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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

४८ रंगनाथ रामायण
“इसपर वसिष्ठ के पुत्र ने कहा—‘राजन्, तुम्हारे-जैसे दुर्मतियो के अतिरिक्त दूसरां
कोई निर्मल चित्तवाला व्यक्ति ऐसे यज्ञ की बात सोच भी सकता है ?' मुनि-पुत्र के यह
कहने पर गजा ने उपेक्षा से कहा—'आपके पिता ने यज्ञ कराना अस्वीकार कर दिया है,
और आप भी अस्वीकार करते हैं । मेरे हित की चिंता न करनेवालो से अब मेरा क्या
सबंध ? मै किसी और से यह यज्ञ कराऊँगा ।'
“तव रुष्ट होकर उस पुण्यात्मा ने कहा—'तुम चाडाल हो जाओ ।' तुरत राजा का
रूप ऐसा विकृत हो गया, मानो उसका दीप्तिमान् तेज वासिष्ठ की क्रोधाग्नि से भस्म हो
गया हो । उसका शरीर काला हो गया । उसके शरीर पर के वस्त्र काले हो गये । उसके
केश विखर गये । उसका रूप इतना मलिन हो गया, मानो उसके स्पर्श-मात्र से दूसरा भी
मलिन हो जायगा । उसके शरीर पर रहनेवाले कान्तिमान् मणिमय स्वर्णाभरण लोहवत
हो गये । उसके रूप, रग, वाणी आदि चाडाल-जाति के अनुरूप हो गये ।
“इस प्रकार राजा को भयकर चाडाल-रूप धारण किये हुए देखकर नागरिक, सेवक,
अमात्य तथा वधु-वर्ग ने उसे त्याग दिया । तब राजा अत्यन्त भयभीत होकर लोगो (के
मार्ग) से वचता हुआ अपने-आपको छिपाता हुआ धीरे-धीरे महातेजस्वी विश्वामित्र
मुनि के पास जा पहुँचा । उसे देखकर गाधि-पुत्र का हृदय दया से उमड आया । वे
बोले—'अयोध्या का शासन करनेवाले, तुम्हें यह चाण्डालत्व कैसे प्राप्त हुआ ?'
“तब राजा ने हाथ जोडकर कहा—'हे महात्मा, मैंने वसिष्ठ से सशरीर स्वर्ग-
गमन का यज्ञ कराने की प्रार्थना की थी, तो उन्होने अस्वीकार कर दिया। उनके पुत्र ने
कहा कि जब वसिष्ठ की ऐसी सम्मति है, तब यज्ञ हो नही सकता । इसपर मैने दूसरो
से यज्ञ सपन्न करवा लेने का विचार प्रकट किया, तो अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्होने मुझे चाण्डाल
वन जाने का शाप दिया । इसी कारण मुझे यह रूप मिला है । मैने जो यज्ञ करने
का सकल्प किया है, उसे अवश्य पूरा करूँगा । विपत्ति में भी मै असत्य नही बोलता ।
भविष्य में भी किसी भी प्रकार से मैं सत्य का पालन करूँगा । मैने अबतक कितने ही
यज्ञ किये, कितने ही धर्म-सबधी कार्य किये और सुख-समृद्धि प्राप्त की । मैने गुरुओ से
प्रार्थना की, परन्तु उनकी कृपा न रहने से यह धर्म-कार्य पूर्ण नही हो सका । दैव-वल के
अभाव में पुरुषार्थ में भी दोष आ जाता है । हे अनघ, आप मेरे लिए ईश्वर-तुल्य है ।
किसी भी प्रकार आप मेरी रक्षा कीजिए ।'
“तव विश्वामित्र ने उसे देखकर कहा—'हे राजन्, अब तुम दुःख मत करो । तुम्हें
दीन जानकर मैं त्रिकरण शुद्धि (पवित्र मन, वचन एव शरीर) से तुम्हें शरण दे रहा हूँ ।
में मुनियो को बुलाकर तुमसे यज्ञ कराऊँगा और तुम्हें सशरीर स्वर्ग भेजूँगा, जिससे तुम्हारी
प्रतिज्ञा झूठी न हो । मैं तुम्हें पवित्र वनाऊँगा ।' इस प्रकार कहकर उन्होने अपने शिष्यो
से कहा—'तुम लोग तुरत जाओ और त्रिशकु के यज्ञ के लिए ऋत्विजो तथा मुनियो को
लेकर शीघ्र आओ ।'
सभी शिष्य तुरत गये और श्रेष्ठ मुनियो को साथ लिये हुए विश्वामित्र के पास
आकर बोले—'हे अनघात्मा, हम सभी मुनियो को वडी प्रसन्नता से ले आये है । वसिष्ठ के

आश्रम के मुनियो के अतिरिक्त शेष सभी मुनि आ गये है । वसिष्ठ के पुत्रो ने जो
जो अपशब्द कहे, उन्हें सुन लीजिए । उन्होने कहा—'यह कितने आश्चर्य की बात है कि यज्ञ
करानेवाला एक राजा है और यज्ञकर्त्ता एक चाडाल । भला चाडाल के यज्ञ में भाग लेने-
वाले मुनि किस प्रकार वहाँ भोजन करेंगे ? देवता अपने हविर्भाग लेने किस मुंह से
आयेंगे ? विश्वामित्र की शरण प्राप्त करने-मात्र से कही नर स्वर्ग-लोक प्राप्त कर सकेगा ?'
"इन बातो को सुनकर विश्वामित्र क्रोध से जल उठे । बोले—'अत्यत निष्ठा के साथ
तपस्या करनेवाले मुझे, अपशब्द कहनेवाले सभी पापी ससार में सात सौ वर्ष तक राक्षस-
भाव धारण किये हुए, मानव तथा कुत्तो का मास खाते हुए, नीच होकर रहेंगे । दर्प से
मेरी निंदा करनेवाला वह महात्मा पृथ्वी पर निषाद होकर जन्म लेगा ।' इस प्रकार, शाप
देकर सयमी मुनियो को देखकर उन्होने कहा—'हे मुनियो, ये राजा त्रिशंकु उच्चकुलीन,
कीर्त्तिमान्, धर्मज्ञ तथा सत्यनिष्ठ है । इसलिए इनसे आप यज्ञ कराइए, जिससे ये शरीर के
साथ इद्रपुरी को जा सकें ।'
"ऋषि के वचन सुनकर वे सभी मुनि परस्पर यो विचार करने लगे—'यदि हम
गाधि-पुत्र के वचनो को टाल दें, तो वे क्रोध में आकर हमें घोर शाप देंगे । अत उनके
कहे अनुसार हम राजा से यज्ञ करायेंगे ।' यो सोचकर सभी मुनि यज्ञ-कर्म में लग गये ।
विश्वामित्र ऋत्विक् बने और मत्रो के उच्चारण के साथ उन्होने यज्ञ-भाग लेने के लिए
देवताओ का आह्वान किया । देवताओ ने उच्च स्वर में कहा कि हम नही आयेंगे ।
"तब क्रोधाग्नि से भभकते हुए, कुश की पवित्री हाथ में लिये हुए, स्रुवा उठाकर
कौशिक ने कहा—'हे त्रिशंकु यदि मैने बाल्यावस्था से नियमो का पालन करते हुए तप
किया हो, तो तुम सशरीर स्वर्गलोक में पहुँच जाओगे । अब तुम जाओ ।'
"इसपर त्रिशंकु स्वर्ग में पहुँच गया । किन्तु (वहाँ जाने पर) इन्द्र ने कहा—'तुम
चाण्डाल हो, हम तुम्हें यहाँ रहने नही देंगे ।' और उसने त्रिशंकु को स्वर्ग से नीचे ढकेल
दिया ।
"त्रिशंकु सिर के बल नीचे की ओर गिरते हुए चिल्लाने लगा—'हे विश्वामित्र,
मेरी रक्षा कीजिए, मेरी रक्षा कीजिए ।' तब विश्वामित्र का हृदय दया से भर गया ।
उन्होने कहा—'हे राजन्, तुम आकाश में ही ठहर जाओ ।' यो कहकर उन्होने त्रिशंकु
को आकाश में ही ठहरा दिया और बडे क्रोध में आकर इन्द्र से प्रतिरोध लेने के उद्देश्य
से उन्होने दक्षिण दिशा में अपर स्वर्ग का निर्माण किया । उसमें उन्होने (नये) सप्त
ऋषियो तथा नक्षत्रो का सर्जन किया । इतना ही नही, वे उस स्वर्ग में दूसरे देवताओ
तथा अपर इद्र को भी उत्पन्न करने का सकल्प मन-ही-मन करने लगे ।
"यह समाचार मिलते ही सभी मुनि तथा देवता विश्वामित्र के पास आकर बोले—
'हे मुनिनाथ, यह त्रिशंकु गुरु के शाप से पीडित है । यह स्वर्ग में रहने योग्य नही है ।'
इस पर विश्वामित्र ने कहा—'हे देवताओ मैने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेजने का वचन
दिया है । मेरा वचन व्यर्थ नही होना चाहिए । इसलिए इस राजा को इसी स्वर्ग में रहने दो ।
जवतक यह ससार रहेगा, ये नक्षत्र, देवलोक से भी ऊपर आसमान में तेज से प्रकाश-
७

