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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 508 में से

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पृष्ठ 79

आश्रम के मुनियो के अतिरिक्त शेष सभी मुनि आ गये है । वसिष्ठ के पुत्रो ने जो
जो अपशब्द कहे, उन्हें सुन लीजिए । उन्होने कहा—'यह कितने आश्चर्य की बात है कि यज्ञ
करानेवाला एक राजा है और यज्ञकर्त्ता एक चाडाल । भला चाडाल के यज्ञ में भाग लेने-
वाले मुनि किस प्रकार वहाँ भोजन करेंगे ? देवता अपने हविर्भाग लेने किस मुंह से
आयेंगे ? विश्वामित्र की शरण प्राप्त करने-मात्र से कही नर स्वर्ग-लोक प्राप्त कर सकेगा ?'
"इन बातो को सुनकर विश्वामित्र क्रोध से जल उठे । बोले—'अत्यत निष्ठा के साथ
तपस्या करनेवाले मुझे, अपशब्द कहनेवाले सभी पापी ससार में सात सौ वर्ष तक राक्षस-
भाव धारण किये हुए, मानव तथा कुत्तो का मास खाते हुए, नीच होकर रहेंगे । दर्प से
मेरी निंदा करनेवाला वह महात्मा पृथ्वी पर निषाद होकर जन्म लेगा ।' इस प्रकार, शाप
देकर सयमी मुनियो को देखकर उन्होने कहा—'हे मुनियो, ये राजा त्रिशंकु उच्चकुलीन,
कीर्त्तिमान्, धर्मज्ञ तथा सत्यनिष्ठ है । इसलिए इनसे आप यज्ञ कराइए, जिससे ये शरीर के
साथ इद्रपुरी को जा सकें ।'
"ऋषि के वचन सुनकर वे सभी मुनि परस्पर यो विचार करने लगे—'यदि हम
गाधि-पुत्र के वचनो को टाल दें, तो वे क्रोध में आकर हमें घोर शाप देंगे । अत उनके
कहे अनुसार हम राजा से यज्ञ करायेंगे ।' यो सोचकर सभी मुनि यज्ञ-कर्म में लग गये ।
विश्वामित्र ऋत्विक् बने और मत्रो के उच्चारण के साथ उन्होने यज्ञ-भाग लेने के लिए
देवताओ का आह्वान किया । देवताओ ने उच्च स्वर में कहा कि हम नही आयेंगे ।
"तब क्रोधाग्नि से भभकते हुए, कुश की पवित्री हाथ में लिये हुए, स्रुवा उठाकर
कौशिक ने कहा—'हे त्रिशंकु यदि मैने बाल्यावस्था से नियमो का पालन करते हुए तप
किया हो, तो तुम सशरीर स्वर्गलोक में पहुँच जाओगे । अब तुम जाओ ।'
"इसपर त्रिशंकु स्वर्ग में पहुँच गया । किन्तु (वहाँ जाने पर) इन्द्र ने कहा—'तुम
चाण्डाल हो, हम तुम्हें यहाँ रहने नही देंगे ।' और उसने त्रिशंकु को स्वर्ग से नीचे ढकेल
दिया ।
"त्रिशंकु सिर के बल नीचे की ओर गिरते हुए चिल्लाने लगा—'हे विश्वामित्र,
मेरी रक्षा कीजिए, मेरी रक्षा कीजिए ।' तब विश्वामित्र का हृदय दया से भर गया ।
उन्होने कहा—'हे राजन्, तुम आकाश में ही ठहर जाओ ।' यो कहकर उन्होने त्रिशंकु
को आकाश में ही ठहरा दिया और बडे क्रोध में आकर इन्द्र से प्रतिरोध लेने के उद्देश्य
से उन्होने दक्षिण दिशा में अपर स्वर्ग का निर्माण किया । उसमें उन्होने (नये) सप्त
ऋषियो तथा नक्षत्रो का सर्जन किया । इतना ही नही, वे उस स्वर्ग में दूसरे देवताओ
तथा अपर इद्र को भी उत्पन्न करने का सकल्प मन-ही-मन करने लगे ।
"यह समाचार मिलते ही सभी मुनि तथा देवता विश्वामित्र के पास आकर बोले—
'हे मुनिनाथ, यह त्रिशंकु गुरु के शाप से पीडित है । यह स्वर्ग में रहने योग्य नही है ।'
इस पर विश्वामित्र ने कहा—'हे देवताओ मैने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेजने का वचन
दिया है । मेरा वचन व्यर्थ नही होना चाहिए । इसलिए इस राजा को इसी स्वर्ग में रहने दो ।
जवतक यह ससार रहेगा, ये नक्षत्र, देवलोक से भी ऊपर आसमान में तेज से प्रकाश-
७