रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ रसगङ्गाधरः
गृहकलहादिजस्तु व्यभिचारी ॥
गुरुबन्धुवधादिपरमापराधजन्मा प्रज्वलनाख्यः क्रोधः ॥
अयं च परविनाशादिहेतुः । क्षुद्रापराधजन्मा तु परुषवचनासंभाषणा-
दिहेतुः । अयमेवामर्षाख्यो व्यभिचारीति विवेकः ॥
परपराक्रम-दानादिस्मृतिजन्मा औन्नत्याख्य उत्साहः ॥
अलौकिकवस्तुदर्शनादिजन्मा विकासाख्यो विस्मयः ॥
गन्तव्यं यदि नाम निश्चितमहो ! गन्ताऽसि केयं त्वरा
द्वित्राण्येव पदानि तिष्ठतु भवान् पश्यामि यावन्मुखम् ।
संसारे घटिकाप्रणालविगलद्वारा समे जीविते
को जानाति पुनस्त्वया सह मम स्याद्वा न वा सङ्गमः ॥
इत्यत्र दैन्यजो विरागो विप्रलम्भे व्यभिचार्येव, तत्पोषकत्वात् । न तस्य
स्थायित्वम् । अतोत्र रससङ्करानौचित्यवर्णनमसहृदयतामेव प्रकाशयति । एतत्सर्व-
मभिप्रेत्याह—गृहकलहादिजेत्यादि ।
रौद्रस्थायिभावलक्षणमाह—गुरुबन्धुवधेत्यादि । आदिपदमिष्टमात्रोपसंग्रा-
हकम् । प्रज्वलनाख्य इत्यस्य चित्तवृत्तिविशेष इति शेषः । व्यभिचारीति ।
रौद्रादाविति शेषः ।
गृह-कलह आदि से उत्पन्न निर्वेद तो क्षणिक होने से विप्रलम्भ शृंगार आदि
रसों में व्यभिचारिभाव होता, स्थायिभाव नहीं ॥
रौद्र रस का स्थायिभाव क्रोध है जिसे चित्त का प्रज्वलन (जलन) भी कहते ।
यह गुरु अथवा अन्य किसी इष्टजन के वध अथवा उसे अत्यन्त कष्ट आदि पहुँचाने
जैसे उत्कट अपराध किये जाने पर उत्पन्न होता ॥
यही क्रोध उत्कट अपराधी के विनाश आदि का कारण है । किन्तु यदि
अपराध साधारण कोटि का होता तो इससे उसके प्रति लोग कठोर वचन का
प्रयोग करते या फिर बोलते हीं नहीं । अन्य प्रकार की कटु भावना आदि भी इसी
से उत्पन्न होतीं । साधारण कोटि के अपराध से उत्पन्न कोप को हीं अमर्ष कहा
जाता जो रौद्र आदि रसों के व्यभिचारिभावों में अन्यतम है । क्रोध और अमर्ष
में यही अन्तर है ॥
. वीर रस का स्थायिभाव उत्साह है जिसे चित्त का औन्नत्य, अर्थात् उत्कृष्ट-
प्रयत्नसम्पन्नता भी कहा जाता । इसकी उत्पत्ति शत्रु के पराक्रम और उसकी
दानशीलता आदि के स्मरण से होती ॥
अद्भुत रस का स्थायिभाव विस्मय है । अलौकिक वस्तु के दर्शन आदि से
उत्पन्न चित्त का विकास ( विस्तार = फैलना ) हीं इसका स्वरूप है ॥