५० रंगनाथ रामायण
मान रहेंगे । उन नक्षत्रो के बीच त्रिशंकु को इसी दशा में (सिर नीचा किये) देवतायो
के समान रहने दो और पुण्यात्मा तथा यशस्वी बनने दो ।' इस व्यवस्था को स्वीकार कर
मुनि तथा देवता विश्वामित्र की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थान को लौट गये ।
"तब विश्वामित्र ने (अपने आश्रम के) मुनियो को देखकर कहा—'यह स्थान अब
तपस्या के लिए उपयुक्त नहीं है । यहाँ अब लोगों की भीड़ एकत्र होने लगी है । अत
हम यहाँ से किसी दूसरे स्थान में चले जायेंगे ।' यो कहकर वे उस स्थान को छोड़कर (पश्चिम
दिशा में) विशाला के निकट पुष्कर-तीर्थ में जा पहुँचे । वहाँ केवल जल और फल का
ही आहार करते हुए बहुत वर्ष तक वे तपस्या करते रहे ।
"उस समय अयोध्या के राजा, मन्मथ के समान रूपवान् अंबरीष ने एक यज्ञ करने
का निश्चय किया । उस यज्ञाश्व को इन्द्र ने चुरा लिया । राजा ने यज्ञाश्व को कई
स्थानो में ढूंढ़ा, किन्तु अश्व के न मिलने से उसके प्रायश्चित्त-स्वरूप विधि पूरी करने के
निमित्त नर-पशु की माँग करते हुए वह कई आश्रमों में गया । निदान भृगुतुंग में अत्यंत
तपोनिष्ठा में संलग्न ऋचि नामक मुनि के पास पहुँचकर राजा ने मुनि को प्रणाम करके
कहा—'हे करुणानिधि, मैंने यज्ञ करने का यत्न किया था, किन्तु यज्ञाश्व कही खो गया है ।
आप कृपया अपने एक पुत्र को यज्ञ-पशु के रूप में मुझे दें । उसके बदले में एक लाख
गायें मै आपको दूंगा ।' तब मुनि ने कहा—'मैं अपने ज्येष्ठ पुत्र से अत्यधिक स्नेह रखता हूं
इसलिए मै उसको नहीं दे सकता ।' तब मुनिपत्नी ने कहा—'मै कनिष्ठ को बहुत
चाहती हूँ । मैं उसे दे नही सकती ।' उन दोनो की बातें सुनकर शुनःशेप ने राजा से
कहा—'ज्येष्ठ पुत्र को मेरे पिता चाहते है और कनिष्ठ पुत्र को मेरी माता चाहती है ।
अत. उनकी बात छोड़ दीजिए, मैं आप के साथ चलूँगा । इसके लिए आप मेरे माता-
पिता को सहस्र गायें दीजिए ।' राजा ने वैसा ही किया और शुनःशेप को रथ पर बिठा-
कर शीघ्र वहाँ से चल दिया ।
"इस प्रकार राजा शुनःशेप को साथ लेकर पुष्कर-प्रदेश में स्थित आश्रम में पहुँचा ।
वहाँ अमित तपोनिष्ठा में लीन, अचल रीति से तपस्या करनेवाले अपने मामा विश्वामित्र
को देखकर शुनःशेप ने उनको प्रणाम किया और कहा—'हे अनघ, मेरे माता-पिता ने मुझे
इस राजा को यज्ञ-पशु के रूप में बेच दिया है । आप कृपया इस राजा के यज्ञ को सफल
बनाकर मेरे प्राणो की रक्षा कीजिए । आज आप ही मेरे माता, पिता, गुरु और बंधु हैं ।'
"इस प्रकार अत्यंत दीन होकर जब शुनःशेप ने कहा, तब विश्वामित्र ने अपने पुत्रो
को संबोधित करके कहा—'पुण्यात्मा लोग परलोक में सुगति प्राप्त करने के लिए ही पुत्र
उत्पन्न करते है । इस बालक ने मेरी शरण ली है, इसलिए इसकी प्राण-रक्षा करना ही
अब मेरे लिए स्वर्ग है । यह मेरा भानजा है । तुम लोग इसकी रक्षा करो और तुममें से
कोई इसके लिए अपने प्राण दो ।'
"मुनि-पुत्रों में से कोई भी उनका आदेश पालन करने के लिए संनद्ध नहीं हुआ, तब
अत्यंत क्रुद्ध होकर मुनि ने उन्हें शाप दिया—'तुम एक हजार वर्ष तक कुत्ते का मास
खाते हुए दुःख भोगो ।'

बालकांड ५९
“इसके पश्चात् विश्वामित्र ने उस शुन शेप को बडे प्रेम से अपने पास बुलाकर
कहा--'मै तुम्हें दो मंत्र देता हूँ । तुम सतत उनका जप करते रहो । वे (मंत्र) तुम्हारी
रक्षा करेंगे और अवरीष का यज्ञ भी सफल हो जायगा ।' यो कहते हुए उन्होने उसे दो
मंत्रो का उपदेश किया ।
“दूसरे दिन राजा अपनी यज्ञ-भूमि में पहुँच गया । उसने उस निर्मल आत्मा (शुन -
शेप) की पूजा आदि करके उसे यूपकाष्ठ से बाँध दिया । तब वह मुनि-पुत्र अत्यत शात
तथा निश्चल चित्त से उन मंत्रो का जप करने लगा । तब देवेन्द्र ने वहाँ आकर अवरीष
का यज्ञ सफल बनाया तथा रुचि मुनि के पुत्र को चिरंजीवी बनाकर देवताओ के साथ
(अपने लोक में) चला गया ।
“एक हजार वर्ष तक घोर तप करने के उपरान्त ब्रह्मा ने विश्वामित्र को दर्शन दिये,
और बोले—'तुम्हारी तपस्या सफल हुई । तुम्हें ऋषित्व प्राप्त हो गया ।'
“उनके चले जाने के पश्चात् भी विश्वामित्र अत्यत निष्ठा के साथ तपस्या करने
में ही संलग्न रहे । तब कामरूप धारण करने में चतुर, कामदेव का कमनीय वाण ही
अप्सरा के रूप में प्रकट हुआ हो, ऐसा दिखाई देनेवाला ललित योवन-कला-विलास से युक्त
मेनका (अप्सरा) जलक्रीडा करके वहाँ आई । उसका जूडा शिथिल हो रहा था । मनोहर
नेत्र, स्निग्ध कपोल, मंत्रमुग्ध करनेवाला मुख, माणिक्य के-से ओठ, मधुर-मद मुस्कान, स्वर्ण
कलश के समान कुच, सोलहो कलाओ से परिपूर्ण काति, स्वर्ण-चूर्ण झरनेवाले बाहुमूल,
ललित रोमराजि, सिंह की-सी कटि, पुन्नाग के पुष्प के सदृश नाभि, गुरु नितब, तथा काम-
विकारो को उद्दीपन करनेवाले ऊरुभाग से युक्त वह सुदरी विश्वामित्र के सामने उपस्थित हुई ।
अपने शरीर

५२ रंगनाथ रामायण
वायु-भक्षण करते हुए ग्रीष्म ऋतु में, आश्रम के बाहर, तथा जाड़े में जल-कुण्डों में खड़े
रहकर अत्यंत उग्र तप करने लगे ।
“इस प्रकार एक हजार वर्ष व्यतीत हो गये । एक दिन इन्द्र ने रंभा को देखकर
कहा—'हे सुंदरी, मैं तुमसे एक ऐसा कार्य कहूँगा, जिसमें देवताओं का हित निहित है ।
किसी तरह तुम कौशिक को काम-पीड़ित करके उनके तप में विघ्न डालो ।' तब रंभा ने
कहा—'हे देव, कौशिक क्रोध में मुझे शाप दे देंगे । इसीका मुझे भय होता है ।
ऐसे उग्र तप में लीन उस मुनि के पास पहुँचना क्या मेरे लिए संभव है ? हे शचीनाथ,
मैं आपसे क्षमा चाहती हूँ । मैं ऐसे महामूर्ख की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देख सकती,
आपके चरणों की सौगंध खाकर कहती हूँ । ऐसा मूर्ख कौन होगा, जो जान-बूझकर आग में
कूद पड़े ?'
यह सुनकर इन्द्र ने कहा—'यदि तुम्हें इतना भय है, तो मन्मथ और वसंत भी
तुम्हारे साथ जायेंगे, तुम जाओ ।' इन्द्र की इच्छा की अवहेलना न कर सकने के कारण वह
[L14

बालकांड ५३
कौशिक वडे उत्साह से उग्र तप कर रहे हैं । उनका मनोरथ पूर्ण करके यदि उनकी तपस्या
को बद नहीं करायेंगे, तो उस पुण्यात्मा विश्वामित्र के तप से उत्पन्न अग्नि से सभी लोक
भस्म हो जायेंगे ।'
“उनकी बातें सुनकर ब्रह्मा उनको साथ लिये हुए विश्वामित्र के पास आये और
बोले—'हे कौशिक सुनो । अब इस उग्र तप की आवश्यकता नहीं है । आज से तुम
ब्रह्मर्षि हो गये ।'
“तब कौशिक ने ब्रह्मा आदि देवताओ को देखकर वडी भवित तथा आश्चर्य के साथ
कहा—'यदि मैंने सच ही ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त कर लिया है, तो ब्रह्मा के पुत्र, चिर-
पुण्यात्मा, लोक-पावन वसिष्ठ आकर मुझे ब्रह्मर्षि कहें । तभी मैं विश्वास करूँगा ।'
“तब ब्रह्मा तथा देवताओ की प्रार्थना पर वसिष्ठ वहाँ आये और बोले—'अपने
उग्र तप से तुम ब्रह्मर्षि हो गये, इसमें कोई सदेह नहीं है । तुम प्रसन्न होकर जा सकते हो ।'
तब विश्वामित्र ने वडी भक्ति से वसिष्ठ की पूजा की । सभी देवता विश्वामित्र को आशीर्वाद
देकर देवलोक को चले गये ।
“विश्वामित्र की महिमा इन अद्भुत कार्यों

