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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 508 में से

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पृष्ठ 93

इस प्रकार, हारो तथा आभूषणो से अलकृत होने पर उन्हें देख सब स्त्रियाँ आश्चर्य
करने लगी कि ये दुल्हनें शरत्-पूर्णिमा के चन्द्र है, वसत-काल की पुष्प-लताएँ है या
खराद पर चढे हुए श्रेष्ठ रत्न हैं, श्री-समन्वित कुदन की शलाकाएँ हैं, धौत मुक्ताएँ है,
अथवा सुगन्ध से परिपूर्ण चदन की प्रतिमाएँ है। उनमें सीता तो स्वय लावण्य की मूर्ति,
श्रेष्ठ गुणवती, जगन्माता, आदिलक्ष्मी का अवतार थी, उस देवी के सौंदर्य का वर्णन करना
किसके लिए सभव है ? वे भूषणो के लिए आभूषण थी, भूदेवी के समान थी, रत्नाकर
की मेखला थी, गधवती (पृथ्वी) थी और वसुमती थी ।
शुभ मुहूर्त्त निकट आते देखकर वसिष्ठ जनक से परामर्श करके आये और दशरथ
को इसकी सूचना दी । तब महाराज दशरथ कौशिक, वसिष्ठ आदि गुरुओ को साथ लेकर
अमरेन्द्र के वैभव से युक्त हो, उचित वाहनो पर सवार होकर जनक के अत पुर की ओर
चले । उनके पीछे-पीछे उनके पुत्र तथा सुसज्जित हो रमणियाँ चलने लगी । उनके पीछे
राजा के सामन्त, मगलप्रद द्रव्यो को लिये हुई पुण्यवती स्त्रियाँ, याचक, अलकृत अश्व तथा
गज, मन्त्री, वेद-पाठ करते हुए विप्र तथा प्रसन्न-चित्त मुनिगण चलने लगे ।
३६ सीता और राम का विवाह
बरात को आते देख जनक ने अत्यन्त उत्साह से उनकी अगवानी की थी । कमल-
लोचनी सुहागिनो ने उनकी आरती उतारी । जनक ने उन्हें विवाह-मडप में नवरत्न-खचित
पीठो पर आसीन कराया । उसके पश्चात् उन्होने अविलब अपने पुरोहित के द्वारा स्वर्ण-
वेदी में अग्नि की प्रतिष्ठा कराई और वेदोक्त विधि से हवन-कार्य सपन्न किया । उसके
उपरान्त उन्होने देव-कन्याओ की-सी दीखनेवाली, लावण्यवती अपनी कन्याओ को बडे स्नेह
से बुलवाया । उन्होने मधुपर्क की विधि पूरी की और अपनी प्रिय पुत्री विद्युत् अगवाली,
स्त्री-रत्न, कमललोचनी सीता को परदे के पीछे खडा किया । फिर उन्होने वाछित फल
की सिद्धि के हेतु सकल्प-पूर्वक राम से कहा—'हे राम, मेरी पुत्री, सद्धर्मचारिणी सीता को अग्नि
के समक्ष ग्रहण करो ।' इस प्रकार कहते हुए उन्होने (राम के हाथो में) सीता को सौंपा ।
(उस समय) अजस्र पुष्प-वृष्टि हुई तथा देव-दुदुभियाँ बजने लगी । सुदर रमणियाँ दीपो
की थालियाँ लिये खडी थी, स्वर्ण के थालो में मगलाक्षत लिये सुमगलालियाँ पार्श्व-भाग
में खडी थी । गुड तथा जीरा मिलाकर वधु-वरो के सिर पर रखा गया ।१
तब सुमुहूर्त्त जानकर (मुनि ने) परदा हटाया । सीता का भव्य मुख सामने
देखकर राम की आँखें पूर्णिमा के चन्द्र के प्रकाश में विकसित कुमुद-पुष्प के समान प्रफुल्लित
हो गई । सीता की दृष्टि पति के चरण-कमलो पर इस प्रकार स्थित हुई, जैसे पद्म पर
भ्रमर बैठे हो ।
रामचन्द्र की दृष्टि इस प्रकार दीखने लगी, मानो वह उस परम सुन्दरी के लावण्य-
रूपी सागर में तैर रही हो । वधू की दृष्टि वर के शरीर के कान्ति-रूपी प्रवाह के मध्य
विकसित पद्म (कमलो) के सदृश शोभायमान हो रही थी । पत्नी तथा पति की आँखें थोडी
१ आंध्र-देश में विवाह के समय शुभ मुहूर्त्त में वर-कन्या के सिरो पर गुड़ तथा जीरा
मिलाकर रखने की प्रथा है। यह शुभ माना जाता है।