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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 508 में से

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पृष्ठ 85

दर्पण लिये खडी रही । एक युवती ने उनके केशो को कघा करके उनका जूड़ा बाँध दिया,
तो अन्य एक ने उसे निराले ढंग से पुष्पो से अलकृत कर दिया । एक रमणी ने उन्हें
सुगधित बीडा दिया । किसी ने उनकी कटि-तट पर किकिणियुक्त करधनी बाँधी, तो किसी
सुन्दरी ने उनके कुचो पर डोलनेवाले मोतियो के हार पहनाये । एक सखी ने चद्र-कान्ति-
सम धवल वस्त्र उन्हें उत्तम ढंग से पहनाये । इस प्रकार सभी सखियाँ सीता को एक स्वर्ण-
पीठ पर बिठाकर उनका अलकरण कर रही थी । अलकरण समाप्त होते ही जनक की
पत्नी उस कल्याणी राजकुमारी को साथ लेकर कनक-सौध के गवाक्ष के निकट आई ।
उन सब रमणियो के मन में 'सूर्यवश में उत्पन्न राघव को कब देखेंगे' ऐसा कुतूहल भरा था ।
उन्होने गवाक्ष से लोकाभिराम दिव्य धाम, अत्यत रूपवान्, विष्णु के समान तेजस्वी,
धनुर्धर, प्रत्यचा के चिह्न से अकित कर-कमलवाले राम को देखा । उनको देखकर सखियाँ
मन-ही-मन सोचने लगी, रूप और रग में ये अद्वितीय है । ये विष्णु के अशज है और
राजपुत्रो के रूप में जन्मे हैं । जानकी रामचन्द्र के लिए योग्य है और उर्मिला सौमित्र
के लिए । इस प्रकार सोचती हुई वे अत्यन्त आसक्ति के साथ सभा की ओर देखती
रही ।
इन्द्र-सभा के समान सुशोभित उस राज-सभा में धनुष की पेटी लाई गई । तब
महाराज जनक ने शुभमूर्ति गाधि-पुत्र को देखकर कहा—'हे मुनि, किन्नर, यक्ष, गधर्व,
देवता, पन्नग, तथा राक्षस आदियो में से कोई इस धनुष की डोरी को न चढा सका ।
फिर नरो की कौन कहे ? यह धनुष आप राम-लक्ष्मण को दिखाइए ।' तब मुनि ने
रामचन्द्र की ओर देखकर कहा—'हे रघुवश के वीर, इस महान् धनुष को उठाकर उसकी
प्रत्यचा चढा दो । आदिवराह का अवतार लेकर समस्त भूतल को सहज ही उठाकर अपनी
शक्ति का परिचय देनेवाले तुम्हारे लिए यह धनुष क्या वस्तु है ?'
इस प्रकार मुनि का आदेश प्राप्त करके राम, लक्ष्मण के साथ उठे । उनके मन में
प्रेम तथा उमग का सघर्ष हो रहा था । उन्होने अपना दुकूल उतार दिया और कमरवन्द
कसकर बाँधा । उस समय उनके मोहक रूप की काति सभी दिशाओ में बिखर रही थी ।
उस कमल-लोचन तथा अद्वितीय साहसी की करधनी की छोटी-छोटी घटिकाओ का सौदर्य
अद्भुत था । उनकी नव-रत्नमालिका वाहुओ तक डोल रही थी । उनके ककण और
अँगूठियो की काति चारो ओर छिटक रही थी । कर्णभूषणो की काति स्निग्ध कपोलो पर
प्रकाशित हो रही थी । उनके केश पीठ पर नृत्य कर रहे थे और कनक वर्णवाला उनका
शरीर चारो ओर अपनी आभा विकीर्ण कर रहा था । करोडो मन्मथो का-सा सौदर्य
लिये हुए वे मनुवश-तिलक गभीर गति से जनक की सभा में सब के सम्मुख आये और
धनुष की पेटी खोली । समस्त धरा को अपने ऊपर धारणकर चिरनिद्रा में सुख से सोने-
वाले शेषनाग के समान, काले वादलो के मध्य अपनी पूरी कान्ति को समेटकर अचल भाव
से रहनेवाले विद्युत्-दड के समान अनुपम सौदर्य से समन्वित धनुष को राम ने पेटी में से उठाया ।
वह अनुपम धनुष अरुण रत्न-प्रभा की-सी दीप्ति विखेरनेवाली अग्नि-ज्वाला के समान
ऐसा खडा था, मानो वह उसे उठाने के लिए वडे गर्व के साथ प्रयत्न करनेवाले राजकुमारो के