५४ रंगनाथ रामायण
हो गई । यह देखकर इस पृथ्वी के कई नरेशो ने उस कन्या के साथ विवाह करने की
प्रार्थना की । तब मैंने उन से कहा--'इस चन्द्रमुखी को प्राप्त करने के लिए एक कन्या-
शुल्क नियत है । (वह शुल्क) यह शिव-धनुष है । जो नरेश इस धनुष पर प्रत्यचा चढाकर
अपने भुज-बल का परिचय देगा, उसी को में अपनी पुत्री बडे हर्ष से दूंगा ।' बहुत-से
राजा आये, किन्तु कितने ही राजा उस धनुष को उठाने में भी असमर्थ होने के कारण
लज्जा से अपना सिर भी न उठा सके । इसलिए उन राजाओ ने सोचा--'पुत्री को देने
का वचन देकर, कोदण्ड का दुस्साध्य प्रतिबन्ध लगाकर जनक ने हमें अच्छी तरह भ्रम में
डाल दिया है । हम उन्हें युद्ध में परास्त करके उनसे प्रतिशोध लेंगे ।' इस प्रकार सोचकर
वे अपनी विशाल सेना के साथ एक वर्ष तक हमारे किले पर घेरा डाले रहे । जो अन्न
तथा खाद्य-सामग्री हमने पूर्व से किले में संचित करके रखी थी, सब समाप्त हो गई ।
अतः मैंने मन में विचार करके देवताओं की प्रार्थना की । उनकी कृपा से प्राप्त चतुरंगिनी
सेना के साथ मैंने शत्रु-सेना पर आक्रमण किया । इस सेना का सामना न कर सकने
के कारण कुछ लोग भीत होकर भाग खड़े हुए तथा कुछ मेरे साथ घोर युद्ध करके
हार गये और तितर-बितर हो गये । यदि राम अपनी आश्चर्यजनक शक्ति से उस शिव-
धनुष का संधान कर सकें, तो मे अपनी पुत्री का विवाह उनके साथ कर दूंगा ।"
३३ शिव-धनुर्भंग
इसके पश्चात् जनक ने धनुष की पेटी ले आने के लिए दस हजार बलिष्ठ सेवकों
को भेजा । वह लोहे की पेटी बहुत ही विशाल तथा आठ पहियों से युक्त थी । वे सभी
बलवान् उस पेटी को अपना सारा बल लगाकर इस प्रकार खींचकर लाने लगे, मानो मेरु
पर्वत को ही लिये आ रहे हों । यह देखकर जनक के अन्त पुर के परिचारक तथा परि-
चारिकाएँ, जानकी, उर्मिला तथा जनक की पत्नी के निकट जाकर बोलीं--“देवियो, हमारा
एक निवेदन सुनें । हमारी राज-सभा में गाधि-पुत्र कौशिक के साथ दो आजानुबाहु, देवों
तथा गंधर्वों से भी अधिक तेजस्वी, दो उत्तम नर-रत्नों को आया हुआ देखकर महाराज
जनक ने मुनि से प्रश्न किया कि ये कौन हैं ? तब कौशिक ने अत्यन्त हर्ष से कहा- 'हे
राजन्, ये दशरथ के पुत्र हैं । शिव-धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए यहाँ आये हैं ।
इसलिए आप योग्य व्यक्तियों को भेजकर धनुष को मँगवाइए ।' तब राजा ने अपने मंत्रियों
को बुलाकर धनुष को लाने के लिए भेजा है । हम वह दृश्य गवाक्ष से देख सकती हैं ।
आप भी शीघ्र चलकर देखिए ।"
परिचारिकाएँ जब राम के कुल, रूप, शौर्य तथा गुणों का वर्णन कर रही थीं,
तब सीता को ऐसा भान हो रहा था, मानो उनके कानों में सुधा की वर्षा हो रही हो ।
उन्हें रोमांच हो आया । उन्हें प्रीति तथा भय का अनुभव होने लगा । वे सिर झुकाये
खड़ी रहीं । लज्जा से अभिभूत उस सुन्दरी को चुपचाप खड़ी देखकर सखियाँ उनकी परि-
चर्या करने लगीं । गुलाब-जल में कुंकुम घोलकर एक ने उनके कपोलों पर सुन्दर ढंग से
'मकरिका-पत्र' की रचना की (चित्र बनाये) । दूसरी ने जवादियुक्त चंदन का लेप किया ।
एक दूसरी परिचारिका ने माथे पर कस्तूरी का तिलक लगाया और एक उनके सामने

दर्पण लिये खडी रही । एक युवती ने उनके केशो को कघा करके उनका जूड़ा बाँध दिया,
तो अन्य एक ने उसे निराले ढंग से पुष्पो से अलकृत कर दिया । एक रमणी ने उन्हें
सुगधित बीडा दिया । किसी ने उनकी कटि-तट पर किकिणियुक्त करधनी बाँधी, तो किसी
सुन्दरी ने उनके कुचो पर डोलनेवाले मोतियो के हार पहनाये । एक सखी ने चद्र-कान्ति-
सम धवल वस्त्र उन्हें उत्तम ढंग से पहनाये । इस प्रकार सभी सखियाँ सीता को एक स्वर्ण-
पीठ पर बिठाकर उनका अलकरण कर रही थी । अलकरण समाप्त होते ही जनक की
पत्नी उस कल्याणी राजकुमारी को साथ लेकर कनक-सौध के गवाक्ष के निकट आई ।
उन सब रमणियो के मन में 'सूर्यवश में उत्पन्न राघव को कब देखेंगे' ऐसा कुतूहल भरा था ।
उन्होने गवाक्ष से लोकाभिराम दिव्य धाम, अत्यत रूपवान्, विष्णु के समान तेजस्वी,
धनुर्धर, प्रत्यचा के चिह्न से अकित कर-कमलवाले राम को देखा । उनको देखकर सखियाँ
मन-ही-मन सोचने लगी, रूप और रग में ये अद्वितीय है । ये विष्णु के अशज है और
राजपुत्रो के रूप में जन्मे हैं । जानकी रामचन्द्र के लिए योग्य है और उर्मिला सौमित्र
के लिए । इस प्रकार सोचती हुई वे अत्यन्त आसक्ति के साथ सभा की ओर देखती
रही ।
इन्द्र-सभा के समान सुशोभित उस राज-सभा में धनुष की पेटी लाई गई । तब
महाराज जनक ने शुभमूर्ति गाधि-पुत्र को देखकर कहा—'हे मुनि, किन्नर, यक्ष, गधर्व,
देवता, पन्नग, तथा राक्षस आदियो में से कोई इस धनुष की डोरी को न चढा सका ।
फिर नरो की कौन कहे ? यह धनुष आप राम-लक्ष्मण को दिखाइए ।' तब मुनि ने
रामचन्द्र की ओर देखकर कहा—'हे रघुवश के वीर, इस महान् धनुष को उठाकर उसकी
प्रत्यचा चढा दो । आदिवराह का अवतार लेकर समस्त भूतल को सहज ही उठाकर अपनी
शक्ति का परिचय देनेवाले तुम्हारे लिए यह धनुष क्या वस्तु है ?'
इस प्रकार मुनि का आदेश प्राप्त करके राम, लक्ष्मण के साथ उठे । उनके मन में
प्रेम तथा उमग का सघर्ष हो रहा था । उन्होने अपना दुकूल उतार दिया और कमरवन्द
कसकर बाँधा । उस समय उनके मोहक रूप की काति सभी दिशाओ में बिखर रही थी ।
उस कमल-लोचन तथा अद्वितीय साहसी की करधनी की छोटी-छोटी घटिकाओ का सौदर्य
अद्भुत था । उनकी नव-रत्नमालिका वाहुओ तक डोल रही थी । उनके ककण और
अँगूठियो की काति चारो ओर छिटक रही थी । कर्णभूषणो की काति स्निग्ध कपोलो पर
प्रकाशित हो रही थी । उनके केश पीठ पर नृत्य कर रहे थे और कनक वर्णवाला उनका
शरीर चारो ओर अपनी आभा विकीर्ण कर रहा था । करोडो मन्मथो का-सा सौदर्य
लिये हुए वे मनुवश-तिलक गभीर गति से जनक की सभा में सब के सम्मुख आये और
धनुष की पेटी खोली । समस्त धरा को अपने ऊपर धारणकर चिरनिद्रा में सुख से सोने-
वाले शेषनाग के समान, काले वादलो के मध्य अपनी पूरी कान्ति को समेटकर अचल भाव
से रहनेवाले विद्युत्-दड के समान अनुपम सौदर्य से समन्वित धनुष को राम ने पेटी में से उठाया ।
वह अनुपम धनुष अरुण रत्न-प्रभा की-सी दीप्ति विखेरनेवाली अग्नि-ज्वाला के समान
ऐसा खडा था, मानो वह उसे उठाने के लिए वडे गर्व के साथ प्रयत्न करनेवाले राजकुमारो के

