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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 508 में से

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पृष्ठ 97

बालकांड ६७
देवताओ का मनोभाव जानकर शिव ने अपना धनुष देवरात को दिया । उन्होने वह धनुष
जनक को दिया । `विष्णु ने अपना धनुष रुचिक को दिया, रुचिक ने जमदग्नि को दिया
और जमदग्नि ने कृपा करके मुझे यह धनुष दिया । शिव का धनुष पहले ही थोड़ा-सा
टूटा हुआ था, इसलिए तुमने उसे तोडा होगा । हे राजन्, मेरे हाथ का यह धनुष उसी
धनुष के जोड का है । इसपर बाण-संधान करके अपनी शक्ति का परिचय दिये बिना
मैं तुम्हें यहाँ से हटने नही दूंगा ।”
इन वचनो को सुनकर दशरथात्मज अत्यत क्रुद्ध हुए । उनकी आँखो से अग्नि-कण
निकलने लगे । राम ने भार्गव राम से, जो उनकी शक्ति से अनभिज्ञ थे, कहा—“मै जानता
हूँ कि आपमें अतुल बल है । मै यह भी जानता हूँ कि आपने क्षत्रियो को परास्त करके
उनका वध किया है । किन्तु, आप मुझे भी दूसरो की तरह समझकर, निर्भय होकर डीग
मार रहे है । आपको मेरे भुज-बल का ज्ञान नही है । भला, आपकी शक्ति ही कितनी है ?
आपका यह धनुष क्या चीज है ? लाइए, देखूँ तो सही ।
इस प्रकार कहकर उन्होने (परशुराम के हाथ से) धनुष लेकर, उसकी प्रत्यचा
चढा दी और एक उग्र बाण-संधान करके कहा—“मै आपके पैर काटकर आपका गर्व-
भग करते हुए आपका क्रोध दूर करूँगा ।”
परशुराम भयभीत हो गये । उनका घमड चूर-चूर हो गया । उनकी हेंकडी जाती रही ।
तुरन्त बडी नम्रता से प्रार्थनापूर्वक कहने लगे—“हे राजेन्द्र, हे राम, मानवाधीश
मुझे क्षमा करो । मेरी रक्षा करो । मैने सारी पृथ्वी कश्यप को दान में दे दी है । अत.
में रात के समय इस पृथ्वी पर ठहर नही सकता । मुझे रात तक महेन्द्राचल पर पहुँच
जाना चाहिए । इसलिए तुम मेरे पैर मत काटो । (तुम चाहे तो) मेरे समस्त सचित
पुण्य पर यह बाण छोड़ दो ।”
तब राम ने वह बाण परशुराम के (सचित) पुण्य पर छोड़ दिया । देवता, सिद्ध,
खेचर आदि जड़वत् खडे भार्गव राम तथा क्रुद्ध काकुत्स्थ राम को देखते रहे । तब पुष्प-
वृष्टि हुई । स्वर्ग में रहनेवाले ब्रह्मादि देवता आनन्दित होकर राम की प्रशसा करने लगे ।
भार्गव राम राम को देखकर मन-ही-मन उनकी महिमा का विचार करके बोले—
“हे अनघ, मैंने तुम्हारी शक्ति को देख, मन-ही-मन विचार करके जान लिया है कि तुम
विष्णु हो । हे काकुत्स्थ, इसलिए युद्ध में हार जाना मेरे लिए स्वाभाविक ही है । तुम
मेरे बल हो, मेरी आत्मा हो, मेरे बधु-बाधव सब तुम ही हो । हे रामचन्द्र, तुम मेरे
कुवचनो का ख्याल मत करो । हे रघुकुलाधीश राम, तुम मेरी रक्षा करो ।”
इस प्रकार उन्होने राम की स्तुति की, मन-ही-मन रघुराम की महिमा गुनते हुए
उनकी परिक्रमा की और भक्ति से हाथ जोडकर, अत्यन्त विनय से राम की कृपा प्राप्त
करने के उद्देश्य से बोले—“हे राघव, हे जानकीनाथ, अब मुझे जाने की आज्ञा दो । मेरी
त्रुटियो का ध्यान न करके उन्हें क्षमा कर दो, मेरी रक्षा करो और स्नेह से मुझे जाने की
अनुमति प्रदान करो । में एकनिष्ठ होकर, अविचल रीति से नेत्र बद करके तुम्हारे प्रति
तपस्या करूँगा और ज्ञान प्राप्त करूँगा, जिससे सभी मुनि-समाज हर्षित हो जाय ।”