रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंबालकांड ६५
पराक्रमी परशुराम कंधे पर परशु धारण किये आते दिखाई पडे, जिन्होंने इक्कीस बार इस
पृथ्वी को निक्षत्रिय कर दिया था । उनकी आँखें ऐसी लाल थी, मानो अपने जटा-जूट में
स्थित गगा की आर्द्रता से ललाट को आर्द्र बनाये हुए, अत्यत भयंकर रूप से जलनेवाले
तथा अपने कठ के विष को क्रोध से दैत्यो के ऊपर उगलनेवाले परम शिव के ललाट-
नेत्र की प्रज्वलित वह्नि को (परशुराम) अपनी दोनो आँखों में लिये हुए आ रहे हो ।
उनकी बिखरी हुई लाल-लाल जटाएँ ऐसी दीख रही थी, मानो उनके भीतर की क्रोधाग्नि प्रज्वलित
होकर बाहर तक अपनी लाल-लाल ज्वालाएँ फैला रही हो । उनके कंधे पर रहने-
वाला परशु ऐसा शोभा दे रहा था, मानो उनकी भुजा रूपी लक्ष्मी ने नाल-युक्त विकसित
कमल हाथ में धारण किया हो । ऐसे भयंकर रूप में आनेवाले परशुराम को देखकर
राजा दशरथ तथा मुनिगण भयभीत होकर भय-निवारक मंत्रो का जप करते हुए अर्घ्य-
पाद्य के साथ परशुराम के सामने आये ।
३७ परशुराम का गर्व-भंग
परशुराम ने अर्घ्य-पाद्य ग्रहण नही किया और राजा दशरथ को डरा-धमकाकर राम
के आगे आकर खडे हुए । भार्गव राम (परशुराम) को देखकर राम ने बडी भक्ति से
प्रणाम किया और हाथ जोडे बडे विनय से खडे रहे । उन्हें देखकर परशुराम ने कहा—
'हे राजन्, तुम कितना भी विनय दिखाओ, तो भी मैं तुम्हें क्षमा नही करूँगा । तुम मुझसे
युद्ध करो ।' तब राम ने कहा—"हे भूसुरोत्तम, आपने कश्यप आदि ब्राह्मणो को सारी
पृथ्वी दान कर दी है और महान् जितेन्द्रिय हो वनो में रहकर घोर तपस्या में संलग्न
रहते हैं । अत आपकी वदना करना उचित है । हे मुनीश्वर, यही विचार करके मैंने
आपको प्रणाम किया है, आपसे भीत होकर नही । क्या यह उचित है कि आप व्यर्थ
ही मेरी निंदा करें ? "
परशुराम बोले—"तुम मुझे तपस्वी कहते हो ? जानते हो, मैने युद्ध में सहस्रबाहु
को मार डाला और इक्कीस बार पृथ्वी पर के सभी क्षत्रियो का नाश कर डाला है तथा
(उनके) रक्त से अपने पितरो की तिलोदक-क्रिया की है । हमारे पितर राजाओ के शवो
का सोपान बनाकर स्वर्ग में चले गये हैं। हे अनघ, ऐसे भार्गव राम को बिना जाने तुम
इस ससार में राम होकर कैसे जन्मे ? क्षत्रिय के नाम से जो जन्म लेता है, मैं उसका
नाश करूँगा । (ऐसी दशा में) राम का नाम धारण करनेवाले क्षत्रिय को क्या मैं कभी
छोड सकता हूँ ? राज-वश में जन्म लेकर 'राम का नाम धारण करनेवाले तुम्हें मैं कदापि
क्षमा नही करूँगा । राजा होने के कारण तुम्हारे पिता को युद्ध में मार डालने के उद्देश्य
से मैं आया था, लेकिन स्त्रियो की आड में शरण लेने के कारण मैने उसे छोड दिया था ।
इसीलिए वह गर्वांध हो यहाँ फूला-फूला विचर रहा है । आज भले ही वह कही
छिप जाय, पर मैं उसे जीवित नही रहने दूँगा ।"
तब दशरथ अत्यन्त भीत होकर बडे विनय से भार्गव से बोले—"हे भार्गव, आप
ब्राह्मण हैं, आपको इतना रोष क्यो ? मेरे पुत्र बालक हैं । उनपर क्रोध करना आपको
शोभा नही देता । मैं जानता हूँ कि आप समस्त शास्त्रो एव पुराणो में पारंगत हैं । ऐसा
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