५६ रंगनाथ रामायण
बल को आहुति के रूप में निगलने के लिए उद्यत हो । राम जब उस धनुष की डोरी
चढ़ाने का उपक्रम करने लगे, तब विश्वामित्र बोले—‘राम अपनी समस्त शक्ति से सपन्न
होकर शिवजी के धनुष की प्रत्यच्च चढ़ा रहे हैं । हे धरती, तुम दोलायमान मत होओ ।
हे शेषनाग, तुम विचलित मत होओ । हे दिग्गजो, तुम सावधान रहो ।'
इसी समय राघव ने धनुष की डोरी चढ़ाई और अपने भुज-बल का परिचय दिया ।
वे जनक से बोले—‘हे भूपाल, यह धनुष बहुत ही पुराना, कमजोर, और घटिया है ।
यदि वाण का सधान किया जाय, तो यह टिक नही सकेगा । इसी धनुष की आपने इतनी
प्रशसा की थी ?'
इस प्रकार कहते हुए (राम ने) सुर, खेचर, भूसुर, किन्नर, नर तथा नृपतियों के
समक्ष धनुष की ऐसी टंकार की, मानो वह सब दिशाओ में उनकी विजय की घोषणा कर
रही हो । इसके पश्चात् उन्होंने चाप के गुण को (धनुष की प्रत्यचा को) आकर्णात् इस
प्रकार खींचा, मानो सीता के गुण उनके कानो तक पहुँच गये हो । (फिर) उन्होंने
अपनी मुट्ठी की पकड़ इस तरह ढीली कर दी, जैसे राक्षसो की पकड़ (शक्ति) ढीली
पड़ गई हो । तुरंत वह धनुष अरराकर टूट गया । दिशाएँ उस ध्वनि से गूँज उठीं ।
धनुष के टूटते ही सभी राजाओ का अभिमान भी चूर-चूर हो गया, सारी पृथ्वी में दरारें
पड़ गईं, दिग्गज कुचल गये, शेषनाग धँस गया, समस्त भूत भीत हो गये और सभी
लोक थर्रा उठे । उस कठोर ध्वनि को सुनते ही जनक, राम, लक्ष्मण तथा विश्वामित्र को
छोड़कर शेष सभी लोग मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े । जनक महाराज हर्ष तथा
विस्मय के साथ कौशिक को देखकर बोले—‘मैं अपने वचन के अनुसार विना विलव के '
ही अपनी पुत्री का विवाह इस महान् व्यक्ति से कर दूँगा । महाराज दशरथ को विवाह
के लिए सादर निमत्रण भेजूँगा ।'
इस प्रकार कहने के पश्चात् उन्होंने तुरंत अपने प्रिय मंत्रियो को बुलाकर दशरथ
को सारा समाचार सुनाकर उन्हें शीघ्र लिवा लाने के लिए भेजा । वे भी जवनाश्वो (तेज
घोड़ो) पर रवाना हुए और तीन दिन की यात्रा के उपरान्त साकेत (अयोध्या) पहुँच गये ।
वहाँ अपने पुत्रो की कुशल की चिंता में निमग्न राजा (दशरथ) को देखकर जनक के
मंत्री बोले—‘हे राजश्रेष्ठ, आपके पुत्र शौर्यनिधि रामचन्द्र ने कौशिक मुनि के यज्ञ की रक्षा
की और जनक महाराज का यज्ञ देखने (मिथिला) आये । वहाँ मुनि तथा अन्य राजाओ
के समक्ष उन्होंने उस शिव-धनुष का सधान करके उसे सहज ही तोड़ डाला, जिसे उठाना
सुरो तथा असुरो के लिए भी असंभव है । इसपर महाराज जनक ने अपनी पुत्री सीता का
विवाह राम के साथ करने का निश्चय किया है । उस विवाह में आपको सादर आमंत्रित
करने के लिए हमें भेजा है । इसलिए आप शीघ्र पधारें ।'
यह समाचार सुनकर राजा आनन्द-सागर में डूब गये । उन्होंने नगर-भर में विवाह
की सूचना देने के लिए दूत भेजे और महाराज जनक के मंत्रियो को श्रेष्ठ रत्न, आ

बालकांड ५७
तथा अपने अमात्यो को बडे आदर के साथ बुला भेजा और अत्यन्त नम्रता से बोले--
“राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ विदेह के घर में है । राम ने राजाओ की प्रशसा
प्राप्त करते हुए इन्दु-शेखर (शिव) का कठोर धनुष तोडा है । अत महाराज जनक ने
सीता का विवाह राम के साथ करने का निश्चय करके, विवाह के लिए हमें आमंत्रित करने
के लिए इन्हें (मंत्रियो को) भेजा है । क्या जनक के साथ (हमाग) सबंध प्रजा को
स्वीकृत होगा ?” तब सबने उस सबंध की प्रशसा की ।
दूसरे दिन वसिष्ठ आदि मुनियो, बधु-मित्र तथा अन्य राजाओ के साथ राजश्रेष्ठ
दशरथ ने रथ में बैठकर बडे आनन्द से मिथिला के लिए प्रस्थान किया । उनके साथ
रमणीय दिव्यावर, कमनीय रत्न-समूह, हाथी, रथ, तुरग तथा पदचर सेना, परम आप्त
मत्री तथा पवित्र स्त्रियो के समूह थे । राजा के पार्श्व में उनके पुत्र भरत तथा शत्रुघ्न
हाथियो पर, मोतियो के छत्र की छाया में चल रहे थे । मगल-वाद्यो के घन-नाद से
सभी दिशाएँ मुखरित हो रही थी । इस प्रकार, जहाँ-तहाँ ठहरते हुए, चार दिन की यात्रा
के पश्चात्, दशरथ (अपने परिवार के साथ) मिथिला पहुँच गये ।
तब महाराज जनक सूर्यवश में श्रेष्ठ राजा (दशरथ) की अगवानी करने आये और
बडे उत्साह एव आदर के साथ उन्हें ले जाकर उनका उचित रीति से आदर-सत्कार
किया । उसके बाद सभी मुनियो को प्रसन्न करते हुए वे बडे हर्ष से बोले--“महाराज,
अपनी पुत्री का विवाह आपके पुत्र के साथ करने का निश्चय करके मैने आपको निमंत्रित
किया है । आपके आगमन से मैं कृतार्थ हुआ । इन वसिष्ठ, वामदेव आदि मुनियो के
आगमन से मेरी इच्छाएँ पूर्ण हो गई । मेरा जन्म सफल हुआ । मेरा वश पवित्र हुआ ।
रविकुल के उत्तम नरेश के साथ सबंध करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ। कल ही विवाह का
शुभ मुहर्त्त है । आप अपने इष्ट-मित्रो को बुलाकर उचित तथा आवश्यक कार्य सपन्न कीजिए ।”
उनके वचन सुनकर दशरथ ने बडे प्रेम से कहा—‘ऐसा ही हो’ और जनक के
द्वारा सपन्न कराये गये जनवासे में प्रसन्न-चित्त से ठहरे । तब विश्वामित्र राम तथा लक्ष्मण
के साथ वहाँ आ पहुँचे । दशरथ ने उस मुनि को प्रणाम करके बडे विनय से कहा--“हे
अनघात्मा, आपकी कृपा से मैं धन्य हुआ ।” तब कौशिक बोले--“हे राजन्, तुम अकलक-
चरित्र हो । अपने पुण्य-कार्य से तुम पवित्र हो गये हो । रविकुलोत्तम राम को पुत्र के रूप
में प्राप्त करके तुम विशेष रूप से पवित्र हुए हो । उस दिन तुमने यज्ञ की रक्षा करने
के लिए सद्बुद्धि से अपने पुत्र राम-लक्ष्मण को मुझे दिया था । यह लो, तुम्हारे पुत्र कुशल-
मगल से है । उन्हें स्वीकार करो ।” इतने में दोनो (राम-लक्ष्मण) ने राजा को प्रणाम किया ।
राजा ने उन्हें आशीर्वाद देकर बडे स्नेह से गले लगा लिया ।
दशरथ उस दिन अपने नित्य-नैमित्तिक वैदिक कर्मों से निवृत्त हुए । दूसरे दिन
जनक अपने मंत्रियो के साथ विवाह-मडप में आ विराजे । अपने पुरोहित शतानन्द को
देखकर कहा—‘हे अनघात्मा, मेरे भाई कुशध्वज को भी इस विवाह में अवश्य आना
चाहिए । वह इक्षुमती के किनारे साकाश्यपुरी में रहता है ।' यो कहकर उन्होने (अपने
भाई को) बुला भेजा ।
८

