद-
यैकचमत्कारिणी । तथा हि—उत्साहपोषकं कवचकुण्डलार्पणयोर्लघुत्व-
अर्थान्तरसंक्रमितेत्यादि । अयम्भावः—अर्पयामीत्यादिक्रियापद उत्तमपुरुष-
सामर्थ्यात् प्रकान्तरत्वाच्चास्मदर्थस्य प्रतीत्या तदभिधानाय 'मे' इतिपदस्य नात्रोपयोग
इति वाच्यार्थमात्रविवक्षायामनुपयोगितालक्षणवाच्यार्थबाधादत्रास्मत्पदं लाक्षणिकं
सत् सकलकोषदातृत्वविशिष्टमस्मत्पदार्थं बोधयति । अविरोधित्वाच्चात्रास्मच्छन्द-
वाच्यार्थस्य लक्ष्यार्थे समावेशोऽपि नायुक्त इत्युपादानलक्षणैवात्र । तत एक
लक्षिताद्धर्मविशिष्टधर्मिणोऽनुपयोगितालक्षणवाच्यार्थबाधस्य निराकरणादर्थान्तरे
गर्वादौ क्षीणसामर्थ्योपादानलक्षणा न तद्धर्मान्तरं प्रतिपादयितुमलमिति व्यञ्जनैवा-
संख्येयार्थद्योतिका तत्प्रतिपादिकाऽगत्या स्वीकर्त्तव्येति भवति गर्वादीनामर्थान्तर-
संक्रमितध्वनिसमुत्थापितत्वमिति । स्वकीयेति । एतच्चास्मदर्थापेक्षया, सहृदयापेक्षया
तु तदीयेति मन्तव्यम् । स्मृतिः सहृदयानामिति शेषः । एषा च स्मृतिः शक्यसम्बद्ध-
त्वादुक्तार्थैकसम्बन्धिज्ञानविधया जायते । ये तु लोकोत्तरपितृजन्यत्वं शक्यता-
वच्छेदकं मन्यन्ते तेषां शक्यार्थस्य प्रकृतानुपयोगित्वलक्षणो बाधो लक्षणाप्रयोजकः
कथमुपपद्यत इति चिन्त्यम् । अतस्तद्व्यक्तित्वमेवात्र शक्यतावच्छेदकमस्मदर्थ इति
यह उचित है । यहाँ याचना करने वाले ब्राह्मण आलम्बन हैं । उन्हीं ब्राह्मण
द्वारा की गयी कर्ण की स्तुति ( जो इस पद्य में निर्दिष्ट नहीं है ) उद्दीपन
विभाव है । कवच और कुण्डलों का दान और उन कवचादि में तुच्छता-बुद्धि
आदि अनुभाव हैं । पद्यस्थ 'मे' पद में अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य ध्वनि से प्रतीयमान
गर्व ( अहङ्कार ) और लोकोत्तर पिता भगवान् सूर्य से उत्पन्न होने की स्मृति
व्यभिचारिभाव हैं । तात्पर्य यह है कि प्रकृत पद्य में 'अर्पयामि' और 'आवेदयामि'
इन उत्तमपुरुषों की क्रियाओं और प्रसङ्ग से हीं 'मे' पद के बिना भी अस्मच्छब्दार्थ
का बोध हो जाने से वाच्यार्थमात्र का प्रतिपादन करने के लिए 'मे' पद का कोई
उपयोग नहीं है । यही अनुपयोगिता यहाँ अस्मच्छब्द के मुख्यार्थ का बाध--
लक्षणाबीज है । यतः 'समस्त राज्य को समर्पित कर देने वाले मेरे लिए' यह अर्थ 'मे'
पद का प्रकृतानुपयोगी नहीं है अतः यहाँ अस्मच्छब्द में जहत्स्वार्था लक्षणा न मानकर
अजहत्स्वार्था लक्षणा हीं उचित है । एवञ्च 'समस्त ···· मेरे लिए' इस अर्था-
न्तर में संक्रमित हो गया है वाच्यार्थ जिसका उस अस्मच्छब्द में वर्त्तमान व्यञ्जना
(ध्वनि)-अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनि से प्रतीयमान कर्णनिष्ठ गर्व और भगवान् सूर्य
का पुत्र होना--व्यभिचारिभाव कहे गये हैं । प्रतिपाद्य अर्थों के अनुरूप प्रारब्ध