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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 414 में से

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पृष्ठ 177

प्रथमाननम् १४५
निरूपणं विधातुं पूर्वार्धे तदनुकूलशिथिलबन्धात्मिका । उत्तरार्धे तु
मौलितः प्राग्वक्तृगतगर्वोत्साहपरिपोषणायोद्धता । ततः परं ब्राह्मणे सवि-
नयत्वं प्रकाशयितुं तन्मूलीभूतं गर्वरहित्यं ध्वनयितुं पुनः शिथिलैव । अत
एवावेदयामीत्युक्तम्, न तु ददामि वितरामीति वा ।
इदं तु नोदाहरणीयम्—
यस्योद्दामदिवानिशार्थिविलसद्दानप्रवाहप्रथा-
माकर्ण्यावनिमण्डलागतवियद्वन्दीन्द्रवृन्दाननात् ।
ईर्ष्यानिर्भरफुल्लररोमनिकरव्यावल्गदूधःस्रवत्-
पीयूषप्रकरैः सुरेन्द्रसुरभिः प्रावृट्पयोदायते ॥
विभावनीयं विज्ञैः । न तु ददामीत्यादि । ददामीत्यादौ शब्दशक्तिस्वाभाव्याद-
हङ्कारः कर्तुः प्रतीयते, आवेदयामीत्यत्र तु न तथेति भावः ।
प्रत्युदाहरणमाह—इदं त्वित्यादिना ।
यस्योद्दामेत्यादि । दानशोण्डस्य कस्यचिन्नृपस्य स्तुतिरियम् । यस्य
नृपस्य अर्थिषु याचकेषु दिवानिशं विलसत उद्दाम्नोऽप्रतिहतस्य दानप्रवाहस्य
प्रथां प्रसिद्धिम् अवनिमण्डलाद् भूमण्डलादागतानां वियद्वन्दीन्द्राणामुत्तमस्वर्गिय-
स्तुतिपाठकानां चारणानामाननादाकर्ण्य सुरेन्द्रसुरभिरिन्द्रस्वामिका कामधेनुः ईर्ष्या
और परिसमाप्त भिन्न-भिन्न वृत्तियां भी सहृदयों को अत्यन्त आकृष्ट करने वाली
हैं। जैसे—पद्य के पूर्वार्द्ध में कवच और कुण्डलों की तुच्छता का प्रतिपादन,
जिससे कर्ण का दानोत्साह परिपुष्ट होता है, करने के लिए (तुच्छता-प्रतिपादन के)
अनुकूल शिथिला वृत्ति (कोमलपद योजना) है; उत्तरार्द्ध में 'मौलिम्' पद के पहले
(अकरुणम्····················घारम् ) वक्ता कर्ण के गर्व और दानोत्साह का उत्कृष्ट
अभिव्यञ्जन कराने हेतु उद्धता वृत्ति है। तत्पश्चात् 'मौलिमावेदयामि' इस अन्त्य
भाग में याचक ब्राह्मण के प्रति अपनी विनम्रता के प्रकाशन के मूलभूत गर्वशून्यता
की व्यञ्जना के लिए तदनुकूल शिथिला वृत्ति ही है। यही कारण है कि
'ददामि' अथवा 'वितरामि' इत्यादि गर्वप्रकाशक क्रियापद का नहीं अपि तु
'आवेदयामि' इस गर्वशून्यता-सूचक अथवा नम्रता-सूचक क्रियापद का ही प्रयोग
किया गया है ॥
निम्ननिर्दिष्ट पद्य को तो दानवीरध्वनि का उदाहरण नहीं देना चाहिए—
“ये महाराज इतने उदार हैं कि इनके द्वारा दिन-रात याचकों को दिये ज ने
वाले अधिकाधिक दानप्रवाह को भूमण्डल से लौटकर आये स्वर्गीय श्रेष्ठ बन्दियों
के मुख से सुनकर स्वर्गस्थ कामधेनु को भी इनसे ईर्ष्या हो गई है जिससे इसका
सारा शरीर रोमाञ्चित हो उठा है। इसी रोमाञ्च के कारण इसके दुग्धपूर्ण स्तनों