बड़े कौतूहल के साथ कुशध्वज वहाँ आया और शतानन्द तथा महाराज जनक को
बड़ी श्रद्धा से प्रणाम किया और महाराज की आज्ञा पाकर उचित आसन पर बैठा । तब
जनक ने सुदामन नामक अपने मंत्री से कहा—'तुम शीघ्र जाकर महाराज दशरथ को
उनके सचिव, पुत्र, वसिष्ठ आदि मुनियो के साथ सादर लिवा लाओ ।' उसने दशरथ के सम्मुख
पहुँचकर निवेदन किया—'महाराज, राजा जनक ने मुझे आपकी सेवा में भेजा है । आप
कृपाकर अपने पुरोहित, पुत्र तथा अमात्यो के साथ विवाह-मंडप में पधारें ।' राजा दशरथ
सपरिवार वहाँ पहुँचे और (उचित आसन पर) आसीन होने के पश्चात् जनक से बोले—
'महाराज, हम इक्ष्वाकुओ के लिए मुनि वसिष्ठ गुरु तथा देवता हैं । वे सर्वज्ञ तथा
जितेन्द्रिय हैं । वे ही हमारे पुरोहित रहकर सस्कार करायेंगे ।'
३४ दशरथ का वंश-क्रम
तब मुनि वसिष्ठ दशरथ के वंश का वर्णन करते हुए कहने लगे—'हे राजन्, निर्गुण
ब्रह्म ने सगुण रूप धारण करके, अपनी लीला प्रसारित करने के निमित्त, अपने नाभि-कमल में
ब्रह्मा को उत्पन्न किया । इस प्रकार हरि के पुत्र ब्रह्मा उत्पन्न हुए । ब्रह्मा के पुत्र मरीचि हुए ।
मरीचि के पुत्र कश्यप हुए और उनसे सूर्य उत्पन्न हुआ । सूर्य का पुत्र था वैवस्वत मनु ।
उसका पुत्र इक्ष्वाकु नामक राजा बहुत विख्यात हुआ । इक्ष्वाकु का पुत्र कुक्षि हुआ,
और कुक्षि का पुत्र विकुक्षि उत्पन्न हुआ । विकुक्षि के पुत्र वाण के सनरप्य नामक पुत्र हुआ ।
उसके पृथु नामक पुत्र हुआ, जिसका पुत्र त्रिशंकु हुआ, जो बड़ा ही चतुर राजा था ।
उसके पुत्र हरिश्चन्द्र के रोहिताश्व नामक पुत्र हुआ, जिसका पुत्र दुदुमार हुआ । दुदुमार का
पुत्र युवनाश्व था, उसकी दो रूपवती रानियाँ थीं । किन्तु उसके संतान नहीं थी । इसलिए
राजा ने संतान की प्राप्ति की इच्छा से बहुत-से श्रेष्ठ मुनियो को बुला भेजा और उन
महान् आत्माओ की अर्घ्य-पाद्य आदि से पूजा की और उनसे निवेदन किया—'हे महात्माओ,
आप कृपा करके मुझे संतान-प्राप्ति का वर दीजिए ।' तब बड़ी प्रसन्नता से मुनि बोले—
'हे राजन्, तुम भक्ति-युक्त हो ऐन्द्र-यज्ञ करो, तो तुम्हें संतान-प्राप्ति होगी ।'
“राजा ने यज्ञ के लिए आवश्यक उपकरणो को तुरंत एकत्र कराया । संयमी
मुनियो ने बड़े हर्ष के साथ राजा के संतान-प्राप्ति हेतु ऐन्द्र नामक यज्ञ प्रारंभ किया ।
यज्ञ पूरा हुआ और मुनियो ने अभिमंत्रित जल मे पूर्ण कुंभो को यज्ञ-शाला में एक ओर रखा ।
उसी दिन रात्रि के समय राजा ने प्यास से पीड़ित होकर, भूल से यज्ञ-शाला में रखे हुए
कलशो में से लेकर अभिमंत्रित जल पी लिया ।
“(दूसरे दिन) जल-रहित कलशो को देखकर मुनि कहने लगे—‘कलशो का जल
किसने पी लिया ? जल कहाँ गया ?’ जब उन्होंने ध्यान लगाकर देखा, तब उन्हें ज्ञात हुआ
कि राजा ने ही जल पीया है । इस विचित्र दैव-माया को देखकर सभी मुनि आश्चर्य-
चकित हो गये । राजा ने गर्भ धारण किया और एक बालक को जन्म देकर मर गया । ऋषि अत्यन्त
दुःखी हुए और मंत्र शक्ति के प्रभाव से युवनाश्व को फिर सजीव बनाया । युवनाश्व जीवित हो उठा ।
“चक्रवर्त्ती के शुभ लक्षणो मे युक्त उस बालक को देखकर ऋषियो ने विचार किया
कि वह सप्तद्वीपो पर राज्य करेगा । इससे वे बहुत प्रसन्न हुए । युवनाश्व ने बड़े प्रेम से

बालकांड ५९
उन ऋषियो को अतुल धन देकर उनका सम्मान किया और वे विदा हुए । मातृहीन
वह शिशु भूख से व्याकुल होकर जब रोने लगा, तब इन्द्र वहाँ आया और उसकी भूख
मिटाने के लिए अपना अंगूठा उस शिशु के मुंह में दे दिया । शिशु उससे अमृत-पान करने लगा ।
सुधा-पान करने के कारण इन्द्र ने बुधजनो के द्वारा उस शुभलक्षण का नाम
मान्धाता रखवाया और इन्द्र-लोक को लौट गया ।
“मान्धाता पूर्ण-चन्द्रप्रभा-सम दीप्तिमान् होकर बढने लगा । यौवन के आते ही वह
अत्यन्त शौर्य-सपन्न हुआ और रावण आदि (बलशाली) राजाओ को कई युद्धो में परास्त कर
समस्त भूमडल का शासक बन बैठा । विष्णु की भक्ति करते हुए इन्द्र का वल प्राप्त करके
उसने बहुत-से यज्ञ किये । उस राजा के विमलागी नामक स्त्री से अत्यन्त तेजस्वी मुचुकुद
और सुसंधि नामक दो पुत्र और पचास पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं । कन्याओ के युवावस्था को
प्राप्त होते ही राजा ने उनका विवाह सौभरि नामक मुनि के साथ कर दिया । उन कन्याओ का
अग्रज हरि-भक्ति में जीवन व्यतीत करते हुए स्वर्ग सिधारा । उसके भाई सुसंधि ने पुण्य-
कार्य करते हुए (चिर काल तक) राज्य का पालन किया । उस सुसंधि के ध्रुवसंधि नामक
पुत्र उत्पन्न हुआ । उसके पुत्र प्रसेनजित् के भरत नामक पुत्र हुआ और भरत के असित
नामक पुत्र हुआ ।
“असित के राज्य-काल में अत्यत पराक्रमी हैहय-वश में भयंकर आकारवाला ताल-
जघ नामक वीर उत्पन्न हुआ । उसने असित के साथ घोर युद्ध किया और युद्ध में पराजित
करके उसका वध कर डाला । राजा की दोनो रानियो ने अत्यन्त दुःखी होकर
राज-काज का सारा भार मन्त्रियो को सौंप दिया और शान्ति से जीवन विताने लगी । उन दोनो
रानियो में कालिंदी नामक रानी गर्भवती थी । सौतिया डाह के कारण दूसरी रानी से
यह सहा नही गया और उसने उस गर्भ को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से विष का प्रयोग किया ।
विष-प्रयोग से गर्भ-पात तो नही हुआ, किन्तु उसके प्रभाव से वह कड़ी वेदना का
अनुभव करने लगी । तब कालिंदी हिमालय में च्यवन ऋषि के यहाँ गई और वडी
भक्ति से उन्हें प्रणाम करके अपना सारा वृत्तान्त कह सुनाया । मुनि ने उसके दुःख की कथा
सुनकर कहा-'बेटी, तुम मेरी पुत्री के समान हो, डरने की कोई बात नही है ।' उन्होने
उसे स्नेह से उठाया और अपनी दिव्य-दृष्टि से सारी स्थिति को समझकर कहा-‘हे
कालिंदी, तुम्हारे अत्यत धार्मिक, अतुल तेजस्वी, महान् चेता, कीर्त्तिवान्, वंशोद्धारक, रूपवान्
तथा शत्रुदमन पुत्र उत्पन्न होगा ।' इस प्रकार मुनि का आशीर्वाद प्राप्त करने के पश्चात्
वह रमणी मुनि को प्रणाम करके अपने घर लौटकर प्रसन्न-चित्त रहने लगी ।
“निदान शुभ मुहूर्त्त में उस शुभागी के एक पुत्र उत्पन्न हुआ। कालिंदी अत्यन्त हर्षित हुई। वह
अपने शत्रुओ का दमन करके वडे आनन्द से राज करने लगा । उसका नाम सगर था। उसका पुत्र
असमंजस था। असमंजस का पुत्र अंशुमान था, जिसका पुत्र राजा दिलीप था। दिलीप के पुत्र पुण्यात्मा
भगीरथ थे, जिन्हें ककुत्स्थ नामक पुत्र हुआ। उसके पुत्र रघु महाराज के पुरुषादक नामक पुत्र हुआ ।
उसके उज्ज्वल कीर्त्तिमान् नामक पुत्र हुआ । उसके पुत्र शश्वण था, जिसके पुत्र सुदर्शन के अग्निवर्ण नामक
पुत्र हुआ, जिसका पुत्र ऋतुपर्ण था। ऋतुपर्ण का पुत्र मरु था और उसका पुत्र शीघ्रग था। शीघ्रग के

