रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० रंगनाथ रामायण
मान रहेंगे । उन नक्षत्रो के बीच त्रिशंकु को इसी दशा में (सिर नीचा किये) देवतायो
के समान रहने दो और पुण्यात्मा तथा यशस्वी बनने दो ।' इस व्यवस्था को स्वीकार कर
मुनि तथा देवता विश्वामित्र की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थान को लौट गये ।
"तब विश्वामित्र ने (अपने आश्रम के) मुनियो को देखकर कहा—'यह स्थान अब
तपस्या के लिए उपयुक्त नहीं है । यहाँ अब लोगों की भीड़ एकत्र होने लगी है । अत
हम यहाँ से किसी दूसरे स्थान में चले जायेंगे ।' यो कहकर वे उस स्थान को छोड़कर (पश्चिम
दिशा में) विशाला के निकट पुष्कर-तीर्थ में जा पहुँचे । वहाँ केवल जल और फल का
ही आहार करते हुए बहुत वर्ष तक वे तपस्या करते रहे ।
"उस समय अयोध्या के राजा, मन्मथ के समान रूपवान् अंबरीष ने एक यज्ञ करने
का निश्चय किया । उस यज्ञाश्व को इन्द्र ने चुरा लिया । राजा ने यज्ञाश्व को कई
स्थानो में ढूंढ़ा, किन्तु अश्व के न मिलने से उसके प्रायश्चित्त-स्वरूप विधि पूरी करने के
निमित्त नर-पशु की माँग करते हुए वह कई आश्रमों में गया । निदान भृगुतुंग में अत्यंत
तपोनिष्ठा में संलग्न ऋचि नामक मुनि के पास पहुँचकर राजा ने मुनि को प्रणाम करके
कहा—'हे करुणानिधि, मैंने यज्ञ करने का यत्न किया था, किन्तु यज्ञाश्व कही खो गया है ।
आप कृपया अपने एक पुत्र को यज्ञ-पशु के रूप में मुझे दें । उसके बदले में एक लाख
गायें मै आपको दूंगा ।' तब मुनि ने कहा—'मैं अपने ज्येष्ठ पुत्र से अत्यधिक स्नेह रखता हूं
इसलिए मै उसको नहीं दे सकता ।' तब मुनिपत्नी ने कहा—'मै कनिष्ठ को बहुत
चाहती हूँ । मैं उसे दे नही सकती ।' उन दोनो की बातें सुनकर शुनःशेप ने राजा से
कहा—'ज्येष्ठ पुत्र को मेरे पिता चाहते है और कनिष्ठ पुत्र को मेरी माता चाहती है ।
अत. उनकी बात छोड़ दीजिए, मैं आप के साथ चलूँगा । इसके लिए आप मेरे माता-
पिता को सहस्र गायें दीजिए ।' राजा ने वैसा ही किया और शुनःशेप को रथ पर बिठा-
कर शीघ्र वहाँ से चल दिया ।
"इस प्रकार राजा शुनःशेप को साथ लेकर पुष्कर-प्रदेश में स्थित आश्रम में पहुँचा ।
वहाँ अमित तपोनिष्ठा में लीन, अचल रीति से तपस्या करनेवाले अपने मामा विश्वामित्र
को देखकर शुनःशेप ने उनको प्रणाम किया और कहा—'हे अनघ, मेरे माता-पिता ने मुझे
इस राजा को यज्ञ-पशु के रूप में बेच दिया है । आप कृपया इस राजा के यज्ञ को सफल
बनाकर मेरे प्राणो की रक्षा कीजिए । आज आप ही मेरे माता, पिता, गुरु और बंधु हैं ।'
"इस प्रकार अत्यंत दीन होकर जब शुनःशेप ने कहा, तब विश्वामित्र ने अपने पुत्रो
को संबोधित करके कहा—'पुण्यात्मा लोग परलोक में सुगति प्राप्त करने के लिए ही पुत्र
उत्पन्न करते है । इस बालक ने मेरी शरण ली है, इसलिए इसकी प्राण-रक्षा करना ही
अब मेरे लिए स्वर्ग है । यह मेरा भानजा है । तुम लोग इसकी रक्षा करो और तुममें से
कोई इसके लिए अपने प्राण दो ।'
"मुनि-पुत्रों में से कोई भी उनका आदेश पालन करने के लिए संनद्ध नहीं हुआ, तब
अत्यंत क्रुद्ध होकर मुनि ने उन्हें शाप दिया—'तुम एक हजार वर्ष तक कुत्ते का मास
खाते हुए दुःख भोगो ।'