रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० रंगनाथ रामायण
पुत्र मनु के अवरीष नामक पुत्र हुआ । अवरीष का पुत्र जनवदित नहुष था, जिसका पुत्र
ययाति नामक वीर था । ययाति के पुत्र नाभाग था और उसका पुत्र अज था । अज के
पुत्र ही ये दशरथ हैं, जो पुण्यात्मा तथा सफल मनोरथ हैं । इन्ही दशरथ के पुत्र राम हैं ।
इनके विषय में अधिक क्या कहूँ ? इनके पुत्र को ही तुमने अपनी पुत्री देने का
निश्चय किया है । तुम कृतकृत्य हो । तुम्हारा वंश (इससे) मंगलमय हुआ ।
इस प्रकार वसिष्ठ को रघुवंश की प्रशंसा करते हुए सुनकर पवित्रात्मा शतानन्द जनक
की अनुमति लेकर बड़े हर्ष से सभी सभासदों के सुनते हुए यों कहने लगे—'हे मुनीन्द्र,
हमने बड़े हर्ष से अनघात्मा दशरथ के वंश-क्रम का वर्णन आपसे सुना । मैं अब आपको
प्रशंसनीय जनक की वंशावली सुनाऊँगा ।"
३५ राजा जनक की वंशावली
“द्विजो तथा परमहंसो के जन्मदाता अद्वितीय ब्रह्म अच्युत के नाभि-कमल में ब्रह्मा का जन्म हुआ
और उनका पुत्र हुआ मरीचि । मरीचि का पुत्र कश्यप था । कश्यप के सूर्य उत्पन्न हुआ ।
उनका पुत्र था मतिमान्, जिसके मनु नामक पुत्र हुआ । मनु ने ध्यान-मग्न अवस्था में कभी छींका,
तो (उस छींक से) वैवस्वत का जन्म हुआ । उस वैवस्वत का पुत्र निमि था, जो निर्मल
आचारवान्, नीतिकोविद, धर्मनिरत, विमल मूर्तिमान् तथा यशस्वी था । उसका पुत्र मिथि था,
जिसके जनक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । जनक के उदावसु नामक पुत्र हुआ, जिसका
पुत्र नन्दिवर्द्धन था । नन्दिवर्द्धन का पुत्र सुकेतु था, जिसका पुत्र देवरात था । देव-
रात के वृहद्रथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके महाविभु नामक पुत्र था । महाविभु का पुत्र
सुवृति था, सुधृति का पुत्र धृष्टकेतु और उसका पुत्र हर्यश्व था । हर्यश्व के मरु नामक
पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसके प्रतीक्षक नामक पुत्र हुआ । प्रतीक्षक का पुत्र कीर्तिरथ था, जिसके
देवमीढ नामक पुत्र हुआ । देवमीढ का पुत्र विबुध और विबुध का पुत्र महाध्रक था ।
महाध्रक के कीर्तिरात नामक पुत्र हुआ और उसका पुत्र महारोम था । महारोम के स्वर्ण-
रोम नामक पुत्र हुआ, जिसके ह्रस्वरोम नामक गुणवान् पुत्र हुआ । ह्रस्वरोम के दो पुत्र हुए
—महाराज जनक और कुशध्वज । ये दोनों सौजन्य की मूर्ति हैं । जब जनक महाराज राज्य
करते थे, तब सांकाश्य का पराक्रमी राजा सुधन्वा अपनी सेना के साथ आया और मिथिला
तथा सीता-समेत शिव का धनुष माँगते हुए एक दूत भेजा । जब उसकी माँग की उपेक्षा
कर दी गई, तब उसने शिव-धनुष तथा सीता को प्राप्त करने के लिए घोर युद्ध किया ।
जनक ने युद्ध-भूमि में उसका संहार किया और अपने अनुज को उस राज्य का राजा बनाया ।
जनक से लेकर उस वंश में उत्पन्न सभी राजाओं के नाम जनक के कारण प्रशस्त हो गये हैं ।
निमि-वंश में जन्म लेनेवाले सभी नरेश योग-ज्ञान-सम्पन्न तथा चिरजीवी
होते हैं ।”
इस प्रकार, जनक के वंश के सदाचरण तथा सीता के सद्गुणों की प्रशंसा करने के
पश्चात्, अत्यंत प्रतापी तथा विमल-भाषी दशरथ को संबोधित करके (शतानन्द ने) कहा—
'हे महाराज आप अपने नित्य अभिराम पुत्र राम का विवाह सीता के साथ संपन्न करके
चिर-कीर्ति प्राप्त कीजिए।'