६० रंगनाथ रामायण
पुत्र मनु के अवरीष नामक पुत्र हुआ । अवरीष का पुत्र जनवदित नहुष था, जिसका पुत्र
ययाति नामक वीर था । ययाति के पुत्र नाभाग था और उसका पुत्र अज था । अज के
पुत्र ही ये दशरथ हैं, जो पुण्यात्मा तथा सफल मनोरथ हैं । इन्ही दशरथ के पुत्र राम हैं ।
इनके विषय में अधिक क्या कहूँ ? इनके पुत्र को ही तुमने अपनी पुत्री देने का
निश्चय किया है । तुम कृतकृत्य हो । तुम्हारा वंश (इससे) मंगलमय हुआ ।
इस प्रकार वसिष्ठ को रघुवंश की प्रशंसा करते हुए सुनकर पवित्रात्मा शतानन्द जनक
की अनुमति लेकर बड़े हर्ष से सभी सभासदों के सुनते हुए यों कहने लगे—'हे मुनीन्द्र,
हमने बड़े हर्ष से अनघात्मा दशरथ के वंश-क्रम का वर्णन आपसे सुना । मैं अब आपको
प्रशंसनीय जनक की वंशावली सुनाऊँगा ।"
३५ राजा जनक की वंशावली
“द्विजो तथा परमहंसो के जन्मदाता अद्वितीय ब्रह्म अच्युत के नाभि-कमल में ब्रह्मा का जन्म हुआ
और उनका पुत्र हुआ मरीचि । मरीचि का पुत्र कश्यप था । कश्यप के सूर्य उत्पन्न हुआ ।
उनका पुत्र था मतिमान्, जिसके मनु नामक पुत्र हुआ । मनु ने ध्यान-मग्न अवस्था में कभी छींका,
तो (उस छींक से) वैवस्वत का जन्म हुआ । उस वैवस्वत का पुत्र निमि था, जो निर्मल
आचारवान्, नीतिकोविद, धर्मनिरत, विमल मूर्तिमान् तथा यशस्वी था । उसका पुत्र मिथि था,
जिसके जनक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । जनक के उदावसु नामक पुत्र हुआ, जिसका
पुत्र नन्दिवर्द्धन था । नन्दिवर्द्धन का पुत्र सुकेतु था, जिसका पुत्र देवरात था । देव-
रात के वृहद्रथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके महाविभु नामक पुत्र था । महाविभु का पुत्र
सुवृति था, सुधृति का पुत्र धृष्टकेतु और उसका पुत्र हर्यश्व था । हर्यश्व के मरु नामक
पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके प्रतीक्षक नामक पुत्र हुआ । प्रतीक्षक का पुत्र कीर्तिरथ था, जिसके
देवमीढ नामक पुत्र हुआ । देवमीढ का पुत्र विबुध और विबुध का पुत्र महाध्रक था ।
महाध्रक के कीर्तिरात नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र महारोम था । महारोम के स्वर्ण-
रोम नामक पुत्र हुआ, जिसके ह्रस्वरोम नामक गुणवान् पुत्र हुआ । ह्रस्वरोम के दो पुत्र हुए
—महाराज जनक और कुशध्वज । ये दोनों सौजन्य की मूर्ति हैं । जब जनक महाराज राज्य
करते थे, तब सांकाश्य का पराक्रमी राजा सुधन्वा अपनी सेना के साथ आया और मिथिला
तथा सीता-समेत शिव का धनुष माँगते हुए एक दूत भेजा । जब उसकी माँग की उपेक्षा
कर दी गई, तब उसने शिव-धनुष तथा सीता को प्राप्त करने के लिए घोर युद्ध किया ।
जनक ने युद्ध-भूमि में उसका संहार किया और अपने अनुज को उस राज्य का राजा बनाया ।
जनक से लेकर उस वंश में उत्पन्न सभी राजाओं के नाम जनक के कारण प्रशस्त हो गये हैं ।
निमि-वंश में जन्म लेनेवाले सभी नरेश योग-ज्ञान-सम्पन्न तथा चिरजीवी
होते हैं ।”
इस प्रकार, जनक के वंश के सदाचरण तथा सीता के सद्गुणों की प्रशंसा करने के
पश्चात्, अत्यंत प्रतापी तथा विमल-भाषी दशरथ को संबोधित करके (शतानन्द ने) कहा—
'हे महाराज आप अपने नित्य अभिराम पुत्र राम का विवाह सीता के साथ संपन्न करके
चिर-कीर्ति प्राप्त कीजिए।'

दशरथ ने इन बातो को सुनकर वडे उत्साह से वसिष्ठ तथा गाधि-पुत्र को देखकर
कहा—'आप जनक महाराज से कहिए कि वे उर्मिला का विवाह सौमित्र से तथा राजा
कुशध्वज की कन्याओ का विवाह उत्तम गुण-सपन्न भरत तथा शत्रुघ्न के साथ कर दें ।'
तब उन्होने राजा जनक को सारी बातें कह सुनाई और उनकी सम्मति प्राप्त करके वडे
हर्ष से राजा दशरथ को जनक की स्वीकृति कह सुनाई ।
दूसरे दिन विवाह के लिए अनुकूल शुभ लग्न था । अत जनक ने उत्तर फाल्गुनी
नक्षत्र में विवाह का शुभ-मुहूर्त्त ठहराया और नगर तथा अत पुर को सजाने के लिए परि-
चारको को भेजा । उन्होने चदन-कस्तूरी-मिश्रित जल से (नगर के) मार्गों पर छिडकाव
करके उन्हें सुगधमय बनाया । चीनाशुको (रेशमी वस्त्र) के वितान सजाये, मणि-तोरण-
ध्वजाओ से सारा नगर अलकृत किया, फलो के भार से अवनत कदली के पेडों तथा सुपारी
के पत्तो से प्रत्येक घर तथा कक्षो के द्वारो को सजाया और विशाल चबूतरो को जवादि
से लीपकर उनपर चौक पूरे । मणिकचन-कलशो से युक्त सौधो के गोपुरो का समूह
अगणित सूर्यो का भ्रम उत्पन्न कर रहा था । सारा नगर मणि-दीपो, वारभी (धूप) के
धुएँ तथा पुष्प-कलापो का भार वहन कर रहा था । इस प्रकार नगर को अलंकृत करने
के पश्चात् उन्होने अत पुर को बडी निपुणता से सजाया । फिर उन्होने शिल्पकारो द्वारा
विवाह-वेदी का निर्माण कराने का आदेश दिया । शिल्पकारो ने मरकत की भूमि पर सोने
के स्तम्भ स्थापित किये, उनपर नीलमणि के कार्निस लगाये और उनपर माणिक्य की धरन
(शहतीर) बैठाई । सुदर ढंग से नक्काशी करके बनाये गोमेदक के छज्जे बनाये और
ऊपर वज्र (हीरे) का गारा किया । (उस मडप के) चार विशाल किवाड बनाये गये, जो
मणि तथा स्वर्ण के बने थे । (मण्डप में) सोने के सुन्दर चित्र बनाये गये । नीलमणि
के हाथी तथा स्फटिक के सिंहो से सुसज्जित सोपान रचे गये । उशीर (खस) का विशाल शामियाना
बनाया गया, जिसके मध्य में फूलो की लडियाँ लटकाई गईं । विवाह के लिए
मरकत की वेदी बनाई गई। उसे कस्तूरी से लीपकर उसपर मोतियो के चौक पूरे गये ।
इस प्रकार सुसज्जित वह विवाह-मण्डप दर्शको को नेत्रोत्सव प्रदान कर रहा था ।
तब वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा अन्य पुण्यात्माओ को देखकर जनक ने कहा—'आप
लोग ही मिथिला तथा अयोध्या के कर्त्ता (विधाता) हैं । अब आगे जो कार्य करना
उचित हो, उन्हें कराइए ।'
निरतर बजनेवाले मगल-वाद्यों के कलनाद तथा सुमगली स्त्रियो के मधुर गीतो
के बीच महाराजा दशरथ तथा उनके चारो पुत्र मणिपीठो पर बैठे । उन्हें तैल तथा उवटन
लगाकर उनका मगल-स्नान कराया गया । उसके उपरात माथे पर तिलक देकर उन्हें
चीनांशुक (रेशमी वस्त्र) तथा आभूषणो से अलकृत किया गया । (उन्हें देखकर) दशरथ
तथा उनकी पत्नियां आनन्द से फूली नही समाती थी । इसके पश्चात् उन्होंने पवित्र मन से
अपने पुत्रो के शुभ अभ्युदय के निमित्त गो-दान देने का निश्चय किया । प्रत्येक पुत्र के
हितार्थ उन्होने वेद-विधि के अनुसार सोलह हजार गायें श्रेष्ठ ब्राह्मणो को दान दी । वे
गायें धौत-खुर, कनक-श्रृंग, ताम्र-पुच्छ से अलकृत थी और सुन्दर दीखती थी । उनके साथ

६२ रंगनाथ रामायण
उनके बछडे भी थे । ये गायें श्रेष्ठ वस्त्रो से सज्जित थी । गायो के साथ उनको दूहने
के लिए काँसे की दोहनी भी राजा ने दान में दी । इनके अतिरिक्त राजा ने स्वर्ण, भूमि
तथा रत्नादि दक्षिणा के साथ अलग-अलग (पुत्रो के हितार्थ अलग-अलग ब्राह्मणो को) दिये ।
इसी समय भरत का मामा युधाजित् वहाँ आ पहुँचा । वह अपने पिता कैकय-
नरेश की आज्ञा से भरत को ले जाने के लिए अयोध्या आया था। किन्तु पुत्रो के विवाहार्थ
दशरथ को मिथिला गये हुए जानकर वह सीधे मिथिला आ गया । दशरथ ने बडे
प्रेम से उसका आदर-सत्कार किया और कुशल-समाचार पूछे ।
दूसरे दिन स्नातक आदि विधियो को पूर्ण करने के पश्चात् (राम) अपने भाइयो
के साथ दशरथ के सम्मुख उपस्थित हुए । दशरथ ने उनका अलकार करने का आदेश दिया ।
(परिचारक राम का अलकार करने लगे) उनके सिर पर मुकुट, उदयाद्रि के शृग
के समान शोभा दे रहा था । उन्होने हाथो में ककण धारण किये, मानो वे भक्तो की
रक्षा के लिए बद्ध-ककण (कृत-सकल्प) हो रहे हो ।
उनके वक्ष पर हार ऐसे शोभ रहे थे, मानो उनके वक्षःस्थल से उत्पन्न चन्द्रकिरणें
चारो ओर छिटक रही हो । कटि-प्रदेश में कनक-वस्त्र ऐसे गोभित हो रहे थे, मानो पृथ्वी ने
उनके कनकावरण को धारण कर लिया हो । उनके कानो में कुडल ऐसे शोभ रहे थे,
मानो रावण के अत्याचार से पीडित अष्ट-दिक्पालो का यश दोनो ओर मोतियो के बहाने
अपनी विनती (श्रीराम को) सुना रहे हो । ऐसे सौदर्य से सपन्न उनके मुख की कान्ति
को बढाते हुए कस्तूरी-तिलक शोभित हो रहा था । उदित होनेवाले भानु के तेज के समान
विलसित, एव कुडल केयूर, मुकुट तथा हारो से मडित लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न के बीच
राम ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो दिक्पालको के मध्य इन्द्र विराज रहा हो ।
वहाँ (जनक के अत पुर में) जनक ने (अपनी) चारो कन्याओ को सुसज्जित करने
के लिए दासियो को आदेश दिया । उन्होने उन कन्याओ को दीप्तिमान् मणिपीठ
पर बिठाया, सुमगलियो के मगल-गीतो और गारिका तथा कीरो के कलरव के बीच प्रत्येक को
कुकुम, कस्तूरी, गोरोचन तथा जवादि की सुगधि से सुवासित उबटन लगाया । ककणो
की मृदु ध्वनियो से मुखरित कर-पल्लवो से उनके केशो में चपा का तेल लगाया, हरिचदन
का लेप किया और घनसार की सुगधि से युक्त कुनकुने जल से उन कन्याओ का
स्नान कराया, महीन कपडो से (उनके शरीर को) पोछा और गुलाबी रग के लहगो पर सुनहली
जरीदार अचलवाले वस्त्र पहनाये । (उसके बाद) उन्होने उनके जूडे ऐसे सुदर ढग से बाँधे
मानो समस्त शृगारो की राशि एकत्र कर दी हो । उन जूडो में जूही की कलियाँ
सजाई । कर्पूर तथा गुलाब-जल में कस्तूरी घोलकर (सारे शरीर पर) लेप किया, सुनहली
जरीदार कचुकी पहनाई तथा उनके वक्ष पर मरकत-मोतियो के हार पहनाये । फिर
उनके (कन्याओ) के कमनीय मुखो के सौंदर्य की वृद्धि करते हुए तिलक लगाये, कपोलो पर
मकरिका-पत्रो को रचा, नाक में बेसर पहनाये, रत्नो के कर्णफूल, मोतियो की वालियाँ
और माणिक्य के कुण्डल सजाये । सके पश्चात् (उनके पैरो में) मरकत के कड़े, पद्म-
राग जडे नूपुर तथा गोमेदक-जडे पाजेव पहनाये ।

इस प्रकार, हारो तथा आभूषणो से अलकृत होने पर उन्हें देख सब स्त्रियाँ आश्चर्य
करने लगी कि ये दुल्हनें शरत्-पूर्णिमा के चन्द्र है, वसत-काल की पुष्प-लताएँ है या
खराद पर चढे हुए श्रेष्ठ रत्न हैं, श्री-समन्वित कुदन की शलाकाएँ हैं, धौत मुक्ताएँ है,
अथवा सुगन्ध से परिपूर्ण चदन की प्रतिमाएँ है। उनमें सीता तो स्वय लावण्य की मूर्ति,
श्रेष्ठ गुणवती, जगन्माता, आदिलक्ष्मी का अवतार थी, उस देवी के सौंदर्य का वर्णन करना
किसके लिए सभव है ? वे भूषणो के लिए आभूषण थी, भूदेवी के समान थी, रत्नाकर
की मेखला थी, गधवती (पृथ्वी) थी और वसुमती थी ।
शुभ मुहूर्त्त निकट आते देखकर वसिष्ठ जनक से परामर्श करके आये और दशरथ
को इसकी सूचना दी । तब महाराज दशरथ कौशिक, वसिष्ठ आदि गुरुओ को साथ लेकर
अमरेन्द्र के वैभव से युक्त हो, उचित वाहनो पर सवार होकर जनक के अत पुर की ओर
चले । उनके पीछे-पीछे उनके पुत्र तथा सुसज्जित हो रमणियाँ चलने लगी । उनके पीछे
राजा के सामन्त, मगलप्रद द्रव्यो को लिये हुई पुण्यवती स्त्रियाँ, याचक, अलकृत अश्व तथा
गज, मन्त्री, वेद-पाठ करते हुए विप्र तथा प्रसन्न-चित्त मुनिगण चलने लगे ।
३६ सीता और राम का विवाह
बरात को आते देख जनक ने अत्यन्त उत्साह से उनकी अगवानी की थी । कमल-
लोचनी सुहागिनो ने उनकी आरती उतारी । जनक ने उन्हें विवाह-मडप में नवरत्न-खचित
पीठो पर आसीन कराया । उसके पश्चात् उन्होने अविलब अपने पुरोहित के द्वारा स्वर्ण-
वेदी में अग्नि की प्रतिष्ठा कराई और वेदोक्त विधि से हवन-कार्य सपन्न किया । उसके
उपरान्त उन्होने देव-कन्याओ की-सी दीखनेवाली, लावण्यवती अपनी कन्याओ को बडे स्नेह
से बुलवाया । उन्होने मधुपर्क की विधि पूरी की और अपनी प्रिय पुत्री विद्युत् अगवाली,
स्त्री-रत्न, कमललोचनी सीता को परदे के पीछे खडा किया । फिर उन्होने वाछित फल
की सिद्धि के हेतु सकल्प-पूर्वक राम से कहा—'हे राम, मेरी पुत्री, सद्धर्मचारिणी सीता को अग्नि
के समक्ष ग्रहण करो ।' इस प्रकार कहते हुए उन्होने (राम के हाथो में) सीता को सौंपा ।
(उस समय) अजस्र पुष्प-वृष्टि हुई तथा देव-दुदुभियाँ बजने लगी । सुदर रमणियाँ दीपो
की थालियाँ लिये खडी थी, स्वर्ण के थालो में मगलाक्षत लिये सुमगलालियाँ पार्श्व-भाग
में खडी थी । गुड तथा जीरा मिलाकर वधु-वरो के सिर पर रखा गया ।१
तब सुमुहूर्त्त जानकर (मुनि ने) परदा हटाया । सीता का भव्य मुख सामने
देखकर राम की आँखें पूर्णिमा के चन्द्र के प्रकाश में विकसित कुमुद-पुष्प के समान प्रफुल्लित
हो गई । सीता की दृष्टि पति के चरण-कमलो पर इस प्रकार स्थित हुई, जैसे पद्म पर
भ्रमर बैठे हो ।
रामचन्द्र की दृष्टि इस प्रकार दीखने लगी, मानो वह उस परम सुन्दरी के लावण्य-
रूपी सागर में तैर रही हो । वधू की दृष्टि वर के शरीर के कान्ति-रूपी प्रवाह के मध्य
विकसित पद्म (कमलो) के सदृश शोभायमान हो रही थी । पत्नी तथा पति की आँखें थोडी
१ आंध्र-देश में विवाह के समय शुभ मुहूर्त्त में वर-कन्या के सिरो पर गुड़ तथा जीरा
मिलाकर रखने की प्रथा है। यह शुभ माना जाता है।

६४ रंगनाथ रामायण
देर के लिए आपस में इस प्रकार मिली, जैसे रति तथा मन्मथ के सुन्दर रूप वडी शोभा-
युक्त गति से परस्पर मिले हों । उसके पश्चात् रघुवीर ने सीता के लाल कमल के समान
कर को अपने हाथ में लिया और पुलकित गात्रो से दोनो एक ही पीठ पर आसीन होकर
वडी प्रीति से हवन का कार्य सपन्न करने लगे । जनक ने वडी प्रीति से श्रेष्ठ युवती
उर्मिला का हाथ लक्ष्मण के हाथ में दिया, कुशध्वज की पुत्रियो में से कमल के-से विशाल
नेत्रोवाली माडवी का कर भरत के हाथ में सौपा और चन्द्रमुखी श्रुतकीर्त्ति का हाथ
शत्रुघ्न को दिया ।
इस प्रकार वेद-विधि से पाणिग्रहण-सस्कार समाप्त करके दशरथ के पुत्रो ने अक्षता-
रोपण-विधि पूरी की और लाज-होम (धान का लावा अग्नि में डालने की क्रिया) सपन्न
करके मुनियो के आशीर्वाद प्राप्त किये । स्वर्ग के देवो ने दुंदुभियाँ वजाई, पुष्प-वृष्टि की,
देवता सतुष्ट हुए, मुनि प्रसन्न हुए, गधर्व अत्यन्त हर्षित होकर गाने लगे तथा आनन्द से
अप्सराएँ नृत्य करने लगी । तब वसि

बालकांड ६५
पराक्रमी परशुराम कंधे पर परशु धारण किये आते दिखाई पडे, जिन्होंने इक्कीस बार इस
पृथ्वी को निक्षत्रिय कर दिया था । उनकी आँखें ऐसी लाल थी, मानो अपने जटा-जूट में
स्थित गगा की आर्द्रता से ललाट को आर्द्र बनाये हुए, अत्यत भयंकर रूप से जलनेवाले
तथा अपने कठ के विष को क्रोध से दैत्यो के ऊपर उगलनेवाले परम शिव के ललाट-
नेत्र की प्रज्वलित वह्नि को (परशुराम) अपनी दोनो आँखों में लिये हुए आ रहे हो ।
उनकी बिखरी हुई लाल-लाल जटाएँ ऐसी दीख रही थी, मानो उनके भीतर की क्रोधाग्नि प्रज्वलित
होकर बाहर तक अपनी लाल-लाल ज्वालाएँ फैला रही हो । उनके कंधे पर रहने-
वाला परशु ऐसा शोभा दे रहा था, मानो उनकी भुजा रूपी लक्ष्मी ने नाल-युक्त विकसित
कमल हाथ में धारण किया हो । ऐसे भयंकर रूप में आनेवाले परशुराम को देखकर
राजा दशरथ तथा मुनिगण भयभीत होकर भय-निवारक मंत्रो का जप करते हुए अर्घ्य-
पाद्य के साथ परशुराम के सामने आये ।
३७ परशुराम का गर्व-भंग
परशुराम ने अर्घ्य-पाद्य ग्रहण नही किया और राजा दशरथ को डरा-धमकाकर राम
के आगे आकर खडे हुए । भार्गव राम (परशुराम) को देखकर राम ने बडी भक्ति से
प्रणाम किया और हाथ जोडे बडे विनय से खडे रहे । उन्हें देखकर परशुराम ने कहा—
'हे राजन्, तुम कितना भी विनय दिखाओ, तो भी मैं तुम्हें क्षमा नही करूँगा । तुम मुझसे
युद्ध करो ।' तब राम ने कहा—"हे भूसुरोत्तम, आपने कश्यप आदि ब्राह्मणो को सारी
पृथ्वी दान कर दी है और महान् जितेन्द्रिय हो वनो में रहकर घोर तपस्या में संलग्न
रहते हैं । अत आपकी वदना करना उचित है । हे मुनीश्वर, यही विचार करके मैंने
आपको प्रणाम किया है, आपसे भीत होकर नही । क्या यह उचित है कि आप व्यर्थ
ही मेरी निंदा करें ? "
परशुराम बोले—"तुम मुझे तपस्वी कहते हो ? जानते हो, मैने युद्ध में सहस्रबाहु
को मार डाला और इक्कीस बार पृथ्वी पर के सभी क्षत्रियो का नाश कर डाला है तथा
(उनके) रक्त से अपने पितरो की तिलोदक-क्रिया की है । हमारे पितर राजाओ के शवो
का सोपान बनाकर स्वर्ग में चले गये हैं। हे अनघ, ऐसे भार्गव राम को बिना जाने तुम
इस ससार में राम होकर कैसे जन्मे ? क्षत्रिय के नाम से जो जन्म लेता है, मैं उसका
नाश करूँगा । (ऐसी दशा में) राम का नाम धारण करनेवाले क्षत्रिय को क्या मैं कभी
छोड सकता हूँ ? राज-वश में जन्म लेकर 'राम का नाम धारण करनेवाले तुम्हें मैं कदापि
क्षमा नही करूँगा । राजा होने के कारण तुम्हारे पिता को युद्ध में मार डालने के उद्देश्य
से मैं आया था, लेकिन स्त्रियो की आड में शरण लेने के कारण मैने उसे छोड दिया था ।
इसीलिए वह गर्वांध हो यहाँ फूला-फूला विचर रहा है । आज भले ही वह कही
छिप जाय, पर मैं उसे जीवित नही रहने दूँगा ।"
तब दशरथ अत्यन्त भीत होकर बडे विनय से भार्गव से बोले—"हे भार्गव, आप
ब्राह्मण हैं, आपको इतना रोष क्यो ? मेरे पुत्र बालक हैं । उनपर क्रोध करना आपको
शोभा नही देता । मैं जानता हूँ कि आप समस्त शास्त्रो एव पुराणो में पारंगत हैं । ऐसा
६

६६ रंगनाथ 'रामायण
कौन धर्म है, जिसे आप नहीं जानते । आपका सामना करके आपसे युद्ध करने की क्षमता
शिवजी में भी नहीं है । ऐसी दशा में दूसरो की शक्ति की वात कौन कहे ? हे परम-
पावन, देवेन्द्र भी आपकी कठोर प्रतिज्ञा को व्यर्थ नही कर सकता । आप हम सबको
क्षमा करके प्रसन्नता से गमन कीजिए ।"
दशरथ ने इस प्रकार कहकर प्रणाम किया और सिर झुकाकर चुपचाप खडे हो गये । फिर
भी परशुराम की आँखें क्रोध से लाल ही रहीं । उन्होंने अपनी प्रशसा में कहे हुए वचनो
को अनसुनी कर दिया और मन-ही-मन उन सबका दमन करने का विचार करके
अत्यंत क्रोध के साथ बोले—"जिस समय मे शिव के साथ धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था,
उस समय कार्तिकेय ने मुझसे युद्ध आरभ किया, पर वह मुझसे हार गया । तब शिव ने
भी मेरी शक्ति की प्रशसा की थी । उस शिव के धनुप का तोडना मै कैसे सहन कर
सकता हूँ ?"
तब रघुराम ने हँसते हुए कहा—"मैने विनोदार्य उस धनुप का सधान किया, तो
वह टूट गया । इतना ही नही, मेरे सधान करने

बालकांड ६७
देवताओ का मनोभाव जानकर शिव ने अपना धनुष देवरात को दिया । उन्होने वह धनुष
जनक को दिया । `विष्णु ने अपना धनुष रुचिक को दिया, रुचिक ने जमदग्नि को दिया
और जमदग्नि ने कृपा करके मुझे यह धनुष दिया । शिव का धनुष पहले ही थोड़ा-सा
टूटा हुआ था, इसलिए तुमने उसे तोडा होगा । हे राजन्, मेरे हाथ का यह धनुष उसी
धनुष के जोड का है । इसपर बाण-संधान करके अपनी शक्ति का परिचय दिये बिना
मैं तुम्हें यहाँ से हटने नही दूंगा ।”
इन वचनो को सुनकर दशरथात्मज अत्यत क्रुद्ध हुए । उनकी आँखो से अग्नि-कण
निकलने लगे । राम ने भार्गव राम से, जो उनकी शक्ति से अनभिज्ञ थे, कहा—“मै जानता
हूँ कि आपमें अतुल बल है । मै यह भी जानता हूँ कि आपने क्षत्रियो को परास्त करके
उनका वध किया है । किन्तु, आप मुझे भी दूसरो की तरह समझकर, निर्भय होकर डीग
मार रहे है । आपको मेरे भुज-बल का ज्ञान नही है । भला, आपकी शक्ति ही कितनी है ?
आपका यह धनुष क्या चीज है ? लाइए, देखूँ तो सही ।
इस प्रकार कहकर उन्होने (परशुराम के हाथ से) धनुष लेकर, उसकी प्रत्यचा
चढा दी और एक उग्र बाण-संधान करके कहा—“मै आपके पैर काटकर आपका गर्व-
भग करते हुए आपका क्रोध दूर करूँगा ।”
परशुराम भयभीत हो गये । उनका घमड चूर-चूर हो गया । उनकी हेंकडी जाती रही ।
तुरन्त बडी नम्रता से प्रार्थनापूर्वक कहने लगे—“हे राजेन्द्र, हे राम, मानवाधीश
मुझे क्षमा करो । मेरी रक्षा करो । मैने सारी पृथ्वी कश्यप को दान में दे दी है । अत.
में रात के समय इस पृथ्वी पर ठहर नही सकता । मुझे रात तक महेन्द्राचल पर पहुँच
जाना चाहिए । इसलिए तुम मेरे पैर मत काटो । (तुम चाहे तो) मेरे समस्त सचित
पुण्य पर यह बाण छोड़ दो ।”
तब राम ने वह बाण परशुराम के (सचित) पुण्य पर छोड़ दिया । देवता, सिद्ध,
खेचर आदि जड़वत् खडे भार्गव राम तथा क्रुद्ध काकुत्स्थ राम को देखते रहे । तब पुष्प-
वृष्टि हुई । स्वर्ग में रहनेवाले ब्रह्मादि देवता आनन्दित होकर राम की प्रशसा करने लगे ।
भार्गव राम राम को देखकर मन-ही-मन उनकी महिमा का विचार करके बोले—
“हे अनघ, मैंने तुम्हारी शक्ति को देख, मन-ही-मन विचार करके जान लिया है कि तुम
विष्णु हो । हे काकुत्स्थ, इसलिए युद्ध में हार जाना मेरे लिए स्वाभाविक ही है । तुम
मेरे बल हो, मेरी आत्मा हो, मेरे बधु-बाधव सब तुम ही हो । हे रामचन्द्र, तुम मेरे
कुवचनो का ख्याल मत करो । हे रघुकुलाधीश राम, तुम मेरी रक्षा करो ।”
इस प्रकार उन्होने राम की स्तुति की, मन-ही-मन रघुराम की महिमा गुनते हुए
उनकी परिक्रमा की और भक्ति से हाथ जोडकर, अत्यन्त विनय से राम की कृपा प्राप्त
करने के उद्देश्य से बोले—“हे राघव, हे जानकीनाथ, अब मुझे जाने की आज्ञा दो । मेरी
त्रुटियो का ध्यान न करके उन्हें क्षमा कर दो, मेरी रक्षा करो और स्नेह से मुझे जाने की
अनुमति प्रदान करो । में एकनिष्ठ होकर, अविचल रीति से नेत्र बद करके तुम्हारे प्रति
तपस्या करूँगा और ज्ञान प्राप्त करूँगा, जिससे सभी मुनि-समाज हर्षित हो जाय ।”